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#ATAL_RAAG_राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पित थे शंकर प्रसाद जी

राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पित थे शंकर प्रसाद जी ~ कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल राष्ट्र और समाज के लिए जिनके जीवन की हर श्वास चलती है।वे जब इस संसार से …

#ATAL_RAAG_राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पित थे शंकर प्रसाद जी
Krishnamurari Tripathi Atal
Published: 16 Jul 2025 | 2:36 pmModified: 16 Jul 2025 | 2:36 pm
HIGHLIGHTS
  1. शंकर प्रसाद जी ने संघ के दायित्वों के अलावा सामाजिक, व्यावसायिक जीवन के अनेकों दायित्वों को निभाया। उनके उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए अपने कर्त्तव्यों का सम्यक पालन किया। श्रद्धेय नानाजी देशमुख के साथ उनके सम्बंध अत्यन्त प्रगाढ़ थे क्योंकि दोनों के मध्य वही वैचारिक एवं सेवाभावी सम्बंध थे जिससे राष्ट्र एवं समाज को नई दिशा दी जा सके। नानाजी देशमुख द्वारा स्थापित दीनदयाल शोध संस्थान चित्रकूट के वे राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे।
  2. शिक्षा के सम्बंध में उनका मानना था कि — “शिक्षा के साथ संस्कारों एवं राष्ट्रजीवन की बुनावट अवश्य होनी चाहिए। शिक्षा के माध्यम से आर्थिकोपार्जन एवं निज हित से कहीं अधिक राष्ट्रहित का बोध होना चाहिए।”

राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पित थे शंकर प्रसाद जी

~ कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

राष्ट्र और समाज के लिए जिनके जीवन की हर श्वास चलती है।वे जब इस संसार से विदा लेते हैं तो उनके कार्य और विचार समाज के लिए आदर्श और मानक बनते हैं। शंकर प्रसाद जी ने जैसे आजीवन श्वेत वस्त्र धारण किया ठीक वैसा ही उनका कांतिमय श्वेत-धवल व्यक्तित्व और कृतित्व था। अपनी सरलता, कर्त्तव्यपारायणता के साथ वो अनगिनत लोगों के प्रेरणास्रोत बने। समाज जीवन में सकारात्मकता और सर्जनात्मकता का संचार किया। 13 जुलाई 1934 को रामेश्वर प्रसाद-लक्ष्मी देवी ताम्रकार की संतान के रुप रीवा में जन्मे शंकर प्रसाद ने अपने कृतित्त्व की तूलिका से जीवन का जो चित्र खींचा है। वह उनकी अनुपस्थिति के बावजूद भी कार्यों,विचारों, जीवन मूल्यों के माध्यम से समाज के लिए अनुकरणीय एवं प्रेरणास्पद है। हम सब जिन शंकर प्रसाद जी को जानते हैं उसके पीछे उनके त्याग और तप की महान साधना थी।
शंकर प्रसाद जी अपने व्यवसायिक पेशे और सामाजिक जीवन में आने के पूर्व मेधावी विद्यार्थी के तौर पर चर्चित थे।प्रारंभिक शिक्षा के उपरांत उन्होंने सन् 1958 में आई.आई.टी. खड़गपुर से एम.टेक.की परीक्षा उत्तीर्ण ही नहीं की बल्कि अपने बैच के सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी के तौर पर सर्वाधिक अंक अर्जित किए। इसके लिए उन्हें स्वर्णपदक से सम्मानित किया गया।
तत्पश्चात वे भारतीय रेल्वे अभियांत्रिकी सेवा (आई.आर.ई.एस.) की परीक्षा के माध्यम से चयनित हुए। लगभग तीन वर्षों तक पश्चिमी रेलवे में सेवा दी। किन्तु पिताजी के कहने पर इस सेवा को छोड़कर पारिवारिक व्यवसाय और वास्तुकार (आर्किटेक्ट) के तौर पर विभिन्न संस्थाओं सहित स्वतंत्र तौर पर सेवाएं देने लगे। यह सब तो उनके जीवन की व्यक्तिगत उपलब्धि रहीं । किन्तु जब उन्होंने व्यक्तिगत जीवन के साथ सामाजिक जीवन की ओर कदम रखे तो आजीवन इस पथ पर चलते रहे ।उन्होंने राष्ट्रीयता ,सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के साथ समाज को नई दिशा देने के लिए 'सेवा को संकल्प' माना। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विविध दायित्वों का निर्वहन करने के साथ ही विभिन्न सामाजिक क्षेत्र की संस्थाओं को अपने कृतित्व के माध्यम से नए आयाम दिए। उन्होंने व्यष्टि से समष्टि की ओर स्वयं को दिशा दी — तो अपनी कार्यकुशलता ,अनुशासनबद्धता ,उच्च जीवनादर्शों, सिद्धांतों को लेकर प्रतिबद्धता के पर्याय बनते चले गए।

