अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों का संकट एक सतत मानवीय त्रासदी

अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों का संकट एक सतत मानवीय त्रासदी

अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों का संकट एक सतत मानवीय त्रासदी
Modified Date: May 13, 2026 / 01:20 pm IST
Published Date: May 13, 2026 1:20 pm IST

( सेपिता हतामी, वेस्टर्न यूनिवर्सिटी )

लंदन, 13 मई (द कन्वरसेशन) महिलाओं के लिए दुनिया की सबसे खराब जगहों में से एक कौन-सी है? अफगानिस्तान।

अफगानिस्तान में तालिबान शासन के तहत महिलाओं के अधिकारों के संकट की चर्चा होने पर अधिकतर लोगों के मन में यही विचार आता है। लेकिन यह तस्वीर का केवल एक हिस्सा है।

‘‘अधिकार’’ शब्द पर ध्यान केंद्रित करने से उस अधिक गंभीर वास्तविकता पर पर्दा पड़ जाता है, जो इस स्थिति में लोगों के जीवन और अस्तित्व से जुड़ी है। अफगानिस्तान में जो कुछ घटित हो रहा है, वह केवल महिलाओं के अधिकारों का संकट नहीं, बल्कि एक मानवीय आपदा है।

इसका असर स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, खाद्य प्रणाली और बुनियादी सहायता तक लोगों की पहुंच पर पड़ता है। साथ ही यह भी प्रभावित होता है कि जब आबादी के आधे हिस्से को इन व्यवस्थाओं से बाहर कर दिया जाए, तब ये प्रणालियां काम भी कर पाएंगी या नहीं।

यह स्थिति परिवारों को महिलाओं की रोजगार और सेवाओं तक सीमित पहुंच से जूझने के लिए मजबूर करती है, जिससे परिवार आर्थिक और सामाजिक रूप से और अधिक कमजोर होते जा रहे हैं।

तालिबान ने महिलाओं को लगातार सार्वजनिक जीवन से बाहर किया है, जिसमें रोजगार, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

उदाहरण के तौर पर, हाल में महिला स्वास्थ्यकर्मियों को संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के प्रवेश द्वार पर रोक दिया गया और तालिबान अधिकारियों ने उन्हें परिसर में प्रवेश करने से प्रतिबंधित कर दिया।

इस तरह की पाबंदियां धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था तैयार कर रही हैं, जो तय करती है कि किसे अस्तित्व में रहने, सहायता प्रदान करने और सहायता प्राप्त करने का अधिकार होगा।

अफगानिस्तान में जो हो रहा है, वह केवल लैंगिक भेदभाव नहीं है, बल्कि समस्त महिलाओं को सार्वजनिक संस्थाओं और व्यवस्थाओं से बाहर धकेलने की प्रक्रिया है। अफगान महिलाओं की स्थिति केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक संकट बन चुकी है, जो संस्थानों और रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित कर रही है।

लैंगिक रंगभेद

इसी कारण अफगानिस्तान की स्थिति को अब केवल ‘‘महिलाओं के अधिकारों का संकट’’ नहीं, बल्कि ‘‘लैंगिक रंगभेद’’ का रूप कहा जाने लगा है। महिलाओं को बाहर करने की यह प्रक्रिया दिखाती है कि संस्थानों का निर्माण किस तरह किया जा रहा है और भविष्य में उन्हें किस रूप में बनाए रखा जाएगा।

लैंगिक रंगभेद उस स्थिति को कहा जाता है, जिसमें लोगों को उनकी लैंगिक पहचान के आधार पर कुछ स्थानों या गतिविधियों से प्रतिबंधित कर दिया जाता है।

अफगानिस्तान में इस भेदभावपूर्ण और हिंसक व्यवस्था का व्यापक रूप से दस्तावेजीकरण और रिपोर्टिंग की गई है, लेकिन हालात लगातार बदतर होते जा रहे हैं।

इसका असर भी क्रमिक रूप से बढ़ रहा है, क्योंकि हर नई पाबंदी पिछली पाबंदियों को और मजबूत करती है तथा संकट को गहरा करती जाती है। यदि कल राजनीतिक व्यवस्था और सरकार बदल भी जाए, तब भी इन व्यवस्थित अधिकार हननों को पलटना बेहद कठिन होगा।

महिलाओं को पेशेवर क्षेत्रों से बाहर करने का मतलब है कि स्कूल शिक्षकों को खो रहे हैं, अस्पताल प्रशिक्षित कर्मचारियों से वंचित हो रहे हैं और सहायता नेटवर्क आबादी के आधे हिस्से तक पहुंच खो रहे हैं। यह नुकसान अस्थायी नहीं है, बल्कि इससे व्यवस्थाओं की बढ़ती जरूरतों के प्रति प्रतिक्रिया देने की क्षमता सीमित हो रही है।

जब महिलाओं को संस्थानों से बाहर कर दिया जाता है, तो समस्या केवल सेवा वितरण और प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहती। इससे संस्थागत स्मृति भी नष्ट होती है — यानी कौशल, पेशेवर ज्ञान और अनुभव, जो अगली पीढ़ियों तक नहीं पहुंच पाता।

समय के साथ महिला कर्मचारियों की कमी के कारण संस्थान कुछ सेवाओं को सीमित या बंद करने लगते हैं। जैसे-जैसे सेवाएं घटती हैं, देखभाल और सहायता नेटवर्क में बड़े अंतर पैदा हो जाते हैं और कई समूह लगातार सहायता से वंचित हो जाते हैं।

