तालिबान ने अफगानिस्तान को पतन के करीब पहुंचाया, लेकिन प्रतिरोध भी बढ़ रहा है

तालिबान ने अफगानिस्तान को पतन के करीब पहुंचाया, लेकिन प्रतिरोध भी बढ़ रहा है

तालिबान ने अफगानिस्तान को पतन के करीब पहुंचाया, लेकिन प्रतिरोध भी बढ़ रहा है
Modified Date: August 18, 2026 / 06:09 pm IST
Published Date: August 18, 2026 6:09 pm IST

( अमीन सैकाल, ऑस्ट्रेलियन नेश्नल यूनिवर्सिटी )

कैनबरा, 18 अगस्त (द कन्वरसेशन) अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में लौटने के पांच साल बाद भी उसका शासन पहले की तरह ही कट्टरपंथी बना हुआ है।

इस्लाम की अपने हितों के अनुरूप व्याख्या के नाम पर काम करने वाले इस समूह ने शासन के अधिक मानवीय और समावेशी तरीके को अपनाने के लिए अपनी कट्टर वैचारिक मान्यताओं में बदलाव का कोई प्रयास नहीं किया है।

उसने अपने जैसे विचार रखने वाले कई हिंसक चरमपंथी समूहों को पनाह देने से भी परहेज नहीं किया है। संयुक्त राष्ट्र अफगानिस्तान से आतंकवाद के फिर उभरने को लेकर बार-बार चेतावनी दे चुका है।

इस बीच, महत्वपूर्ण बात यह है कि तालिबान को अपने ही खेमे के भीतर से बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों और कई सशस्त्र प्रतिरोधी समूहों का सामना करना पड़ रहा है। उसके पूर्व संरक्षक पाकिस्तान के साथ संबंध पूरी तरह बिगड़ चुके हैं और पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने इस साल की शुरुआत में तालिबान के खिलाफ ‘‘खुली जंग’’ की घोषणा की थी।

—– कसता शिकंजा —–

अगस्त 2021 में काबुल पर कब्जे से पहले तालिबान के नेताओं ने संकेत दिया था कि संगठन बदल गया है। उन्होंने दावा किया था कि उन्होंने 1996 से 2001 के अंत में अमेरिका के नेतृत्व में हुए हस्तक्षेप तक अपने कठोर शासन से सबक सीखा है।

तालिबान ने महिलाओं और लड़कियों के शिक्षा हासिल करने तथा काम करने के अधिकारों का सम्मान करने का वादा भी किया था। उसने अमेरिका समर्थित पिछली सरकार के साथ काम करने वालों को आम माफी देने और एक समावेशी शासन व्यवस्था स्थापित करने की बात कही थी। उसने यह भी कहा था कि वह यह सुनिश्चित करेगा कि अफगानिस्तान दोबारा आतंकवाद का गढ़ न बने।

हालांकि, उसके किसी भी वादे को पूरा नहीं किया गया। इसके उलट तालिबान ने इस्लाम की अपनी कट्टरपंथी व्याख्या को और कठोर किया है, जो मुस्लिम दुनिया में कहीं और प्रचलित नहीं है। उसने दमनकारी, महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण और प्रतिगामी शासन को और मजबूत किया है।

तालिबान ने क्षेत्रीय और वैश्विक भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विताओं का भी फायदा उठाया है और इस तरह वह जनता की किसी वैधता या अंतरराष्ट्रीय मान्यता की जरूरत के बिना शासन कर रहा है। अभी तक केवल रूस ने औपचारिक रूप से तालिबान सरकार को मान्यता दी है, लेकिन चीन समेत कई अन्य देशों ने उसके नेताओं के साथ राजनयिक संपर्क बढ़ाए हैं और आर्थिक एवं व्यापारिक संबंध आगे बढ़ाए हैं।

हाल के महीनों में तालिबान नेताओं को अफगान शरणार्थियों के यूरोपीय संघ में आने के मुद्दे पर यूरोपीय संघ के अधिकारियों से बातचीत के लिए ब्रसेल्स भी आमंत्रित किया गया था। मानवाधिकार संगठनों ने इस यात्रा की कड़ी आलोचना की थी।