पहले-पहल मैंने शंकर प्रसाद जी को अपने पिताजी के माध्यम से जाना। उनकी सादगी,सरलता और आत्मीयता के किस्से सुने। ये बात तब की है — जब अपनी पढ़ाई के दौरान पिताजी सतना में संघ कार्यालय में रहते थे।‌ उस समय संघ के प्रचारक नारायण प्रसाद शर्मा जी थे।कालान्तर में संघ कार्यालय का नामकरण 'नारायणकुटी' हुआ। पिताजी 'प्रताप' शाखा के स्वयंसेवक थे और शाखा लगाया करते थे।उसी समय शंकर प्रसाद जी के संपर्क में आए। पिताजी बताते हैं कि शंकर प्रसाद जी स्वयंसेवकों के प्रति अगाध स्नेह रखते थे। उनके पास उस समय (इंपाला) कार थी। पिताजी उनके साथ अक्सर भ्रमण पर जाया करते थे। कहने का अभिप्राय ये कि कोई भी व्यक्ति जब व्यक्तित्व की यात्रा तय करता है तो वो ऐसा ही सहज और विनम्र होता चला जाता है।

शंकर प्रसाद जी का जीवन वह दर्पण था जिसमें कोई भी अपने को देख सकता था। यह आँकलन कर सकता था कि हममें कितनी कमियाँ हैं? उनका सुधार कैसे किया जाना चाहिए।वर्तमान पीढ़ी शायद ही यह सोच एवं विश्वास कर सके कि एक साधारण से व्यक्ति के अन्दर असाधारण व्यक्तित्व था। वो व्यक्तित्व इतना विराट था कि—
जिसने हर उस व्यक्ति को आत्मीयता एवं स्नेह से अभिसिंचित किया। जो उनके सम्पर्क में रहा।शंकर प्रसाद जी ने अपने जीवन के मूल्य निर्धारित कर रखे थे जिनके प्रति उनकी निष्ठा एवं प्रतिबद्धता-आत्मानुशासन के पथ से होकर जाती थी।उन्होंने सिद्धांतों, आदर्शों, मूल्यों को किताबी ज्ञान के आवरण से निकालकर उनके पालन और प्रयोगधर्मिता के साथ समाज के सामने अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया‌। उन्होंने ये सिद्ध किया कि —जीवन में सिद्धांतों का पालन प्रत्येक कालखण्ड में किया जा सकता है। बशर्ते उसके प्रति स्वयं को ईमानदार होना पड़ता है।

 

समूचे विंध्य में शिक्षा के मानक के तौर पर स्थापित सरस्वती शिशु मंदिर कृष्णनगर के वे संस्थापक सदस्य रहे। इसके साथ ही उन्होंने 27 वर्षों की दीर्घ अवधि तक व्यवस्थापक के नाते अपने दायित्वों का सम्यक निर्वहन किया। शिक्षा-संस्कारों की अमृतधारा को प्रवाहित करते हुए संस्कारवान पीढ़ी तैयार करने में अपना महनीय योगदान दिया। सौभाग्यवश मुझे भी इस संस्थान के विद्यार्थी होने का गौरव मिला। वहीं सतना का आवासीय विद्यालय सरस्वती शिशु मंदिर विद्यापीठ उतैली उनके मनोमस्तिष्क के स्वप्न का साकार रुप ही है। आवासीय विद्यालय के पीछे भोपाल के शारदा विहार की तर्ज पर विकसित करने का संकल्प लिया। शंकर प्रसाद जी ने विद्यापीठ के इस स्वरूप को मूर्तरूप देने के लिए श्रद्धेय नानाजी देशमुख के मार्गदर्शन में विभिन्न क्षेत्रों के व्यक्तियों से सहयोग लिया। जो समाज के सहयोग के बाद अपने भव्य स्वरूप में रुपांतरित हुआ‌।इस प्रकार उन्होंने अपनी नवोन्मेषी दृष्टि के साथ समूचे महाकौशल अंचल को एक नवीन उपलब्धि दी। इसके पीछे उनके मस्तिष्क में ज्ञान- विज्ञान और‌ संस्कार की त्रयी ही थी। सरस्वती विद्यापीठ का विज्ञान मण्डप भी उसी का एक महत्वपूर्ण भाग है। जहाँ विद्यालयीन स्तर पर वैज्ञानिक प्रयोगों एवं विज्ञान से सम्बंधित विषयों को विद्यार्थियों को आसानी से सिखाया जा सके।

