NindakNiyre: छत्तीसगढ़ में कैसे रिवाइव कर सकती है कांग्रेस- भाग-1
CG Cong
बरुण सखाजी श्रीवास्तव
(राजनीतिक विश्लेषक)
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस विपक्ष में है। 2018 में प्रचंड बहुमत से आई कांग्रेस 2023 तक लोगों की नजरों से उतर गई। नतीजा ये हुआ कि जिस कांग्रेस की जीत की हर संभावना को सही बताया जा रहा था अंततः वह सिमट गई 35 में। 35 वह फिगर है जो कांग्रेस को इस सदी में पहली बार मिला। वह हर सूरत में 36-39 के बीच रही है, भले ही 15 साल विपक्ष में रही हो।
जाहिर है इसका सीधा जिम्मा मुख्यमंत्री का है। लेकिन थोड़ा जिम्मा प्रदेश अध्यक्ष को भी लेना चाहिए। थोड़ी जिम्मा क्षेत्रीय क्षत्रपों को भी लेना चाहिए। कांग्रेस एकत्व के मंत्र की कमी से जूझ रही है। तब भी और अब भी। यह उसके डीएनए का एक हिस्सा बनता जा रहा है। सिंगल कमांड के नाम पर सिर्फ गांधी परिवार ही दिखाई, सुनाई, समझ आता है। इसके अलावा सबके अपने-अपने वर्टिकल्स हैं। इन वर्टिकल्स ने ही कांग्रेस को इतना दुबला, पतला कर दिया है कि वह हृष्ट-पुष्ट भाजपा के सामने टिक नहीं पा रही।
यह तो हुई समस्या, लेकिन समाधान क्या है। कांग्रेस स्पेशली छत्तीसगढ़ कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर सही मूल्यांकन, संगठन स्तर पर निर्माण को लेकर सही चयन और सही तरीके का फिलहाल अभाव है। प्रदेश में मौजूदा लेयर को देखें तो दीपक बैज, टीएस सिंहदेव, भूपेश बघेल, चरणदास महंत, ताम्रध्वज साहू, रविंद्र चौबे, ज्योत्सना महंत और मोहन मरकाम बड़े नेताओं में शामिल हैं। गुजरे दौर यानि 2010 से 2020 के बीच की लेअर को देखेंगे तो रविंद्र चौबे, धनेंद्र साहू, चरणदास महंत, भूपेश बघेल, टीएस सिंहदेव शामिल माने जा सकते हैं। सदी के पहले दशक के दौर में कांग्रेस के पास नेताओं की बड़ी संख्या थी। दमदार और कदमदार भी। कदमदार मतलब पांव वाले, जमीन पर थामे रखने वाले।
सवाल है कि कांग्रेस नए नेतृत्व को आगे बढ़ाती है तो नवाचार कहलाएगा, लेकिन क्षत्रपों को गुड़गुड़ाहट होगी। बतौर राजनीतिक विश्लेषक मैं यही कह सकता हूं, पार्टी को नए नेतृत्व की बजाए अनुभव को तवज्जो देना चाहिए। यह तवज्जो कैसे दिया जाए, चलिए इसके एक फॉर्मूले को समझते हैं।
स्थानीय प्रभावशाली
2023 को मीटर बनाकर नापा जाए तो भूपेश बघेल बतौर सीएम प्रादेशिक प्रभावशाली होने थे, लेकिन नहीं हो पाए। सरगुजा साफ, बस्तर हाफ, मैदान लुट गया। दुर्ग संभाग को उनके प्रभाव वाला माना जाए तो वहां भी अच्छे-अच्छे नहीं निकाल पाए। अर्बन में सूपड़ा साफ हुआ, रूरल में आधी अधूरी जीतें हुईं। लोकसभा में और पत्ता साफ हुआ। अब टीएस सिंहदेव को देखें तो वे प्रदेश और अपने क्षेत्र सरगुजा दोनों पैमानों पर बेअसर रहे। या कहें असरदार तो रहे लेकिन कांग्रेस के लिए नहीं। उनकी ढाई साला नाराजगी ने भीतर ही भीतर काम किया और स्वयं की सीट समेत सब हार गए। तो इस पैमाने पर वे भी मजबूती से उतरते नजर नहीं आते। अब पूर्व पीसीसी मोहन मरकाम को देखें तो वे अपनी ही सीट पर नहीं सर्वाइव कर पाए तो बस्तर पर क्या करते। मगर टीएस की तरह बेनेफिट ऑफ डाउट देना चाहिए। उन्हें कमजोर किया गया। उन्हें खत्म किया गया। बैज के हाथों में पार्टी दी गई। रही कसर उनके ही क्षेत्र के श्रीवास्तव बंधुओं ने कर डाली। बैज चुनावी पैमानों पर सफल नहीं कहे जा सकते। क्योंकि विधानसभा, लोकसभा, पंचायत, निकाय सभी हारे हैं। उपचुनाव भी। लेकिन बैज को भी बेनेफिट ऑफ डाउट देकर छोड़ना चाहिए। नए थे, नवेले थे, पार्टी की गतिविधियों में कम हिलेमिले थे। पर अब परफैक्शन हासिल करने की ओर हैं, लेकिन देर हो गई। अपनी विधानसभा भी नहीं बचा पाए थे। रविंद्र चौबे, ताम्रध्वज साहू का मिजाज लड़ाकू नहीं है। वे सौम्य छवियों के सीधे चलने वाले नेता हैं। ज्योत्सना महंत दो बार की सांसद हैं। बावजूद चरणदास महंत की छाया से बाहर नहीं निकल पाई हैं। अब बात करते हैं चरंणदास महंत की। महंत ने अपने प्रभाव वाली छह की छह सीटें जिताई हैं। अपने जिले के संकट मोचक हैं। बालेश्वर के लिए लड़ रहे हैं। बतौर नेता प्रतिपक्ष पूरी मजबूती से पेश आते हैं। सरकार के साथ संवाद भी अच्छा रखते हैं। पार्टी अगर इस पैमाने पर चुने तो महंत पीसीसी के लिए परफैक्ट हो सकते हैं।
महंत बनेंगे तो क्या बदलेगा
पहली चीज महंत बनें, दूसरी चीज उन्हें फ्रीहैंड मिले। फिर वे काम शुरू करेंगे। अनुभव में सबसे सीनीयर, धैर्य में सबसे गहरे। आगे बढ़कर और चुपचाप खेलने दोनों ही विधाओं के मास्टर हैं। छत्तीसगढ़ को पग-पग नापा, जोखा और चखा है। कार्यकर्ताओं का अपना जेनेरिक काडर है। नए-पुराने का मिश्रण बनाना आता है। वैयक्तिक स्तर पर लोगों के साथ जुड़ाव रखते हैं। तुलनात्मक रूप से महंत कांग्रेस को ठीक से उठा सकते हैं। कमी भी है। वे डरे हुए लगते हैं। सत्ता-सरकार से मैनेज जैसे नजर आते हैं। मुखर कम दिखते हैं। चुपचाप खेला करने के दौरान कई बार अपनो को भी निपटा डालते हैं। इसलिए टीम उन पर खुला विश्वास करन से ज्यादा सावधान रहना पसंद करती है।
(भाग-2 में पढ़िए, कांग्रेस मुद्दों में कहां ठीक कर रही है और कहां चूक)
——–

Facebook


