हिमालय से जुड़े खतरे होते जा रहे हैं जटिल, चेतावनी प्रणालियों में समन्वय और मजबूती जरूरी

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हिमालय से जुड़े खतरे होते जा रहे हैं जटिल, चेतावनी प्रणालियों में समन्वय और मजबूती जरूरी

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  • Publish Date - September 4, 2026 / 01:24 PM IST,
    Updated On - September 4, 2026 / 01:24 PM IST

(मेहबूब सहाना और निमेश ढुंगाना, यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर; प्रियंक प्रवीण पटेल, प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी; रेशमा श्रेष्ठ, काठमांडू यूनिवर्सिटी)

मैनचेस्टर, चार सितंबर (द कन्वरसेशन) नेपाल में हाल में आई विनाशकारी बाढ़ का समय-क्रम अब धीरे-धीरे साफ हो रहा है। सुबह 8:37 बजे, उपकरणों ने नेपाल और चीन की सीमा के निकट कुछ हलचल दर्ज की, जिसे शुरुआत में भूकंप समझा गया। लेकिन सिर्फ सात मिनट बाद ही, सीसीटीवी कैमरों ने गीरोंग पोर्ट सीमा चौकी को मलबे के भारी बहाव और बाढ़ से तबाह होते हुए दर्ज किया।

नेपाल के बाढ़ नियंत्रण अधिकारियों को इस घटना की जानकारी सुबह लगभग 9:00 बजे मिली और उन्होंने सुबह लगभग 9:15 बजे एक आपातकालीन एसएमएस अलर्ट भेजा। लेकिन तब तक नेपाल एक बड़ी आपदा की चपेट में आ चुका था।

कंपन दर्ज होने और आपातकालीन अलर्ट जारी होने के बीच 38 मिनट का अंतर ध्यान खींचने वाला है। लेकिन यह सोचना गलत होगा कि नेपाल के अधिकारी शुरुआती संकेत पर तुरंत कार्रवाई कर सकते थे: उस समय यह एक छोटा भूकंप लग रहा था, न कि पहाड़ों के धराशायी होने की कोई दुर्लभ घटना। इसके अलावा, बाढ़ इतनी तेजी से आई कि जल-स्तर मापने वाले सेंसर संभल ही नहीं सके; वे सामान्य जल-स्तर दर्ज करने के तुरंत बाद ही नष्ट हो गए।

ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि एक बेहतर और एकीकृत चेतावनी प्रणाली होती, तो क्या भूकंप से जुड़े आंकड़ों, उपग्रह (सेटेलाइट) की तस्वीरों और अन्य जानकारियों को इतनी तेजी से जोड़कर देखा जा सकता था कि यह समझा जा सके कि वास्तव में क्या हो रहा है और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को समय रहते सावधान किया जा सके?

मौजूदा पूर्व-चेतावनी प्रणालियों को अक्सर कुछ खास खतरों को ध्यान में रखकर बनाया गया है, जैसे कि लगातार बारिश से आने वाली बाढ़ या ग्लेशियर की झील फटने से आने वाली बाढ़ (जीएलओएफ)। लेकिन यह आपदा इनमें से कोई नहीं थी। इसके बजाय, यह चट्टानों और बर्फ के एक बड़े हिस्से के अचानक खिसकने का एक दुर्लभ घटनाक्रम लगता है, जो मलबे के भयानक बहाव और बाढ़ में बदल गया।

पिछले साल भारत में आई ऐसी ही एक बाढ़ पर हुए हालिया अध्ययन के अनुसार, इस तरह के खतरे मौजूदा चेतावनी प्रणालियों के दायरे से गायब हैं। जैसे-जैसे तापमान बढ़ने से ग्लेशियर (हिमनद) कमजोर हो रहे हैं और जमी हुई बर्फ पिघल रही है, ऐसी घटनाएं और अधिक होने की संभावना है।

सीमा पार तक फैलने वाले पहाड़ी खतरे:

जुलाई 2025 में, तिब्बत में एक ग्लेशियर झील फटने से उसका पानी इसी नदी में तेजी से बहा था। इस घटना में नेपाल में कम से कम नौ लोगों की जान गई थी और लगभग 20 लोग लापता हो गए थे। वहीं, चीन की तरफ भी 11 लोगों के आधिकारिक तौर पर लापता होने की खबर थी।

इस बाढ़ के बाद, नेपाल और चीन सैद्धांतिक रूप में बाढ़, भूस्खलन और ग्लेशियर की झीलों से जुड़ी जानकारी तुरंत साझा करने पर सहमत हुए थे। हालांकि, मई 2026 में नेपाल के विदेश मंत्री की चीन यात्रा के दौरान इस मुद्दे को उठाए जाने के बावजूद, अब तक किसी औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए गए हैं।