शंकर प्रसाद जी ने राजनीतिक क्षेत्र में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। सन् 1973-1974 और 1976 से 1978 तक सतना नगरपालिका के अध्यक्ष रहे। तत्पश्चात उन्होंने स्वयं को राजनीति की मुख्यधारा से अलग कर लिया। अपने व्यवसाय के साथ संघकार्य और सामाजिक कार्यों के दायित्वों का निर्वहन करने लगे। उनके जीवन में एक विशेष बात जो देखने को मिलती है वह यह है कि— उन्होंने जो कार्य अपने हाथों में लिया उसे पूर्णरूपेण निभाया। जब उन्होंने स्वयं को किसी कार्य या भूमिका से अलग किया तो उसके प्रति मुख्य धारा में रहने की कभी भी इच्छा नहीं व्यक्त की।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक की उनकी यात्रा अपने आप में मील के पत्थर सरीखी है। उन्होंने सन् 1980 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जिला संघचालक के दायित्ववान कार्यकर्ता के तौर पर अपने कार्यों को प्रामाणिकता के साथ पूर्ण किया। तत्पश्चात दो वर्ष के अंतराल पर उनके पास सन् 1982 में ही विभाग संघचालक का दायित्व आयाकर्त्तव्यनिष्ठा ,संघकार्यों को जिम्मेदारी के साथ सम्यक तरीके से निर्वहन करने की अनूठी शैली एवं सांगठनिक क्षमता के कारण उन्हें महाकौशल प्रांत के प्रांत संघचालक का दायित्व सौंपा गया। इस दायित्व को उन्होंने अपनी श्रमसाधना, पूर्ण निष्ठा के माध्यम से अनवरत १५ वर्षों तक निर्वहन किया।आगे चलकर उन्होंने स्वास्थ्य सम्बंधी कारणों के चलते दायित्व से स्वयं को अलग कर लिया‌। फिर समदर्शी स्वभाव के साथ वे एक स्वयंसेवक की भांति हमेशा सक्रिय रहे। शंकर प्रसाद जी ने अपने संघकार्य के दौरान ऐसे अनेकानेक कार्यकर्त्ता गढ़े जिन्होंने संघकार्यों को नई ऊँचाइयाँ दी‌।समाज को सशक्त करने में अपनी अहम भूमिका निभाई।

वे नपा-तुला बोलते थे लेकिन अपने कथनों में वह सबकुछ स्पष्ट कर देते थे जिससे उस विषय की पूर्ण स्पष्टता हो जाए।उन्होंने समय के प्रति प्रतिबद्धता एवं अनुशासन और जीवनादर्शों को सदैव महत्ता दी।उनके संघ कार्य के दौरान दिए गए बौद्धिकों में विषयों का सरलतम किन्तु गूढ़ार्थ विवेचन शामिल रहता था।वे देखने में जितने सीधे एवं सरल थे— सैद्धांतिक तौर पर उतने ही अधिक अनुशासन के प्रति आग्रही थे।उनकी चर्चाओं, बौद्धिकों एवं विषय विश्लेषण ,विवेचन से उनके गंभीर अध्येता वाले स्वरूप का भी अंदाजा लगाया जा सकता था।उनका मन धार्मिक, आध्यात्मिक था। वे स्वध्याय और अपनी धार्मिक कार्यों के लिए पर्याप्त समय निकालते थे। उनके परिवार के सदस्यों और उनके सम्पर्क में आए लोगों के अनुसार- शायद ऐसा कभी नहीं हुआ होगा। जब वे संघ के बौद्धिक वर्गों या सामान्य बैठकों में विषय की स्पष्टता के लिए बिन्दुवार रुपरेखा तैयार करके न ले जाते रहे हों। इसके पीछे उनका निहितार्थ इतना था कि - वे विषय के सम्बंध में जो भी कहें या बोलें ; वह पूर्णरूपेण स्पष्ट एवं तथ्यात्मक हो। ताकि विषय के स्पष्टीकरण के समय कोई अनावश्यक चर्चा विस्तार न ले पाए। विचार और विमर्श सार्थक और सरल हों। मन को छू जाने वाले और तत्वदर्शी हों।