सहायता और समर्थन में बाधा

तालिबान द्वारा संयुक्त राष्ट्र और यूनिसेफ कार्यालयों में महिला कर्मचारियों के प्रवेश पर रोक लगाना, ऐसे अनेक उदाहरणों में से एक है, जहां योग्य महिलाओं को उन स्थानों पर जाने से रोका जा रहा है, जहां वे जरूरी सहायता और देखभाल प्रदान कर सकती थीं।

महिलाओं के अधिकारों पर यह प्रभावी कार्रवाई ऐसे समाज में सहायता और समर्थन को बाधित कर रही हैं, जहां इसकी बेहद आवश्यकता है।

तालिबान के लैंगिक नियमों और प्रतिबंधों के कारण पुरुष कर्मचारी भी महिला मरीजों की सहायता सीमित रूप से ही कर सकते हैं। इसलिए महिलाओं के लिए आवश्यक सहायता केवल पुरुषों को सौंपकर पूरी नहीं की जा सकती। इसका असर स्वास्थ्य सेवा, खाद्य वितरण और सुरक्षा प्रणालियों सहित मानवीय सहायता के कई क्षेत्रों पर पड़ रहा है।

इसके परिणामस्वरूप, अधूरी जरूरतों का बोझ परिवारों पर डाल दिया जाता है, जहां महिलाओं को बिना वेतन के देखभाल और घरेलू जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं।

तालिबान शासन महिलाओं और बच्चों के लिए जीवनरक्षक हस्तक्षेपों में देरी कर रहा है या उन्हें रोक रहा है, जो जीवित रहने के मानवाधिकार का उल्लंघन है।

केवल संयुक्त राष्ट्र और यूनिसेफ कार्यालय ही नहीं, बल्कि अन्य सहायता संस्थानों, अस्पतालों, स्कूलों और सार्वजनिक संस्थानों में भी महिला कर्मचारियों को प्रवेश से रोका जा रहा है। यह मानवाधिकारों के व्यापक क्षरण का संकेत है। तालिबान ने पूरे मानवीय सहायता तंत्र में मानवाधिकार उल्लंघनों का जाल बिछा दिया है।

मानवीय सहायता सही जानकारी और आंकड़ों पर भी निर्भर करती है — कौन भूखा है, कौन असुरक्षित है और किसे सुरक्षा की जरूरत है। अफगानिस्तान में, जहां महिलाओं की सामाजिक पहुंच सीमित है और महिला कर्मचारी जनसंपर्क, सर्वेक्षण तथा घर-घर संपर्क से लगभग गायब हैं, वहां यह जानकारी अधूरी रह जाती है।

अधूरे आंकड़ों के कारण सहायता का वितरण भी अधूरा और असंतुलित हो जाता है। नतीजतन, सबसे कमजोर आबादी आधिकारिक आकलनों में अदृश्य बनी रहती है।

इस अदृश्यता का सबसे अधिक असर महिला मुखिया वाले परिवारों और दूरदराज ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों पर पड़ता है, जहां पहले से ही सहायता सीमित है।

संकट का सामान्यीकरण

अफगानिस्तान में लैंगिक भेद का प्रभाव देश के बाहर बहुतों को दिखाई नहीं दे सकता, लेकिन निकट भविष्य में मानवीय सहायता प्रणालियां प्रभावित होने लगेंगी।

तालिबान द्वारा लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध लगाए जाने के कारण महिला पेशेवरों की भावी पीढ़ियां पहले ही समाप्त कर दी गई हैं।

यूनिसेफ का अनुमान है कि इस प्रतिबंध के कारण अफगानिस्तान को 25,000 शिक्षक और स्वास्थ्यकर्मी गंवाने पड़ सकते हैं। ऐसे देश में, जहां महिलाओं को पुरुष चिकित्सकों से उपचार लेने की अनुमति नहीं है, वहां महिलाओं को शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं दोनों से बाहर करना गंभीर चिकित्सा आपातस्थिति पैदा करता है।

समय के साथ व्यवस्थाओं का पुनर्गठन इस तरह होगा कि महिलाएं सेवा प्रदाता के रूप में गायब होंगी, जबकि वे सहायता प्राप्त करने वालों के रूप में केंद्र में बनी रहेंगी।

जैसे-जैसे लैंगिक प्रतिबंध संसाधनों, ज्ञान और देखभाल के प्रवाह को बाधित कर रहे हैं, वैसे-वैसे भारी मांग के बावजूद सेवाएं प्रदान करने की क्षमता प्रतिदिन घट रही है। कई महिलाओं को असंगठित या छिपे हुए कार्यों की ओर धकेला जा रहा है, जहां शोषण और दुर्व्यवहार का खतरा अधिक है।

अफगानिस्तान में लैंगिक भेद केवल इसे पहचान लेने से समाप्त नहीं होगा। इसे व्यवस्थित आतंक का नाम देने भर से यह रुकेगा नहीं। कार्रवाई के अभाव में लगातार संकट लोगों को इसके प्रति असंवेदनशील बना सकता है।

मानवीय संगठनों के सामने अब कठिन विकल्प है — या तो प्रतिबंधात्मक परिस्थितियों में काम करें और उन्हें वैधता देने का जोखिम उठाएं, या फिर पीछे हट जाएं और लोगों को बिना सहायता के छोड़ दें।

जितनी लंबी यह स्थिति बनी रहेगी, उतना ही महिलाओं को बाहर रखने की यह व्यवस्था ‘‘आपात स्थिति’’ के बजाय ‘‘सामान्य ढांचे’’ के रूप में स्थापित होती जाएगी। अब सवाल केवल यह नहीं रह गया है कि जो खो गया है उसे कैसे बहाल किया जाए, बल्कि यह भी है कि क्या महिलाओं की भागीदारी पर निर्भर व्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण संभव भी होगा ?

द कन्वरसेशन मनीषा वैभव

वैभव


लेखक के बारे में