वैज्ञानिक विकास और सोचने के तरीके बदलने से अतीत के बारे में बदल जाती है समझ
वैज्ञानिक विकास और सोचने के तरीके बदलने से अतीत के बारे में बदल जाती है समझ
(टिम फोर्समैन, म्पुमलंगा विश्वविद्यालय)
जोहानिसबर्ग, 12 अगस्त (द कन्वरसेशन) अतीत क्या है? इसका जवाब देना आसान लग सकता है, लेकिन यह हमारी शुरुआती सोच से कहीं ज्यादा पेचीदा है। जैसे-जैसे विज्ञान, राजनीति, प्रौद्योगिकी और सोचने के तरीके बदलते हैं, वैसे-वैसे अतीत के बारे में हमारी समझ भी बदलती जाती है।
मैं एक पुरातत्वविद् हूं और मैंने दक्षिण अफ्रीका, बोत्सवाना, लेसोथो और मोजाम्बिक में शोध किया है। मैंने हाल ही में एक किताब पूरी की है जिसमें बताया गया है कि अफ्रीका में पुरातत्व के इतिहास ने अतीत को समझने के हमारे नजरिए को कैसे आकार दिया है। यहां कुछ विचार व्यक्त किये गए हैं कि यह विषय क्यों महत्वपूर्ण है।
अफ्रीका में पुरातत्व कार्य के मुख्य चरण कौन से हैं : अपनी किताब में, मैंने अफ्रीका में पुरातत्व के काम को चार चरणों में बांटा है – शुरुआती साल, पुरातत्व का सामने आना, परिपक्वता का दौर, और पूरे अफ्रीका में पुरातत्व का विस्तार। ये चरण पूरी तरह तय नहीं हैं और इनकी सीमाएं भी धुंधली हैं, लेकिन मुझे ये सबसे सही लगे। हर अध्याय की शुरुआत एक ऐसी कहानी से होती है जो मुझे उस समय की झलक दिखाती है।
शुरुआती साल उस समय (1800 के दशक के आखिर में) के हैं, जब यूरोपीय देश अफ्रीका को अपने उपनिवेशों में बांटने की होड़ में लगे थे। उस समय पुरातत्व का ज्यादातर काम चीजों को इकट्ठा करने पर आधारित था, और मिली हुई चीजों का बहुत कम विश्लेषण किया जाता था। ज्यादातर अनुसंधान प्रशिक्षित विशेषज्ञों के बजाय संग्रहालय के कर्मचारियों, मिशनरी, प्रशासकों और यात्रियों ने किया था।
बीसवीं सदी की शुरुआत में, पुरातत्व के तरीकों में बदलाव आया, जिससे शौकिया लोगों और पेशेवरों के बीच टकराव हुआ। 1920 के दशक तक, अतीत को समझने के लिए मजबूत विश्लेषणात्मक तरीके विकसित किए जा रहे थे और उनका इस्तेमाल हो रहा था। हालांकि, पुरातत्व अभी भी अफ्रीका के इतिहास के बारे में औपनिवेशिक गलतफहमियों का अनुसरण कर रहा था। पश्चिमी अफ्रीका में अटलांटिस (एक तथाकथित डूबा हुआ शहर) या मिस्र के हैमिटिक लोगों द्वारा महाद्वीप के बड़े हिस्सों में उन्नत तकनीक लाने जैसी झूठी धारणाएं बनी हुई थीं।
दूसरे विश्व युद्ध ने तकनीकी क्षेत्र में बड़ी प्रगति की। ‘रेडियोकार्बन डेटिंग’ जैसी विधियों के साथ-साथ अन्य उन्नत तरीके भी सामने आए, जिन्होंने पुरातत्व संबंधी दृष्टिकोणों में बुनियादी बदलाव ला दिया।
इसके बाद 1960 के दशक से पुरातत्व के क्षेत्र में समुदायों की भूमिका बढ़ती गई; वे या तो काम करने वालों के तौर पर या फिर जानकारी और ज्ञान देकर अनुसंधान में शामिल होते थे। मेरा मानना है कि यह पुरातत्व के तौर-तरीकों में एक बड़ा बदलाव है और इससे अफ्रीकी लोगों को अपनी बात रखने और काम करने का अधिकार मिला है।
स्वाहिली तट इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। पहले के कामों में इस बात पर ध्यान दिया गया था कि बाहर से आए अरब समूहों ने सामाजिक-राजनीतिक माहौल को बदलने में क्या भूमिका निभाई। फिर एक नया नजरिया सामने आया, जिसने ध्यान इस बात पर केंद्रित किया कि कैसे स्थानीय समुदायों ने एक बहुत लंबे इतिहास के हिस्से के तौर पर तट पर बदलाव लाए।
ये अध्याय दिखाते हैं कि पुरातत्वविद् और इतिहासकार जिस नजरिए का इस्तेमाल करते हैं, वह अतीत के अलग-अलग पहलुओं पर कैसे केंद्रित होता है। जैसे-जैसे हमारे संदर्भ बदलते हैं, हमारे नजरिए में बदलाव आता है, या विज्ञान नए रूप लेता है, तो अतीत को देखने का हमारा नजरिया भी बदल जाता है। हम अतीत को वर्तमान के नजरिए से देखते हैं – यह हमारे सामाजिक, तकनीकी, आर्थिक और राजनीतिक संदर्भों पर निर्भर करता है।
आधुनिक अफ्रीका में पुरातत्व की क्या भूमिका है : जिस दुनिया में हम रहते हैं, उसे अतीत ने ही आकार दिया है। उदाहरण के लिए, सोमालिया में मोगादिशु से लेकर मोजाम्बिक में विलांकुलोस तक का पूरा पूर्वी तट व्यापार, आपसी मेल-जोल, उपनिवेशवाद, गुलामी और संघर्ष के लंबे इतिहास से आकार लेने वाला क्षेत्र है।
औपनिवेशिक दौर में, और दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खत्म होने तक, इनमें से ज्यादातर बातों को पूरी तरह से मान्यता नहीं मिली या उन्हें बड़े पैमाने पर बढ़ावा नहीं दिया गया।
जिन जगहों का औपनिवेशिक अतीत रहा है, वहां अतीत पर फिर से ध्यान देने से अफ्रीकी इतिहास को मान्यता देने में मदद मिल सकती है, खासकर उन हिस्सों को जिनका रिकॉर्ड ठीक से नहीं रखा गया था और इससे हमें यह बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलती है कि हमारा समाज कैसे बना।
(द कन्वरसेशन) शफीक सुभाष
सुभाष

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