शंकर प्रसाद जी ने संघ के दायित्वों के अलावा सामाजिक, व्यावसायिक जीवन के अनेकों दायित्वों को निभाया। उनके उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए अपने कर्त्तव्यों का सम्यक पालन किया। श्रद्धेय नानाजी देशमुख के साथ उनके सम्बंध अत्यन्त प्रगाढ़ थे क्योंकि दोनों के मध्य वही वैचारिक एवं सेवाभावी सम्बंध थे जिससे राष्ट्र एवं समाज को नई दिशा दी जा सके। नानाजी देशमुख द्वारा स्थापित दीनदयाल शोध संस्थान चित्रकूट के वे राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। शंकर प्रसाद जी ने नानाजी देशमुख के साथ चित्रकूट के ग्राम्यांचलों के विकास में सहयोगी के तौर पर सदैव कार्य किया। उन्होंने सतना में साहित्य एवं संगीतानुरागियों के सद्प्रयासों को एक मंच देने के उद्देश्य से 'संगीत भारती' की स्थापना की। इसके कार्यक्रमों को सभी के समेकित सहयोग के माध्यम से स्तरीयता प्रदान की। वे भारत विकास परिषद सतना के संस्थापक, वृद्धाश्रम सेवा सदन (चन्द्राशय चेरिटेबल ट्रस्ट) के ट्रस्टी और राष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिलब्ध् संस्थान -मानस संघ रामवन (सतना) के बतौर संरक्षक लगभग 30 वर्षों तक अपने दायित्वों को कुशलतापूर्वक निभाया।

उनके इतने वृहद विस्तीर्ण, व्यक्तित्व -कृतित्त्व को देखकर आश्चर्य होता है कि एक व्यक्ति इतने सारे दायित्वों का निर्वहन एक साथ कैसे कर सकता है? वो भी ऐसे कि जिस कार्य में वे संलग्न रहे। उसे एक नई पहचान एवं नया आयाम दिया। लेकिन शंकर प्रसाद जी ने उन सभी दायित्वों का सम्यक तरीके से निर्वहन कर हम सभी के समक्ष एक ऐसी लकीर खींची है। जो किसी को भी हतप्रभ कर सकती है। इस प्रकार यदि उन्हें एक चलती फिरती सामाजिक संस्था कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।जीवन में प्रतिष्ठा के इन मानकों को प्राप्त करने के बावजूद भी उनके अन्दर कभी भी किसी भी प्रकार का अहं भाव नहीं आ पाया। वे भले ही पेशे से व्यवसायी और वास्तुकार थे । किन्तु उन्होंने अपने इस क्षेत्र में भी लाभ को नहीं बल्कि मूल्य को प्राथमिकता दी। श्रेष्ठ भारतीय परंपरा 'साधन और साध्य' दोनों की पवित्रता को महत्व देकर कार्य किया। अपने उच्च राजनीतिक सम्बंधों के बावजूद भी उन्होंने कभी भी इसका दुरुपयोग नहीं किया‌।‌वे हर क्षेत्र में शुचिता के आग्रही थे। अतएव उन्होंने कभी भी स्वार्थ या द्वेषभाव से वशीभूत होकर किसी भी कार्य को नहीं किया। इसके पीछे उनके श्रेष्ठ सैद्धांतिक मूल्य थे जिनके पालन से वे न कभी डिगे और न हटे।वे सचमुच सादगी की प्रतिमूर्ति थे।

गंभीर, धैर्यवान ,विनम्र ,अनुशासित जीवन के साथ वे उसी तरह हँसते-मुस्कुराते एवं अपनी माधुर्यता बिखेरते रहे। मानों एक अबोध निश्छल शिशु हो जिसके लिए सभी प्रिय एवं सम्मानीय हैं।यदि कोई भी व्यक्ति पहली-पहली बार उनसे मिला होगा उनकी पृष्ठभूमि से परिचित न रहा हुआ होगा। लेकिन जब उसने शंकर प्रसाद जी के स्वभाव को देखा होगा।तत्पश्चात उसे जब भी यह ज्ञात हुआ होगा कि— शंकर प्रसाद जी की पृष्ठभूमि क्या है? उस समय क्षण! भर को उसे विश्वास ही न हुआ होगा कि— वह उसी व्यक्ति से मिला है जिसका व्यक्तित्व एवं कृतित्त्व इतना महान है।उन पर सभी लोग सहर्ष दावा कर सकते थे कि शंकर प्रसाद जी हमारे अपने स्वजन हैं तथा उन पर सभी का आत्मीयतापूर्ण अधिकार है।

