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Bilaspur High Court Verdict : SC-ST एक्ट पर हाईकोर्ट का कड़ा रुख! इस प्रमाण पत्र के बिना नहीं चलेगा केस, 21 साल बाद रद्द हुई सजा

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा है कि एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए वैध जाति प्रमाणपत्र जरूरी है। प्रमाण के अभाव में कोर्ट ने सजा रद्द कर दी।

Bilaspur High Court Verdict

Bilaspur High Court Verdict

Sneha Singh
Published: 25 Apr 2026 | 11:36 pmModified: 25 Apr 2026 | 11:41 pm
HIGHLIGHTS
  1. एससी/एसटी एक्ट में जाति साबित करना जरूरी: हाईकोर्ट
  2. वैध जाति प्रमाणपत्र के बिना अपराध सिद्ध नहीं
  3. 21 साल पुराने मामले में सजा आंशिक रूप से रद्द

बिलासपुर : Bilaspur High Court Verdict  छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराध साबित करने के लिए जाति साबित होना जरूरी है। यह आवश्यक है कि अभियोजन यह साबित करे कि पीड़ित अनुसूचित जाति-जनजाति से संबंधित है और आरोपी उस वर्ग से नहीं।

वैध जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य

जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास ने स्पष्ट किया कि इसके लिए वैध जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य है। मामला एक अपील से जुड़ा था, जिसमें शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि सरकारी जमीन पर दुकान निर्माण को लेकर विवाद के दौरान आरोपियों ने उसे जातिसूचक शब्द कहकर अपमानित किया, मारपीट की और जान से मारने की धमकी दी। इस आधार पर आईपीसी की धाराओं 294, 323, 506/34 और एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(1)(आर) के तहत एफआईआर दर्ज हुई थी। ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को धारा 294, 506 आईपीसी और 3(1)(आर) के तहत दोषी ठहराया था।

सजा को रद्द करने का आदेश

ठोस और विश्वसनीय प्रमाणों से जाति सिद्ध होना जरूरी आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील करते हुए तर्क दिया कि शिकायतकर्ता का जाति प्रमाणपत्र केवल तहसीलदार द्वारा जारी अस्थायी प्रमाणपत्र था, जो सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी नहीं था और इसलिए वैध नहीं माना जा सकता। SC ST Act Guidelines अदालत ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि शिकायतकर्ता किसी जाति से है, बल्कि इसे ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य से सिद्ध करना जरूरी है। चूंकि इस मामले में वैध जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया गया, इसलिए अधिनियम अनुसार अपराध सिद्ध नहीं हुआ और इस धारा में दी गई सजा को रद्द कर दिया गया।

घटना को 21 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है

अश्लील गाली गलौच पर दोषसिद्धि, काटी सजा पर्याप्त हालांकि कोर्ट ने कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर गवाहों के बयानों के आधार पर आईपीसी की धारा 294 (अश्लील भाषा के उपयोग) के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा। वहीं, धारा 506(2) के तहत आपराधिक धमकी के आरोप को पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में खारिज कर दिया गया। सजा के प्रश्न पर अदालत ने ध्यान दिया कि घटना को 21 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है और आरोपी पहले ही एक दिन जेल में रह चुके हैं। इसलिए छह महीने की सजा को घटाकर पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया गया और जुर्माना 500 से बढ़ाकर 2000 प्रत्येक कर दिया गया।

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लेखक के बारे में

Sneha Singh
Sneha Singh

I’m Sneha Singh, a journalist and news producer at IBC24. A Gold Medalist in Journalism and Mass Communication, I specialize in news production, content writing, and digital storytelling. With a keen interest in political and crime reporting, I believe in delivering accurate, ethical, and impactful journalism that informs and connects with people.

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Web Title: Caste Proof Mandatory Under SC/ST Act: Chhattisgarh High Court Sets Aside Conviction

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