( कैरीन मॉडिग, कैरोलन्स्का इन्स्टीट्यूट)
सोलना (स्वीडन), तीन फरवरी (द कन्वरसेशन) किसी व्यक्ति की उम्र कितनी होगी, इसमें जीन की कितनी भूमिका है—यह सवाल लंबे समय से वैज्ञानिकों और आम लोगों के लिए एक पहेली रहा है। अब तक आम धारणा यह थी कि मानव जीवनकाल में लगभग 20 से 25 प्रतिशत योगदान जीन का होता है, जबकि शेष जीवनशैली और पर्यावरण पर निर्भर करता है।
बहरहाल साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने इस सोच को चुनौती दी है।
शोध के अनुसार, आज के दौर में जीवनकाल में जीन का योगदान पहले की तुलना में कहीं अधिक दिखाई देता है। इसके पीछे कारण यह नहीं है कि जीन अचानक ज्यादा प्रभावशाली हो गए हैं, बल्कि यह है कि बीते एक शताब्दी में मृत्यु के कारणों में बड़ा बदलाव आया है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि एक सदी पहले बड़ी संख्या में लोग दुर्घटनाओं, संक्रमणों और अन्य बाहरी कारणों से मर जाते थे। वैज्ञानिक इन्हें ‘बाह्य कारण’ कहते हैं। इसके विपरीत, आज विकसित देशों में अधिकांश मौतें ‘आंतरिक कारणों’ से होती हैं, जैसे उम्र बढ़ने से जुड़ी बीमारियां—हृदय रोग, डिमेंशिया और अन्य रोग।
अधिक स्पष्ट तस्वीर के लिए शोध दल ने स्कैंडिनेवियाई देशों में जुड़वां बच्चों के बड़े समूहों का अध्ययन किया। इसमें दुर्घटनाओं और संक्रमणों से हुई मौतों को अलग कर दिया गया। इसके अलावा अमेरिका में अलग-अलग पले-बढ़े जुड़वां बच्चों और सौ साल से अधिक उम्र तक जीने वाले लोगों के भाई-बहनों का भी विश्लेषण किया गया।
जब बाहरी कारणों से होने वाली मौतों को अलग कर देखा गया, तो जीवनकाल में जीन का अनुमानित योगदान 20–25 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 50–55 प्रतिशत तक पहुंच गया। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह पैटर्न विभिन्न बीमारियों में भी दिखाई देता है। डिमेंशिया में आनुवंशिकी की भूमिका अधिक है, हृदय रोग में मध्यम, जबकि कैंसर में अपेक्षाकृत कम।
हालांकि, वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इस निष्कर्ष की गलत व्याख्या नहीं की जानी चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि जीन की ताकत बढ़ गई है या यह कि किसी व्यक्ति की उम्र का आधा हिस्सा उसके नियंत्रण से बाहर है। वास्तव में बदला है पर्यावरण और इसके प्रभाव जीन पर असर डालते हैं।
शोधकर्ता इसे समझाने के लिए मानव की लंबाई का उदाहरण देते हैं। एक सदी पहले लंबाई इस बात पर बहुत निर्भर करती थी कि बचपन में पर्याप्त भोजन मिला या नहीं और बीमारियों का असर कितना पड़ा। आज समृद्ध देशों में अधिकांश लोगों को पर्याप्त पोषण मिलता है, इसलिए लंबाई में बचा अंतर मुख्यतः जीन से जुड़ा दिखता है। इसका अर्थ यह नहीं कि पोषण महत्वहीन हो गया है, बल्कि यह कि अधिकतर लोग अपनी आनुवंशिक क्षमता तक पहुंच पा रहे हैं।
यही सिद्धांत जीवनकाल पर भी लागू होता है। टीकाकरण, बेहतर आहार, स्वच्छ वातावरण और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार से पर्यावरणीय अंतर घटे हैं। जब पर्यावरणीय विविधता कम होती है, तो सांख्यिकीय रूप से जीन का अनुपात बढ़ा हुआ दिखाई देता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि ‘हेरिटेबिलिटी’ कोई स्थायी जैविक गुण नहीं है, बल्कि यह जनसंख्या और परिस्थितियों पर निर्भर करती है। नया अध्ययन इस बात पर जोर देता है कि जीन और पर्यावरण मिलकर जीवनकाल को आकार देते हैं। अंततः, दोनों ही अहम हैं—और साथ मिलकर ही असर डालते हैं।
( द कन्वरसेशन ) मनीषा शोभना
शोभना