NindakNiyre: हमे 30 जनवरी को ही शहीद दिवस क्यों मनाना है?
Barun
बरुण सखाजी श्रीवास्तव
अंग्रेजों से भारत की आजादी के लिए 90 वर्षों तक चला दुनिया का सबसे बड़ा आंदोलन कालखंड था। अंग्रेजों की अत्याचारयुक्त धूर्त नीतियों से निपटने के लिए इन वर्षों में 13 हजार 500 लोगों के प्रामाणिक और करीब एक लाख लोगों के अप्रमाणिक योगदान के दस्तावेज प्राप्त होते हैं। अर्थात देश के लिए कुर्बान होने वालों में इन 90 वर्षों में हर प्रदेश, क्षेत्र और वर्ग के लोग शामिल रहे हैं। हम इस बलिदान को एक तीस जनवरी में कैसे समेट सकते हैं? इनके अलावा 75 वर्षों में भारत की विभिन्न सेनाओं ने 2 लाख से अधिक जवानों को गंवाया है। राज्यों की पुलिस और बल के आंकड़े और जोड़ लें तो भारत की व्यवस्था, खुशहाली, रक्षा और विकास के लिए अब तक 10 लाख से ज्यादा लोगों ने जान देकर कुर्बानियां दी हैं। 30 जनवरी को शहीद दिवस बना देना इतिहास के साथ नाइंसफी है। यद्यपि 30 जनवरी को हमारे आजादी के आंदोलन के राजनीतिक चेहरे की हत्या का दिन जरूर माना जाना चाहिए। इस हत्या का आजादी से लेना-देना नहीं था। यह हत्या विस्तृत, विशाल और विराट भारत को विभाजित करने और एक राजनेता के गलत राजनीतिक, भूभागीय फैसलों के आक्रोष में की गई थी। यद्यपि कारण जो भी हत्या ठीक नहीं थी।
इन 90 सालों में अलग-अलग कालखंडों में हुए शहीदों की किसी सरकारी दस्तावेज में बहुत प्रामाणिक संख्या तो नहीं मिलती, किंतु पीएमइंडिया डॉट जीओवी पर 7 मार्च 2019 को एक किताब में इसका बासुबूत दस्तावेज मिलता है। इस पुस्तक का नाम था डिक्सनरी ऑफ मारटीयर्स ऑफ इंडियाज फ्रीडम स्ट्रगल (1857-1947)। इसके मुताबिक भारत की आजादी में 13 हजार 500 बलिदानियों ने अपने प्राणों का दान किया है। इन साढ़े तेरह हजार शहीदों में लगभग 4400 शहीद हिमाचल, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली जैसे राज्यों के थे। जबकि लगभग 3500 शहीदों का ताल्लुक एमपी, यूपी, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कश्मीर से था। इसमें 1400 के करीब गुजरात, सिंध, महाराष्ट्र से थे। लगभग 3300 की संख्या में ओडिशा, बिहार, बंगाल, आसाम, पूर्वोत्तर से ताल्लुक रखते थे। दक्षिण भारतीय राज्यों में आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल से 1450 शहीदों की संख्या दर्ज है।
प्रधानमंत्री मोदी ने डिक्सनरी ऑफ मारटीयर्स ऑफ इंडियाज फ्रीडम स्ट्रगल (1857-1947) का विमोचन किया था। इस किताब को इंडियंस काउंसिल ऑफ हिस्ट्री रिसर्च (आईसीएचआर) ने अपने प्रामाणिक दस्तावेजों में कमिशन किया हुआ है। इसलिए इस पुस्तक में बताए गए फिगर और कथाक्रम को प्रामाणिक माना जाता है।
यह पूरी बात कहने का अर्थ सिर्फ इतना है कि जब हम समूह की उपेक्षा करके व्यक्ति में गौरव खोजते हैं तो विंडबनाओं का गट्ठर बनाते हैं। 30 जनवरी इतिहास के खाते में खराब दिन हो सकता है, लेकिन 13500 आजादी के अमर शहीदों और अब तक देश की सुरक्षा में शहीद हुए विभिन्न बलों के दसियों हजार जवानों की शहादत तीस जनवरी की शहादत से छोटी कैसे हो सकती है? इस दोष को समय रहते ठीक तो करना ही पड़ेगा।

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