हिमालय और हिंदूकुश पर्वत श्रृंखलाओं में नदियां, मौसम तंत्र और बुनियादी ढांचे अक्सर कई देशों की सीमाओं से होकर गुजरते हैं। हमारे मौजूदा शोध से पता चलता है कि एक जगह से शुरू होने वाला खतरा काफी दूर निचले इलाकों में जानलेवा साबित हो सकता है और इसके लिए नई चेतावनी प्रणालियों की जरूरत को रेखांकित करता है।

बढ़ते हुए तापमान के कारण हिमनदों का स्तर कम होने, बर्फ पिघलने और पहाड़ों की ढलानों के कमजोर होने से खतरा और बढ़ रहा है, भले ही जलवायु परिवर्तन हर आपदा की इकलौती वजह न हो। वहीं दूसरी ओर, सड़कों और जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण के कारण खतरे वाले इलाकों में आबादी और बुनियादी ढांचा बढ़ता जा रहा है।

आपदा आने से पहले सहयोग जरूरी:

नेपाल और उसके पड़ोसी देशों के बीच सीमा पार पूर्व-चेतावनी के कुछ उपाय पहले से मौजूद हैं और ऐसी प्रणालियां खासकर बार-बार आने वाली बाढ़ के लिए हैं। लेकिन हाल में अचानक आई आपदा और एक के बाद एक घटने वाली घटनाएं अलग चुनौती पेश करती हैं। किसी भी चेतावनी का फायदा तभी है जब वह सही समय पर हर स्तर तक पहुंचे — पहाड़ों में लगे सेंसर से लेकर वैज्ञानिक एजेंसियों, राष्ट्रीय और स्थानीय अधिकारियों तक और उनसे होते हुए घाटी एवं निचले मैदानों में घरों तक।

नेपाल के कोशी बेसिन के कुछ हिस्सों में स्थानीय समुदाय पर आधारित बाढ़ चेतावनी प्रणाली पहले से काम कर रही है, जहां नदी के ऊपरी हिस्से में लगे मापक उपकरण और प्रशिक्षित स्थानीय स्वयंसेवक निचले गांवों के लोगों को सुरक्षित बचाते हैं। एक क्षेत्रीय पूर्व-चेतावनी प्रणाली को इन स्थानीय तंत्रों को राष्ट्रीय और सीमा-पार निगरानी से जोड़ना होगा, ताकि खतरे की जगह से जानकारी तुरंत उन लोगों तक पहुंच सके जिन्हें सबसे ज्यादा खतरा है। इसके लिए पहले से यह तय करना होगा कि क्या जानकारी साझा की जाएगी, देशों और एजेंसियों के बीच अलर्ट कैसे भेजे जाएंगे और उस पर क्या कदम उठाए जाएंगे।

इसके लिए नयी तकनीक के साथ-साथ संस्थागत बदलावों और मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। इस क्षेत्र की मौजूदा जल संधियां पानी के बंटवारे और बांधों के प्रबंधन के लिए बनाई गई थीं, न कि ऊंचे पहाड़ों में एक के बाद एक आने वाले खतरों से निपटने के लिए।

सरकारें हिमालयी नदियों और उनसे जुड़े खतरों के लिए जिम्मेदार स्थायी निकाय (संस्थाएं) बना सकती हैं। वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं को शामिल करके बनी ये संस्थाएं पड़ोसी देशों के अपने समकक्षों के साथ मिलकर काम कर सकती हैं। इनका काम आंकड़े साझा करना, ग्लेशियरों, झीलों और ढलानों की संयुक्त निगरानी करना और सीमा पार चेतावनियों का समन्वय करना होना चाहिए।

इसका उद्देश्य आपदाओं के बीच के समय में सहयोग को एक नियमित और मजबूत आदत बनाना है, न कि संकट के समय जल्दबाजी में कदम उठाना, जब हालात इतनी तेजी से बदलते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बातचीत का समय ही नहीं मिलता। इसके लिए जरूरी नहीं है कि पड़ोसी देश पहले अपने सभी पुराने विवाद सुलझाएं, तभी आगे बढ़ा जा सकता है। बल्कि, केवल आपदा चेतावनी तंत्र को एक साझा मानवीय व्यवस्था मानकर बिना किसी रुकावट के जारी रखने की आवश्यकता है।

ऊंचे पहाड़ों से जुड़े खतरों का अनुमान लगाने और उनकी निगरानी करने की तकनीकें तेजी से बेहतर हो रही हैं। अब हमें अधिक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक और नीतिगत सहयोग की आवश्यकता है, साथ ही ऐसे चेतावनी तंत्रों की जरूरत है जो इन जानकारियों को तुरंत ठोस कार्रवाई में बदल सकें।

(द कन्वरसेशन) वैभव देवेंद्र

देवेंद्र