NindakNiyre: मैं हरीश राणा नहीं हूं, मगर होता तो क्या होता, कभी सोचकर देखिए, आंखों के कोये न गीले हो जाएं तो इंसान न कहाइएगा

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  • Publish Date - March 15, 2026 / 10:05 PM IST,
    Updated On - March 15, 2026 / 10:05 PM IST

बरुण सखाजी श्रीवास्तव, सह-कार्यकारी संपादक, आईबीसी-24

 

मुझे कुछ कहना है और कहना ही है। यह कहना किसी कलम से नहीं दिल से कहना है। इस कहने को एक आलेख के रूप में मत पढ़िए न सोचिए न देखिए। खुद हरीश बनकर सोचिए। समझिए। 8 अरब लोग मिलकर हरीश जैसे चंद सौ, हजार, लाख करोड़ लोगों को नहीं पाल सकते। सेवा पर केंद्रित इफरात धर्म, मान्यता, पंथ, पथिक, समूह, संघ, देश, राष्ट्र, समाज इस सेवा पर मौन हैं। मूक हैं। ऐसे व्यर्थ के तर्कों में मशरूफ हैं, हम भगवान की गोद में दे रहे हैं। सबको माफ करो, सबसे माफी मांगो.. वाह। भगवान की गोद में देने वाले और लेने वाले, सबको माफ करने वाले और माफी मांगने वाले तुम कौन हो। और हम कौन हैं हरीश राणा को इच्छा की मौत सुलाने वाले! किसकी इच्छा है यह? उसकी जो बोल-बता नहीं कर सकता। किसने यह इच्छा किसे बताई? और आप कौन हो? जो इस इच्छा को विधिक, प्राकृतिक, सांसारिक या कोई भी इच्छा बताने वाले, परिभाषित करने वाले, सर्टिफाइ करने वाले, न्यायीकृत करने वाले बने।

 

यह एक फ्लड गेट खोल दिया गया है। दुनिया अपने-अपनों को अभी तक आर्थिक जिम्मेदारी तो मान ही रही है। बच्चे पैदा करने से लेकर बीमा कंपनियों के बढ़ते शेयर ये बताते हैं कि हम अपने स्वास्थ, जेब को लेकर बहुत ज्यादा डरे, मरे हुए हैं। हम ये मानने तैयार नहीं हैं कि यह एक शरीर है और इस शरीर का वह सब हाल हो सकता है जो एक केंचुएं, हिरण, बंदर या अन्य जीव के शरीर को हो सकता है। हम प्रकृति से न अलग हैं न हटकर हैं। हम इसके एक अंश हैं और किसी रूप में प्रिविलेज्ड नहीं हैं। बस इतना ही हममे एक अंतर है कि हमारे बाजू में बैठे किसी इंसान की पीड़ा से हम पीड़ित हो सकते हैं। हम एक बूचड़खाने में कट रहे पशुओं के पास खड़े चारा चरने में मशरूफ दूसरे पशु की तरह नहीं हैं। विधिक मूर्खताओं में हम सदा ही आगे रहे हैं। किसी भी चीज को विधिक बनाना हमारी बौनी व्यवस्थाओं ने न्याय मान लिया है। सोचिए, अभी एक बीमार शरीर की विदाई को विधिक मान्यता दी है, कल एक विकृत शरीर की विदाई का गेटवे खुलेगा, परसों नौकरी या आजीविका गंवाने वाले पैरेंट्स अपने बच्चों के एक्स्ट्रा होने की स्थिति में मृत्यु मांगेंगे। अगले कदम में विकृत बच्चों को जिम्मेदारी मानकर मार डालने की विधियां निकाली जाएंगी। हम स्वीकारेंगे ही नहीं कि ऐसा हो सकता है और होता है और होता रहेगा। हमे विधाता ने सोचने, समझने की शक्ति दी है। बहुआयामी ढंग से विचार का हक दिया है।

 

जो लोग सोचते हैं हरीश राणा मशीनों, दवाओं के सहारे जिंदा था तो वे ये भी जान लें कि वह अपने जीने के इच्छाबल से जिंदा था। सिर्फ मशीनों से कोई जिंदा रहता तो कोई धनपति कभी न मरता। आपने विधिक रूप से उसे मरणासन्न करके उसके इच्छाबल पर कुठाराघात किया है। जो मशीनें उसका कष्ट कम कर रही थी वे हटाकर आपने कष्टमय मृत्यु की ओर धकेला है। सोचिए अगर वह ऐसे में भी शैया पर शरीर लिए पड़ा रहा तो कौन सा कोर्ट हरीश को इच्छा मृत्यु देगा। अंततः प्रकृति ही संहारक होती है और सृजनकर्ता भी। एक पुरुष अपने वीर्य को जिस भी तरीके से स्त्री के शुक्राणुओं तक पहुंचा पाए, पहुंचा दे बावजूद वह संभावित बच्चे के रंग, आकार, प्रकार, शरीर की अन्य स्थितियां और स्वभाव का पूर्वनिर्धारण नहीं कर सकता। फिर वह आखिर मृत्यु का निर्धारक कैसे हो सकता है।

 

माननीय कोर्ट निर्ममता से कहना चाहता हूं, आपने 8 करोड़ लोगों की बुद्धमत्ता को एक हथोड़ी से जड़े गए फैसले में कैद कर दिया। संकुचित कर दिया। समग्र समाज, सेवा, संसार, इंसान को इच्छा मृत्यु दे डाली। हरीश राणा को नहीं। वह तो जिंदा और सदा स्वस्थ रहकर कल भी आपके सामने दी गई धीमी मौत का उत्तर लेने खड़ा हो सकता है। आपने सारे पंथ, धर्म, समाज, सोच वांग्मय, विचार, विमर्श, विन्यास को धता दिखा दिया। सनातन में इच्छामृत्यु कोई और नहीं स्वयं ही लेने की शक्ति कहलाती है। जैसे कि गंगापुत्र भीष्म को प्राप्त थी। वे कई दिनों तक बाणों के विस्तर पर लेटे रहे। मगर मृत्यु का वरण अपने प्रणपूर्ति के बाद ही किया। हटा लो मेडिकल संसाधन फिर भी हरीश जिंदा लौट आया तो क्या करोगे?

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