स्मार्ट चश्मे आम होते जा रहे, क्या मौजूदा निजता कानून हमें इनसे जुड़े खतरों से बचाते हैं?

स्मार्ट चश्मे आम होते जा रहे, क्या मौजूदा निजता कानून हमें इनसे जुड़े खतरों से बचाते हैं?

स्मार्ट चश्मे आम होते जा रहे, क्या मौजूदा निजता कानून हमें इनसे जुड़े खतरों से बचाते हैं?
Modified Date: August 7, 2026 / 06:15 pm IST
Published Date: August 7, 2026 6:15 pm IST

(किम्बरली वेदरॉल और मिलिका स्टिलिनोविच, सिडनी विश्वविद्यालय)

सिडनी, सात अगस्त (द कन्वरसेशन) ऑस्ट्रेलिया की सड़कों पर अब ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जो ऐसे चश्मे पहने नजर आते हैं जिनके जरिये आसपास की तस्वीरें और वीडियो बेहद आसान तरीके से रिकॉर्ड किए जा सकते हैं। इसकी बड़ी वजह ‘केमार्ट’ है, जिसने हाल ही में सस्ते ‘कैमरा युक्त चश्मे’ बाजार में उतारे और वे तेजी से बिक भी गए।

ये चश्मे ‘केमार्ट’ के अपने ब्रांड ‘एंको’ के हैं। इनकी कीमत केवल 89 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर है, जो मेटा और रे-बैन के इसी तरह के उत्पादों की कीमत (जो 337 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर से शुरू होती है) की तुलना में काफी कम है।

कैमरा वाले चश्मों को आम उपभोक्ताओं के बीच एक बड़े चलन के रूप में बढ़ावा देने की कोशिश हालांकि पहनने वाले व्यक्ति और उसके आसपास मौजूद लोगों की निजता (प्राइवेसी) के लिए चिंता का कारण बन रही है। इन उपकरणों से जुटाए गए डेटा का क्या होता है और इन तस्वीरों को कौन देख सकता है, इस बारे में अभी बहुत कम जानकारी उपलब्ध है।

दरअसल, शुक्रवार को ऑस्ट्रेलिया की संघीय अटॉर्नी जनरल मिशेल रोलैंड ने देश के गोपनीयता आयुक्त से इस तकनीक की तत्काल समीक्षा करने को कहा।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मौजूदा गोपनीयता कानून पहनने योग्य (वियरेबल) तकनीक के इस नए दौर से निपटने के लिए पर्याप्त रूप से मजबूत हैं?

विकास में एक दशक से अधिक का समय लगा

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स्मार्ट चश्मे कोई नई तकनीक नहीं हैं। गूगल ने वर्ष 2013 में ‘गूगल ग्लास’ शुरू किया था जिसे मीडिया में काफी चर्चा मिली थी और कई मशहूर हस्तियों ने भी इसका समर्थन किया था।

हालांकि, यह शुरुआती मॉडल बाजार में अपनी जगह बनाने में सफल नहीं हो सका, क्योंकि इसकी तकनीक उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी।

इसका भारी-भरकम और आसानी से पहचाना जाने वाला डिजाइन भी लोगों को पसंद नहीं आया। इसके अलावा, इसे पहनने वाले लोगों का मजाक उड़ाया जाने लगा और ऐसे लोगों को ‘ग्लासहोल्स’ कहा जाने लगा था।

आधुनिक चश्मे देखने में काफी सुंदर हो गए हैं। ये पहले की तुलना में कम ध्यान आकर्षित करते हैं, यानी पहनने वाले व्यक्ति और आसपास के लोगों के लिए यह पहचानना मुश्किल होता है कि कोई व्यक्ति एक अत्याधुनिक कंप्यूटर से युक्त चश्मा पहने हुए है।

‘केमार्ट’ के कम कीमत वाले कैमरा युक्त चश्मे भी महंगे मॉडलों की तरह कई काम कर सकते हैं, हालांकि उनकी गति और सुविधाएं कुछ सीमित हो सकती हैं।

ये चश्मे ‘हेयसायन’ सॉफ्टवेयर पर चलते हैं। इनमें ऐसे कैमरे लगे होते हैं जो पहनने वाले की नजर के सामने आने वाली तस्वीरों और वीडियो को रिकॉर्ड करने के अलावा उनका विश्लेषण कर सकती है। इनमें आवाज रिकॉर्ड करने के लिए माइक्रोफोन और फोन कॉल करने तथा पॉडकास्ट या संगीत सुनने के लिए स्पीकर भी लगे होते हैं।

इन उपकरणों में तस्वीरें, वीडियो और आवाज मेमोरी में रिकॉर्ड होती है। बाद में इन्हें पहनने वाले के फोन से जुड़े ऐप में डाउनलोड किया जा सकता है, जहां रिकॉर्ड की गई सामग्री को संपादित किया जा सकता है, साझा किया जा सकता है और वेबसाइटों पर अपलोड भी किया जा सकता है।

*खुफिया रिकॉर्डिंग से लेकर दुर्घटनाओं के खतरे तक

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इन चश्मों को लेकर सबसे ज्यादा चिंता इस बात की जताई जा रही है कि इनसे सार्वजनिक स्थानों पर मौजूद लोगों, खासकर अनजान महिलाओं की बिना उनकी जानकारी के खुफिया तरीके से वीडियो रिकॉर्ड की जा सकती है और उसे सोशल मीडिया सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे सार्वजनिक जगहों पर उत्पीड़न, ताक-झांक और पीछा करने जैसी घटनाओं में बढ़ोतरी का खतरा है।

