नयी दिल्ली, दो जुलाई (भाषा) सरकार का 10,000 करोड़ रुपये का विमान ईंधन कीमत स्थिरीकरण कार्यक्रम शुरू नहीं हो पाया है। किसी भी एयरलाइन ने इस योजना के लिए हस्ताक्षर नहीं किया है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत घटने से इसको लेकर आकर्षण नहीं रहा। सूत्रों ने यह जानकारी दी।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पिछले महीने सार्वजनिक क्षेत्र की खुदरा ईंधन विक्रेताओं को एयरलाइन को विमान ईंधन (एटीएफ) तय कीमतों पर तीन साल तक बेचने के लिए क्षतिपूर्ति देने वाली 10,000 करोड़ रुपये की एकबारगी योजना को मंजूरी दी थी। इसका मकसद पश्चिम एशिया संकट की वजह से ईंधन की बढ़ती कीमत से एयरलाइन कंपनियों को बचाना था।
यह योजना स्वैच्छिक थी और एयरलाइंस को लगभग 115 रुपये प्रति लीटर की तय कीमत का लाभ उठाने के लिए तेल विपणन कंपनियों के साथ समझौता करना था। हालांकि, सूत्रों के मुताबिक, अब तक किसी भी एयरलाइन ने इस योजना में शामिल होने के लिए हस्ताक्षर नहीं किए हैं।
इसकी वजह यह हो सकती है कि जून के बीच में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें घटनें लगीं। इससे तय कीमत आकर्षक नहीं रही।
विमान ईंधन की कीमत एक जुलाई को घटकर 110 रुपये प्रति लीटर हो गई। यह नौ जून को घोषित 115 रुपये प्रति लीटर से कम है।
इस स्वैच्छिक योजना के तहत, इसमें शामिल एयरलाइंस को 86.32 रुपये प्रति लीटर की तय ‘फ्री-ऑन-बोर्ड’ मानक कीमत चुकानी थी। साथ ही हवाईअड्डा शुल्क, तेल कंपनी का मार्जिन और लागू कर भी देने थे। इससे प्रभावी बिक्री कीमत दिल्ली में 115 रुपये प्रति लीटर, मुंबई में 114.5 रुपये और चेन्नई में 139 रुपये प्रति लीटर बैठती। जो विमान कंपनी इस योजना को नहीं चुनती, उन्हें बाजार से जुड़ी कीमते चुकानी थी।
सूत्रों ने कहा कि जब तीन जून को इस योजना की घोषणा की गई थी, तब बाजार से जुड़ी एटीएफ की कीमत लगभग 142 रुपये प्रति लीटर थी। हालांकि, उसके बाद अमेरिका और ईरान के बीच अंतरिम शांति समझौते से कीमतें कम हो गईं। समझौते से दुनिया के महत्वपूर्ण तेल मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिये आपूर्ति बाधित होने की आशंका कम हो गई।
इस योजना की घोषणा विमान कंपनियों को ईंधन की कीमतों के बारे में स्पष्टता देने के लिए की गई थी। जो एयरलाइन कीमत स्थिरीकरण योजना को चुनतीं, उन्हें तीन साल तक 115 रुपये प्रति लीटर पर एटीएफ मिलता रहता और वे वैश्विक मानक में उतार-चढ़ाव से सुरक्षित रहती। दूसरी तरफ, जो एयरलाइन इसमें शामिल नहीं होतीं, उन्हें कीमतों में गिरावट का फायदा तो मिलता, लेकिन वैश्विक कीमत बढ़ने पर उन्हें अधिक कीमत भी चुकानी पड़ती।
सूत्रों ने बताया कि यह योजना पूरी तरह से स्वैच्छिक थी और एयरलाइन कंपनियों को यह तय करना था कि वे इसमें शामिल होना चाहती हैं या नहीं।
उन्होंने कहा कि किसी भी एयरलाइन के इस योजना से नहीं जुड़ने से तकनीकी रूप से यह अभी तक शुरू नहीं हो पाई है।
सरकार ने जब एटीएफ की कीमत 115 रुपये प्रति लीटर तय करने की घोषणा की, तो दिल्ली में इसकी मौजूदा खुदरा कीमत लगभग 105 रुपये प्रति लीटर थी। यह कीमत अप्रैल से ही स्थिर बनी हुई थी, क्योंकि फरवरी के आखिर में पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद वैश्विक स्तर पर ईंधन की कीमतें बढ़ने के बावजूद, उसका केवल कुछ हिस्सा ही ग्राहकों पर डाला गया था।
सूत्रों ने बताया कि कीमत स्थिर रखने के इस फैसले से सरकारी पेट्रोलियम विपणन कंपनियों को एटीएफ पर नुकसान उठाना पड़ा। इससे पेट्रोल, डीजल और एलपीजी पर होने वाले नुकसान में और बढ़ोतरी हुई।
इस नुकसान की भरपाई के लिए, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 10,000 करोड़ रुपये की कीमत स्थिरीकरण योजना को मंजूरी दी थी। इसका मकसद एटीएफ की कीमतों को काबू में रखना और विमान कंपनियों को वैश्विक तनाव से जुड़ी कीमतों में उतार-चढ़ाव से बचाना था। साथ ही सरकारी तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति को भी मजबूत करना था।
भाषा रमण अजय
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