बैंकों के अवरुद्ध ऋण अधिक होने से नीतिगत निर्णयों का लाभ पहुंचने में बाधा: अध्ययन रपट

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बैंकों के अवरुद्ध ऋण अधिक होने से नीतिगत निर्णयों का लाभ पहुंचने में बाधा: अध्ययन रपट

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  • Publish Date - October 18, 2020 / 11:07 AM IST,
    Updated On - November 29, 2022 / 08:35 PM IST

मुंबई, 18 अक्टूबर (भाषा) बैकों के अवरुद्ध ऋण अधिक होने के कारण मौद्रिक नीति के मार्चे पर उठाए गए कदमों का असर होने में रुकावट आती है। यह बात भारतीय रिजर्व बैंक के अधिकारियों द्वारा तैयार रपट में कही गयी है।

इस रपट में सरकारी बैंकों में और पूंजी डालने आवश्यकता पर भी बल दिया गया है। इसमें कहा गया है कि इससे ऋण प्रवाह बढ़ाने में मदद मिलेगी और मौद्रिक नीति संबंधी कार्रवाइयों का असर भी तेज होगा।

इस अध्ययन रपट में कहा गया है कि किसी बैंक में गैर निष्पादित आस्तियां (एनपीए) होने से मौद्रिक नीति का असर धीमा पड़ता है और ऋण कारोबार में वृद्धि धीमी पड़ती है। इस पर्चे को को आरबीआई के आर्थिक और नीतिगत अनुसंधान विभाग में कार्यरत सीलू

मुदुली और हरेंद्र बेहेरा ने तैयार किया है। ऐसी रपट में प्रस्तुत विचार लेखकों के ​व्यक्तिगत मत माने जाते हैं।

बैंक कैपिटल एंड मॉनिटरी पालिसी ट्रांसमिशन इन इंडिया ( भारत में बैंकों की पूंजी और मौद्रिक नीति निर्णय के प्रभाव) शीर्षक की इस रपट में कहा गया है कि ऐसे बैंकों के सामने कई ऐसे ढ़ांचागत मामले और रोड़े पैदा होते है जिससे नीतिगत निर्णय का असर कम हो जाता है। पर्चे में कहा गया है कि एनपीए का ऊंचा स्तर एक बड़ा कारण है जिससे नीतिगत निर्णयों के प्रभाव पहुंचने में रुकावट आती है।

भाषा मनोहर अजय

अजय