रिकॉर्ड किए गए वीडियो को ऑनलाइन अपलोड करने से इस तरह के दुरुपयोग की समस्या और बढ़ सकती है। इसके अलावा, अगर ये पहनने योग्य उपकरण पहनने वाले व्यक्ति की नजर के सामने की चीजों को डिजिटल जानकारी के रूप में पेश करके उसके देखने के अनुभव को बदलते हैं, तो ध्यान भटकने के कारण गिरने, ठोकर लगने और सड़क दुर्घटनाओं जैसे वास्तविक शारीरिक जोखिम भी पैदा हो सकते हैं।

कंपनियों और नियोक्ताओं को भी इससे जुड़े जोखिमों पर विचार करना होगा। उदाहरण के लिए स्मार्ट चश्मे से गोपनीय जानकारी, व्यापार संबंधी गोपनीयता या बैंक खाते से जुड़ी जानकारियां रिकॉर्ड हो सकती हैं।

खबर है कि मेटा ऐसे ‘सुपर-सेंसर’ युक्त चश्मे विकसित कर रही है, जो उस समय भी रिकॉर्ड कर सकते हैं जब उपयोगकर्ता उनके संपर्क में नहीं हो। इससे कंपनियों को किसी व्यक्ति के जीवन के सबसे निजी हिस्सों, उसकी गतिविधियों, स्थान और पसंद-नापसंद तक अभूतपूर्व पहुंच मिल सकती है।

इस तरह जुटाए गए डेटा को ‘डेटा-लेबलिंग’ कंपनियों के पास भेजा जा सकता है और उत्पाद तथा उसकी शर्तों के आधार पर इसका इस्तेमाल कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) मॉडल को प्रशिक्षित करने में किया जा सकता है।

*कानूनी स्थिति क्या है?

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यह स्पष्ट नहीं है कि ऑस्ट्रेलिया के मौजूदा गोपनीयता कानून कैमरा युक्त चश्मों जैसी निजता में दखल देने वाली और लगातार निगरानी करने वाली नई तकनीकों पर किस तरह लागू होते हैं।

ऑस्ट्रेलिया का संघीय गोपनीयता कानून काफी हद तक बिखरा हुआ, सीमित और पुराना है।

कैमरा युक्त चश्मा पहनने वाले आम लोगों द्वारा वीडियो या तस्वीरें रिकॉर्ड करने और उन्हें साझा करने की गतिविधियां सीधे तौर पर इन कानूनों के दायरे में नहीं आतीं। हालांकि, अगर कोई कंपनी ऐप के माध्यम से तस्वीरों सहित व्यक्तिगत डेटा एकत्र करती है और उसका इस्तेमाल करती है, तो उसे गोपनीयता कानूनों का पालन करना होगा।

*निजता को ध्यान में रखकर तकनीक का निर्माण जरूरी

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लेकिन सवाल यह है कि क्या हम वास्तव में ऐसी दुनिया में रहना चाहते हैं, जहां हर समय कम स्तर पर लगातार रिकॉर्डिंग होती रहे?

जब हम ऐसी तकनीकों से घिरे हुए हैं, जो उन लोगों की निजता को भी प्रभावित कर रही हैं, जिन्हें कभी किसी गोपनीयता नीति को पढ़ने या स्वीकार करने का मौका तक नहीं मिला, तो क्या हम हर बातचीत के दौरान इस बात के प्रति सचेत रहना होगा कि कहीं कोई हमें रिकॉर्ड तो नहीं कर रहा? क्या हमें रिकॉर्ड करने को लेकर अनजान लोगों को टोकना पड़ेगा? क्या इसके बेहतर विकल्प हो सकते हैं? क्या ऐसी तकनीक पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए?

हमारे अनुसार, इस मुद्दे पर अधिक संतुलित तरीके से चर्चा करने की जरूरत है। आखिरकार, ऐसी तकनीकें दिव्यांग लोगों के लिए जीवन बदलने वाली साबित हो सकती हैं। ये उन लोगों के लिए ऐसे स्थानों और अवसरों तक पहुंच आसान बना सकती हैं, जो पहले उनके लिए मुश्किल या असंभव थे।

नई तकनीक के इस दौर में अलग-अलग अधिकारों और हितों के बीच बेहतर संतुलन बनाने के कई तरीके हो सकते हैं।

बड़े नियोक्ताओं और सामाजिक संस्थानों, जैसे स्कूलों और विश्वविद्यालयों को ऐसे नियम बनाने पर विचार करना चाहिए, जो उनके साझा स्थानों पर लोगों की निजता की रक्षा कर सकें।

इसके अलावा, लोगों पर यह पूरी जिम्मेदारी डालने के बजाय कि वे इस नई तकनीकी दुनिया में खुद ही रास्ता निकालें, ऑस्ट्रेलिया को इस बात पर गंभीर चर्चा करने की जरूरत है कि उसके निजता और उपभोक्ता कानून यह सुनिश्चित करें कि उपभोक्ता और व्यावसायिक उत्पादों को बनाते समय शुरुआत से ही निजता को ध्यान में रखा जाए।

(द कन्वरसेशन)

संतोष पवनेश

पवनेश


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