उनके चिन्तन में राष्ट्रीय गौरव ,स्वाभिमान, शैक्षिक- आर्थिक-सांस्कृतिक मूल्यों के समन्वित एवं भारतीय जनजीवन की अन्तरानुभूति का पुट शामिल था।शिक्षा के सम्बंध में उनका मानना था कि — “शिक्षा के साथ संस्कारों एवं राष्ट्रजीवन की बुनावट अवश्य होनी चाहिए। शिक्षा के माध्यम से आर्थिकोपार्जन एवं निज हित से कहीं अधिक राष्ट्रहित का बोध होना चाहिए।” उन्होंने अपने प्रतिकूल स्वास्थ्य के चलते विभिन्न दायित्वों से स्वयं को मुक्त कर लिया। क्योंकि उनके ध्येय में दायित्वों का निर्वहन था— न कि दायित्व पद-प्रतिष्ठा का मानक।अपने जीवन के अन्तिम वर्षों में राजनीति के पतित स्वरूप, भ्रष्टाचार, भ्रष्ट नौकरशाही एवं समाज को निगलती निजस्वार्थ साधने की वृत्ति उन्हें उद्वेलित करती रहती थी।वे दिन प्रतिदिन सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन के मूल्यों में आ रही अप्रत्याशित गिरावट को लेकर चिन्तित रहते थे।उनका जीवन अपने आप में मिसाल है। उनके कार्य प्रेरणा हैं तथा भविष्य का मार्ग प्रशस्त करने वाले मंत्र हैं जिनका ध्यान कर सत्यनिष्ठा ,सहजता-सरलता, ईमानदारी के साथ राष्ट्र एवं समाज की सेवा में अपना योगदान दिया जा सकता है।

ईश्वर एवं विधि के नियमानुसार जिसने इस धरा में जन्म लिया है। उसका परलोक गमन सुनिश्चित है।स्वास्थ्य की प्रतिकूलताओं के कारण 15 जुलाई 2015 को शंकर नाम का वह दीप बुझ गया जो अपनी ही धुन में जलते हुए सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों को आलोकित कर रहा था।उनके परलोक गमन के दु:ख से हजारों नेत्रों से ढुलके अश्रु उनके कृतित्त्व के द्वारा खिले सुमन थे। वो सुमन जिन्होंने प्रत्येक व्यक्ति को अपना बनाकर स्नेह के सेतुबंध से बाँधे रखा। शंकर प्रसाद जी की भौतिक देह का अवसान भले ही हो गया हो। किन्तु उनके विचारों एवं कार्यों की काया प्रतिक्षण हम सभी के समक्ष उपस्थित है। उनके द्वारा स्थापित मूल्य तथा जीवन को इस राष्ट्र एवं समाज को समर्पित करने की भावना सदैव प्रेरणादीप की भाँति जगमगाते रहेंगे। आज भी जब कर्त्तव्यनिष्ठा, मूल्यों और आदर्शों के प्रति समर्पण, अनुशासन और शुचिता की बात आती है। उस समय शंकर प्रसाद जी का जीवन दृश्य चित्र बनकर मानस पटल पर उभर आता है । उन्होंने अपने जीवन के माध्यम से अपने नाम को चरितार्थ किया है।उनके विचार और कार्य समाज की धरोहर हैं और नई पीढ़ी के लिए विरासत हैं। ये विरासत श्रम निष्ठा के साथ संकल्पों को साकार करने वाली है। नवोन्मेषी दृष्टि के साथ समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने वाली है।
~ कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

( लेखक IBC24 में असिस्टेंट प्रोड्यूसर हैं)

Disclaimer- आलेख में व्यक्त विचारों से IBC24 अथवा SBMMPL का कोई संबंध नहीं है। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर से जिम्मेदार हैं।

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Web Title: Shankar Prasad ji was dedicated towards the nation and society BY KRISHNA MURARI TRIPATHI ATAL

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