नयी दिल्ली, नौ अगस्त (भाषा) संसदीय समिति ने कहा है कि केंद्र सरकार के कई चरणों में किए गए विनियमन-सरलीकरण के प्रयासों के बावजूद कारोबारी अनुपालन का कुल बोझ अब भी घरेलू उद्यमों के लिए बड़ी बाधा बना हुआ है।
संसद की वाणिज्य संबंधी विभागीय स्थायी समिति ने ‘भारत में कारोबारी सुगमता : आगे की राह’ विषय पर अपनी रिपोर्ट में कहा कि विभिन्न हितधारकों ने समिति को बताया कि देशभर में 40,000 से अधिक नियामकीय दायित्व समाप्त किए जा चुके हैं, लेकिन एक-दूसरे से मेल खाते और दोहराव वाले नियम अब भी परिचालन लागत बढ़ा रहे हैं और दीर्घकालिक निवेश को प्रभावित कर रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, हितधारकों ने बताया कि भारत में कारोबार करने वाली एक सामान्य कंपनी को वर्तमान में 1,536 अलग-अलग कानूनों के तहत 69,233 अनुपालन आवश्यकताओं का पालन करना पड़ता है। इसके अलावा केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर पर 6,618 वैधानिक विवरणियां दाखिल करनी होती हैं।
रिपोर्ट में कहा गया कि सरकार ने 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को समाहित करते हुए चार श्रम संहिताएं लागू की हैं, जिनसे अनुपालन का बोझ घटने की संभावना है। हालांकि, इनके पूरी तरह लागू होने के बाद भी कई चुनौतियां बनी रहेंगी।
समिति के अनुसार, श्रम समवर्ती सूची का विषय होने के कारण प्रत्येक केंद्रीय कानून के साथ राज्यों के अपने अलग-अलग कानून और नियम भी लागू होते हैं, जिससे कानूनी व्यवस्था और जटिल हो जाती है।
भाषाा योगेश पाण्डेय
पाण्डेय