IBC24 Swarn Sharda Scholarship 2022 : तेंदुपत्ता संग्रहण करके बबीता बनी 12वीं टॉपर, अब डॉक्टर बनकर करेगी सेवा

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IBC24 Swarn Sharda Scholarship 2022 : तेंदुपत्ता संग्रहण करके बबीता बनी 12वीं टॉपर, अब डॉक्टर बनकर करेगी सेवा

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  • Publish Date - July 7, 2022 / 05:53 AM IST,
    Updated On - July 28, 2023 / 05:33 PM IST

IBC24 Swarn Sharda Scholarship 2022: Success Story of 12th Topper Babeeta singh

रायपुर। अपने सामाजिक सरोकारो को निभाते हुए IBC24 समाचार चैनल हर साल स्वर्ण शारदा स्कॉलरशिप सम्मान से जिले की टॉपर बेटियों को सम्मानित करता है। इस साल भी IBC24 समाचार चैनल की ओर से स्वर्ण शारदा स्कॉलरशिप दिया जा रहा है। IBC24 की ओर से दी जाने वाली स्वर्ण शारदा स्कॉलरशिप केवल टॉपर बेटियों को ही नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ के प्रत्येक संभाग के टॉपर बेटों को भी दी जाएगी। सरगुजा जिले की बबीता सिंह ने जिले का मान बढ़ाया है। 12वीं परीक्षा में 470 अंक हासिल किया। बबीता सिंह ने सरस्वती शिशु मंदिर, अंबिकापुर में अपना पढ़ाई पूरी की है।

बबीता सिंह ने कहा कि “जब मैं तेंदुपत्ता, चिरौंजी, सरई फूल संग्रहण से पैसे लाकर पापा को देती तो खुशी मिलती, टॉपर बन गई तो यह खुशी दोगुना हो गई और स्कॉलरशिप ने इसे तिगुना कर दिया।“

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तेंदुपत्ता संग्रहण करके बबीता बनी जिले की टॉपर, सपना डॉक्टर बनने का

बबीता सिंह की जुबानी.. जंगल में सरई के फूल, तेंदुपत्ता संग्रहण, चिरौंजी संग्रहण के काम करती हूं। मम्मी-पापा पढ़े लिखे नहीं हैं। महात्मा गांधी रोजगार गारंटी (मनरेगा) में श्रमिक हैं। बमुश्किल घर चल पाता है। मैं अपनी पढ़ाई में पूरी तरह से व्यस्त नहीं हो सकती। फिर भी मां-पापा हमेशा मुझे पढ़ने में व्यस्त रहने को कहते हैं। जंगल में जब सरई के फूल, चिरौंजी या तेंदुपत्ता संग्रण करके आती और दो पैसे पापा के हाथ में रख देती हूं तो खुशी मिलती है। ऐसे में टॉपर बनने की खुशी और मिल जाए तो यह डबल खुशी तो है ही, साथ ही यह ट्रिपल खुशी भी। आईबीसी-24 की स्वर्ण शारदा स्कॉलरशिप मेरे लिए वास्तव में जीवन बदलने वाली सिद्ध होगी। मैं जानती हूं कैसे यहां तक पहुंची हूं। मेरा सपना है, डॉक्टर बनूं। इसके लिए आगे की पढ़ाई करनी है। तैयारी करनी है। डॉक्टर बनकर अपने लोगों के बीच ही सेवाएं देने का सपना है। यहां के स्वास्थ्य के हालात अच्छे नहीं। मेरी आर्थिक हालत ऐसी नहीं है कि ट्यूशन कर पाती, तो सेल्फ स्टडी को ही अपनी ताकत बनाया। स्कूल की सभी कक्षाओं में मुझे मेरे रिश्तेदारों का बहुत साथ मिला। चूंकि मैं अंबिकापुर के कुसुमी गांव में रहती हूं। वहां से अंबिकापुर आना-जाना संभव नहीं था। इसलिए यहां रिश्तेदार के यहां रही। ऐसे ही दो साल पहले तक लैलुंगा में रही है। अंबिकापुर में भी स्कूल दूर था तो 4 किलोमीटर रोज चलना मेरे लिए आम बात है। यह संघर्ष मुझे अब नहीं अखरता। पापा-मम्मी की खुशी देखकर ऐसा लगता हैं मैंने सब कुछ पा लिया।

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