‘द एपस्टीन फाइल्स’ : एआई पॉडकास्ट जो पत्रकारिता जैसा लगता तो है, लेकिन वैसा है नहीं

‘द एपस्टीन फाइल्स’ : एआई पॉडकास्ट जो पत्रकारिता जैसा लगता तो है, लेकिन वैसा है नहीं

‘द एपस्टीन फाइल्स’ : एआई पॉडकास्ट जो पत्रकारिता जैसा लगता तो है, लेकिन वैसा है नहीं
Modified Date: May 11, 2026 / 12:04 pm IST
Published Date: May 11, 2026 12:04 pm IST

( कैथरीन मैक्डोनाल्ड – बौर्नेमाउथ यूनिवर्सिटी के ऑडियो प्रोडक्शन विभाग में प्रिंसिपल एकेडमिक )

बौर्नेमाउथ (ब्रिटेन), 11 मई (द कन्वरसेशन) पॉडकास्ट आज के दौर में सबसे निजी सांस्कृतिक माध्यमों में से एक बन गया है। लोग अक्सर हेडफोन लगाकर अकेले इन्हें सुनते हैं और उन आवाजों पर भरोसा करने लगते हैं, जो उन्हें जटिल या संवेदनशील कहानियों के जरिए मार्गदर्शन देती हैं।

समय के साथ श्रोता केवल दी जा रही जानकारी पर ही नहीं, बल्कि इस भरोसे पर भी निर्भर होने लगते हैं कि किसी इंसान ने सामग्री को सुना, चुना और व्यवस्थित किया है। लेकिन एआई आधारित नए पॉडकास्ट ‘द एपस्टीन फाइल्स’ ने इस भरोसे और पत्रकारिता की पारंपरिक अवधारणा को चुनौती दी है।

डेटा उद्यमी एडम लेवी द्वारा तैयार इस शृंखला में वित्तीय अपराधी जेफ्री एप्स्टीन से जुड़े 30 लाख से अधिक दस्तावेजों का उपयोग किया गया है। पॉडकास्ट खुद को ‘‘फॉरेंसिक ऑडिट’’ के रूप में पेश करता है, जिसमें दो एआई-निर्मित प्रस्तोता आपस में बातचीत करते हुए पूरी कहानी सुनाते हैं।

फरवरी 2026 में शुरू हुई इस शृंखला को अब तक 20 लाख से अधिक बार डाउनलोड किया जा चुका है। यह एक दैनिक, स्वत: अद्यतन होने वाला कार्यक्रम है, जिसमें एआई प्रणाली दस्तावेजों को एकत्र करती है, उनका विश्लेषण करती है और स्क्रिप्ट तैयार करती है। इसकी गति इतनी तेज है कि पारंपरिक समाचार संस्थानों के लिए उसका मुकाबला करना मुश्किल माना जा रहा है।

पहली बार सुनने पर ‘द एपस्टीन फाइल्स’ किसी पेशेवर पॉडकास्ट की तरह लगता है। इसमें मजाक, बातचीत के दौरान रुकावटें, अनौपचारिक टिप्पणियां और वे तमाम शैलीगत तत्व मौजूद हैं जो लोकप्रिय पॉडकास्ट कार्यक्रमों की पहचान माने जाते हैं। लेकिन इन आवाजों के पीछे कोई वास्तविक प्रस्तोता नहीं है। शोध से लेकर प्रकाशन तक की पूरी प्रक्रिया लगभग पूरी तरह स्वचालित बताई जाती है।

पॉडकास्ट के निर्माताओं का दावा है कि यह मंच ‘‘भावनाओं को अलग’’ रखकर केवल तथ्यों के आधार पर सामग्री प्रस्तुत करता है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि जब सामग्री के चयन, व्याख्या और प्राथमिकता तय करने की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होती, तब निष्पक्षता के दावे की पुष्टि करना कठिन हो जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि एआई प्रणाली सूचनाओं को व्यवस्थित कर सकती है, लेकिन यह तय नहीं कर सकती कि कौन-सी जानकारी महत्वपूर्ण है, कौन-सी विश्वसनीय है और किसे संदर्भ के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए। यह कार्य अब भी मानवीय निर्णय और संपादकीय विवेक पर निर्भर है।

लेख में कहा गया है कि स्वचालन निर्णय प्रक्रिया को समाप्त नहीं करता, बल्कि उसे ऐसे ढंग से छिपा देता है जिसे समझना कठिन हो जाता है। एआई प्रणालियों में निर्णय प्रशिक्षण डेटा, एल्गोरिद्म और प्राथमिकता तय करने वाले तंत्रों में निहित होते हैं, लेकिन वे निष्पक्ष परिणामों की तरह दिखाई देते हैं।

‘द एपस्टीन फाइल्स’ खुद को ‘‘पहला एआई-नेटिव खोजी वृत्तचित्र’’ होने का दावा करता है, लेकिन इसमें खोजी पत्रकारिता के कई पारंपरिक तत्व नहीं हैं। इसमें न तो प्रत्यक्ष साक्षात्कार हैं, न घटनास्थल की रिकॉर्डिंग और न ही ऐसे ध्वनि संकेत जो श्रोताओं को वास्तविक परिवेश का एहसास कराएं। पूरा कार्यक्रम लगभग पूरी तरह कृत्रिम संवादों पर आधारित है।

विशेषज्ञों के अनुसार, ऑडियो माध्यम में यह चुनौती और गंभीर हो जाती है क्योंकि मानवीय आवाज सामान्यतः विश्वसनीयता, अनुभव और जवाबदेही का संकेत मानी जाती है। जब कोई कृत्रिम आवाज बिल्कुल इंसानी लगने लगे, तब श्रोता के लिए यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि वह वास्तव में किस पर भरोसा कर रहा है।

लेख में कहा गया है कि ‘द एपस्टीन फाइल्स’ में बातचीत की शैली, संतुलित स्वर और धीमी गति से प्रस्तुत तर्क श्रोताओं में भरोसे का भाव पैदा करते हैं, लेकिन इससे यह सुनिश्चित नहीं होता कि सामग्री का आलोचनात्मक मूल्यांकन भी किया गया है।

आलोचकों ने यह भी चिंता जताई है कि जेफ्री एप्स्टीन जैसे संवेदनशील मामलों में, जिनका संबंध मानव शोषण और पीड़ितों से है, एआई आधारित प्रस्तुति कहीं अधिक निर्जीव और असंवेदनशील लग सकती है।

इसके बावजूद एआई आधारित पॉडकास्ट तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं क्योंकि इन्हें तैयार करना सस्ता है और इनकी गुणवत्ता इतनी परिष्कृत होती जा रही है कि इन्हें मानवीय सामग्री से अलग पहचानना मुश्किल हो रहा है।

लेख के अनुसार, भविष्य में चुनौती केवल यह पहचानने की नहीं होगी कि क्या सही है और क्या गलत, बल्कि यह समझने की भी होगी कि प्रस्तुत सामग्री में क्या अनुपस्थित है।

पारंपरिक प्रसारण और पॉडकास्ट हमेशा प्रस्तोता, श्रोता और संपादकीय जवाबदेही के रिश्ते पर आधारित रहे हैं। ‘द एपस्टीन फाइल्स’ उस दौर का संकेत देता है जहां आवाज तो मौजूद है, लेकिन उसके पीछे कोई वास्तविक व्यक्ति नहीं है।

लेख में कहा गया है, “यदि आप बहुत ध्यान से सुनें, तो पाएंगे कि इन आवाजों के बीच कोई कभी सांस नहीं लेता।”

द कन्वरसेशन मनीषा वैभव

वैभव


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