अब लाखों अफगान देश से बाहर रह रहे हैं, जिनमें से अधिकतर पड़ोसी ईरान और पाकिस्तान में हैं। तालिबान के दोबारा सत्ता में आने के बाद से करीब पांच लाख अफगान लोगों ने यूरोपीय संघ में शरण के लिए आवेदन किया है और कई मेजबान देश उन्हें वापस भेजने के इच्छुक हैं।

इस बीच, अफगानिस्तान के भीतर अधिकतर नागरिक अभूतपूर्व गरीबी, बड़े पैमाने पर बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई और बुनियादी वस्तुओं की भारी कमी का सामना कर रहे हैं। कुछ परिवारों को गुजारा करने के लिए अपने बच्चों तक को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

—– कई मोर्चों पर खतरा —–

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय विकास एजेंसी (यूएसएआईडी) को बंद करने के फैसले और पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान के लिए पारगमन मार्ग बंद किए जाने से स्थिति और खराब हुई है।

वाशिंगटन ने तालिबान के प्रति अस्पष्ट नीति अपनाई है। ट्रंप ने काबुल में बगराम हवाई अड्डे को वापस लेने और 2021 में अमेरिकी सैनिकों की वापसी के दौरान छोड़े गए सात अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के सैन्य उपकरणों की मांग की है।

अमेरिका ने तालिबान के साथ बातचीत जारी रखी है। संयुक्त राष्ट्र ने भी पिछले पांच वर्षों में अमेरिकी सरकार से तालिबान के खजाने तक अरबों डॉलर की राशि अप्रत्यक्ष रूप से पहुंचाई है।

पाकिस्तान का तालिबान के खिलाफ रुख उसके पाकिस्तानी तालिबान (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान या टीटीपी) के समर्थन से जुड़ा है। इस्लामाबाद का आरोप है कि अफगान तालिबान टीटीपी के सदस्यों को सीमा पार हमले करने के लिए अपने देश में ठिकाना मुहैया करा रहा है। इसके जवाब में पाकिस्तान ने अपने पड़ोसी देश पर हवाई हमले किए हैं।

इस्लामाबाद अब तालिबान के ठिकानों पर बमबारी करके उस पर अधिकतम दबाव बनाने के लिए प्रतिबद्ध दिखता है, जिसकी भारी कीमत आम नागरिकों को जान गंवाकर चुकानी पड़ रही है। पाकिस्तान ने तालिबान के कुछ विरोधियों के साथ बैठकें भी की हैं।

यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब उत्तर-पूर्वी प्रांत बदख्शां में संसाधनों पर नियंत्रण और तालिबान के खिलाफ स्थानीय असंतोष को लेकर तालिबान और असंतुष्ट कमांडर जुमा खान फतेह के समर्थकों के बीच लड़ाई तेज हो गई है। इस क्षेत्र में तालिबान के वरिष्ठ अधिकारियों की हत्या भी की गई है।

वहां कई सशस्त्र विपक्षी समूह सक्रिय हैं। हालांकि ये समूह अभी बिखरे हुए हैं, लेकिन कुछ रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि प्रतिरोध का दायरा बढ़ रहा है।

यह स्पष्ट नहीं है कि इन घटनाक्रमों का परिणाम क्या होगा। तालिबान चिंतित जरूर है, लेकिन इन विपक्षी समूहों को पर्याप्त समन्वय और एक साझा राष्ट्रीय एजेंडा विकसित करने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना है। तालिबान इन समूहों की तुलना में कहीं अधिक मजबूत स्थिति में है और उसके पास बेहतर हथियार भी हैं।

अधिकतर अफगान तालिबान से छुटकारा पाकर खुश होंगे। लेकिन विपक्षी समूहों को एक व्यवहार्य विकल्प के रूप में स्वीकार किए जाने के लिए उन्हें जनता का विश्वास जीतना होगा और भविष्य के लिए उम्मीद पैदा करनी होगी। अफगानिस्तान का इतिहास बताता है कि यह लक्ष्य हासिल करना कितना मुश्किल रहा है।

( द कन्वरसेशन ) मनीषा माधव

माधव


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