अंतरिक्ष से आई शर्करा ने पृथ्वी पर जीवन की नींव मजबूत करने में निभाई भूमिका : अध्ययन
अंतरिक्ष से आई शर्करा ने पृथ्वी पर जीवन की नींव मजबूत करने में निभाई भूमिका : अध्ययन
( ल्यूक स्टेलर, अलबर्ट फैरेनबाश एवं मार्टिन वान क्रेनेन्दोंक – यूएनएसडब्ल्यू )
सिडनी, 30 सितंबर (द कन्वरसेशन) क्या पृथ्वी के अलावा ब्रह्मांड में कहीं और भी जीवन है? यह मानवता के सबसे बड़े अनसुलझे सवालों में से एक है।
जीवन की शुरुआत कैसे हुई, इसे समझने की कोशिश में वैज्ञानिकों ने अब ऐसे संकेत पाए हैं कि अंतरिक्ष से पृथ्वी पर पहुंची शर्करा (शुगर) ने जीवन के लिए जरूरी रासायनिक परिस्थितियां बनाने में भूमिका निभाई हो सकती है।
‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ में प्रकाशित नए अध्ययन के अनुसार, राइबोज नामक शर्करा, आरएनए यानी राइबो न्यूक्लिक एसिड की आणविक संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। आरएनए आधुनिक जीवों में आनुवंशिक जानकारी के भंडारण और इस्तेमाल में अहम भूमिका निभाता है और माना जाता है कि जीवन की शुरुआत तथा उसके शुरुआती विकास में भी इसका महत्व रहा होगा।
हालांकि, राइबोज काफी नाजुक होती है और गर्म होने पर आसानी से टूट जाती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, बोरेट के रूप में मौजूद बोरॉन राइबोज से जुड़कर उसे टूटने से बचाने में मदद कर सकता है।
—– पुग्गा के गर्म जलस्रोतों से मिले संकेत —–
शोधकर्ताओं ने भारत के हिमालयी क्षेत्र में स्थित पुग्गा के गर्म जलस्रोतों से प्राप्त वास्तविक खनिजों का अध्ययन किया, जिनमें बोरेट की परतें भी शामिल हैं। यह क्षेत्र उन आधुनिक स्थानों में शामिल है, जिनकी परिस्थितियां शुरुआती पृथ्वी के संभावित वातावरण से मिलती-जुलती मानी जाती हैं।
“पुग्गा का पानी” से मतलब लद्दाख की पुग्गा घाटी में मौजूद प्राकृतिक गर्म जलस्रोतों के पानी से है। पुग्गा लद्दाख के चांगथांग क्षेत्र में स्थित एक प्रसिद्ध भू-तापीय क्षेत्र है। वहां जमीन के भीतर से गर्म पानी और गैसें प्राकृतिक रूप से बाहर निकलती हैं। इस पानी में बोरॉन और बोरेट जैसे खनिज अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। इसी वजह से वैज्ञानिक इसे पृथ्वी पर जीवन की शुरुआती परिस्थितियों के अध्ययन के लिए उपयोगी प्राकृतिक प्रयोगशाला मानते हैं।
यह सही है कि पुग्गा के पानी में बोरॉन की मात्रा काफी अधिक है, लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा खनिजों के रूप में जम जाता है। ऐसे में सवाल यह है कि जीवन की शुरुआत से पहले पृथ्वी के जलस्रोतों में रासायनिक प्रतिक्रियाओं के लिए पर्याप्त घुला हुआ बोरॉन कैसे मौजूद रहा होगा।
प्रयोगों में शोधकर्ताओं ने पाया कि राइबोज बोरेट खनिजों को घुलने में मदद करती है और ठोस कणों के बनने को रोकती है। इससे अधिक बोरॉन पानी में घुली अवस्था में रह सकता है और रासायनिक प्रतिक्रियाओं के लिए उपलब्ध हो सकता है।
इससे राइबोज और बोरेट के बीच एक दोतरफा संबंध का संकेत मिलता है। बोरेट राइबोज को टूटने से बचाता है, जबकि राइबोज बोरेट को पानी में घुली अवस्था में बनाए रखने में मदद करती है।
—– उल्कापिंडों के जरिये पृथ्वी पर पहुंचे कार्बन युक्त अणु —–
वैज्ञानिकों के अनुसार, करीब चार अरब वर्ष पहले पृथ्वी आज की तुलना में काफी अलग थी। वातावरण में ऑक्सीजन बहुत कम थी और ज्वालामुखीय गतिविधियां अधिक थीं। उस समय युवा सौरमंडल से बड़ी संख्या में उल्कापिंड पृथ्वी से टकराते थे और अपने साथ पानी तथा कार्बन युक्त अणु लाते थे।
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि उस शुरुआती दौर में हर वर्ष करीब 10 लाख टन कार्बन पृथ्वी पर पहुंच सकता था। 1969 में ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया में गिरे मर्चिसन उल्कापिंड में वैज्ञानिकों ने राइबोज समेत कई शर्कराओं की पहचान की है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, शुरुआती पृथ्वी की उथली झीलों और तालाबों में अंतरिक्ष से आए कार्बनिक अणु जमा हो सकते थे। वाष्पीकरण जैसी प्रक्रियाओं के कारण इनकी मात्रा बढ़ सकती थी और जटिल रासायनिक मिश्रण तैयार हो सकते थे, जिन्हें जीवन की शुरुआत के लिए संभावित ‘‘आदिम सूप’’ माना जाता है।
—– जीवन से पहले खनिजों को प्रभावित करने की संभावना —–
अध्ययन में कहा गया है कि जीवन की उत्पत्ति से पहले मौजूद कार्बन युक्त अणुओं ने केवल जीवन के लिए जरूरी रसायन तैयार करने में ही भूमिका नहीं निभाई होगी, बल्कि पृथ्वी के खनिजों को भी प्रभावित किया होगा।
राइबोज अपेक्षाकृत कम मात्रा में मौजूद रही होगी, लेकिन एथिलीन ग्लाइकोल और ग्लिसरॉल जैसे अन्य अणु भी बोरेट से जुड़ते हैं। सिलिका और कैल्शियम जैसे पृथ्वी पर अधिक प्रचुर तत्व भी कार्बन युक्त अणुओं के साथ प्रतिक्रिया करते हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे यह संभावना बनती है कि जीवन के अस्तित्व में आने से पहले ही कार्बन युक्त अणुओं ने खनिजों और चट्टानों के निर्माण को प्रभावित करना शुरू कर दिया था।
हालांकि, इन प्रक्रियाओं ने पृथ्वी के भू-दृश्य को किस हद तक प्रभावित किया, यह अभी स्पष्ट नहीं है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इन पारस्परिक क्रियाओं का अध्ययन पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति को समझने के साथ-साथ अन्य ग्रहों पर जीवन के संभावित उद्भव के बारे में जानकारी जुटाने में भी मदद कर सकता है।
द कन्वरसेशन
मनीषा पवनेश
पवनेश

Facebook


