ईरान पर हमलों के बाद लेबनान में शांति पर संकट, हिजबुल्ला से बढ़ा तनाव
ईरान पर हमलों के बाद लेबनान में शांति पर संकट, हिजबुल्ला से बढ़ा तनाव
( मिराइले रेबाइज, डिकिन्सन कॉलेज )
पेनसिल्वानिया, पांच मार्च (द कन्वरसेशन) ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की अमेरिका-इजराइल के संयुक्त हमलों में मौत और फिर देश पर लगातार हो रहे हमलों ने लेबनान में बड़ी मुश्किल से बहाल शांति को और अधिक खतरे में डाल दिया है।
विश्लेषकों का कहना है कि ईरान समर्थित शिया अर्धसैनिक संगठन हिजबुल्ला की प्रतिक्रिया देश को एक बार फिर बड़े संघर्ष और अस्थिरता की ओर धकेल सकती है।
खामेनेई की मौत के बाद लेबनान से सक्रिय हिजबुल्ला ने उत्तरी इजराइल की ओर रॉकेट दागे। इसके जवाब में इजराइल ने दक्षिणी लेबनान, बेरूत और पूर्वी बेका घाटी में संगठन के ठिकानों पर नए हवाई हमले किए। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही हिजबुल्ला अब पहले जितना शक्तिशाली नहीं रहा, फिर भी उसके कदम लेबनान को गंभीर संकट में डाल सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, हिजबुल्ला फिलहाल अमेरिका और इजराइल के खिलाफ ईरान के युद्ध में प्रभावी सैन्य सहयोगी बनने की स्थिति में नहीं है, लेकिन उसकी गतिविधियां लेबनान को अस्थिर कर सकती हैं। इसके साथ ही यह आशंका भी जताई जा रही है कि हिजबुल्ला की प्रतिक्रिया को बहाना बनाकर इजराइल या सीरिया लेबनान में जमीनी अभियान शुरू कर सकते हैं।
हिजबुल्ला की स्थापना 1985 में 1979 की ईरानी क्रांति से प्रेरित होकर की गई थी। संगठन ने ईरान के क्रांतिकारी नेता अयातुल्ला रुहोल्ला खोमैनी के प्रति निष्ठा जताई थी और इजराइल के खिलाफ संघर्ष को अपना प्रमुख उद्देश्य बताया था। पिछले चार दशकों में इस संगठन ने लेबनान की राजनीति और विदेश नीति पर गहरा प्रभाव बनाए रखा।
हालांकि अक्टूबर 2023 के बाद इजराइल के लगातार हमलों में उसके कई शीर्ष नेता मारे गए, जिससे उसकी ताकत कमजोर पड़ी। इसके बाद कई लोगों को उम्मीद थी कि लेबनान में हिजबुल्ला का प्रभाव कम हो जाएगा।
लगभग एक साल तक चले संघर्ष के बाद 27 नवंबर 2024 को इजराइल और हिजबुल्ला के बीच युद्धविराम समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत हिजबुल्ला को लितानी नदी के उत्तर की ओर हटना था और इजराइली सेना को 60 दिनों के भीतर दक्षिणी लेबनान से वापस जाना था।
अमेरिका की मध्यस्थता से हुआ यह समझौता पूरी तरह लागू नहीं हो पाया। इजराइल का कहना है कि लेबनानी सेना हिजबुल्ला को निरस्त्र करने में पर्याप्त तेजी नहीं दिखा रही है, जबकि हिजबुल्ला का आरोप है कि इजराइल लगातार हमले कर समझौते का उल्लंघन कर रहा है।
लेबनानी सेना ने हाल में कहा कि वह हिजबुल्ला के निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया के उन्नत चरण में पहुंच चुकी है, लेकिन इजराइल का दावा है कि संगठन फिर से हथियार जुटा रहा है। हिजबुल्ला के महासचिव नईम कासिम ने भी स्पष्ट कर दिया है कि जब तक इजराइल लेबनान पर हमले जारी रखेगा, तब तक संगठन पूर्ण निरस्त्रीकरण के लिए तैयार नहीं होगा।
खामेनेई की हत्या के बाद हिजबुल्ला द्वारा इजराइल पर हमले किए जाने से लेबनान के भीतर भी विवाद बढ़ गया है। कई राजनीतिक नेताओं का आरोप है कि संगठन लेबनान के हितों की बजाय ईरान के हितों को प्राथमिकता दे रहा है।
इस बीच लेबनानी सरकार ने दो मार्च को एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए हिजबुल्ला की सैन्य गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया। यह लेबनान के इतिहास में पहली बार हुआ है। हालांकि इसका प्रभाव अभी स्पष्ट नहीं है और संगठन ने अपनी सैन्य गतिविधियां जारी रखी हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रतिबंध से देश में सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है। लेबनान की लगभग एक-तिहाई आबादी शिया समुदाय की है और हाल के इजराइली हमलों में दक्षिणी लेबनान, दक्षिण बेरूत और बेका घाटी जैसे शिया बहुल क्षेत्रों को भारी नुकसान हुआ है।
उधर सीरिया ने लेबनान की उत्तरी सीमा पर अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है, जबकि इजराइल पहले से ही लेबनान में हवाई हमले कर रहा है। इजराइली सेना ने कहा है कि स्थिति को देखते हुए “सभी विकल्प खुले” हैं, जिनमें जमीनी अभियान भी शामिल हो सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्रीय संघर्ष के बीच हिजबुल्ला की भूमिका लेबनान को फिर से गंभीर राजनीतिक और सुरक्षा संकट की ओर धकेल सकती है।
( द कन्वरसेशन ) मनीषा वैभव
वैभव

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