जालना, 14 सितंबर (भाषा) महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री राजेश टोपे ने सोमवार को राज्य में चीनी-आधारित एथनॉल डिस्टिलरीज की आर्थिक लाभप्रदता पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अगर सरकार सीधे गन्ने के रस और बी-हेवी शीरे से उत्पादन पर रोक लगाती है, तो इन डिस्टिलरीज को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि चीनी मिलों ने केंद्र की ई-20 सम्मिश्रण (ब्लेंडिंग) नीति के तहत एथनॉल परियोजनाओं में हजारों करोड़ रुपये का निवेश किया है, लेकिन मुख्य ‘फीडस्टॉक’ पर किसी भी तरह की रोक से इन संयंत्रों को कच्चा माल हासिल करने और बैंक कर्ज चुकाने में दिक्कत हो सकती है।
टोपे ने बताया, ‘‘महाराष्ट्र में लगभग 179 चालू डिस्टिलरीज हैं, जिनमें 143 चीनी या मोलासेस-आधारित इकाइयों और 36 अनाज-आधारित परियोजनाएं शामिल हैं। महाराष्ट्र में चीनी उद्योग-आधारित डिस्टिलरीज में निवेश का अनुमान 16,000-20,000 करोड़ रुपये है।’’
एनसीपी (एसपी) नेता ने कहा कि चीनी उद्योग-आधारित डिस्टिलरीज की कुल सालाना एथनॉल उत्पादन क्षमता लगभग 3.8 अरब लीटर है, जबकि अनाज-आधारित डिस्टिलरीज सालाना लगभग 1.04 अरब लीटर उत्पादन कर सकती हैं।
टोपे ने दावा किया, ‘‘अगर उद्योग को मुख्य रूप से सी-हेवी शीरे पर निर्भर रहने के लिए मजबूर किया जाता है, तो उत्पादन घट सकता है। हालांकि, वेतन, रखरखाव खर्च, बीमा, पर्यावरण अनुपालन लागत और बैंक की किस्तें जारी रहेंगी।’’
उन्होंने समझाया कि कम उत्पादन और स्थिर तय लागत से एथनॉल की प्रति-लीटर लागत बढ़ सकती है और चीनी मिलों, खासकर पहले से भारी कर्ज वाली सहकारी इकाइयों के नकदी प्रवाह पर दबाव पड़ सकता है।
टोपे ने मौजूदा चीनी-आधारित डिस्टिलरीज को दोहरी-फीड प्रणाली में बदलने का सुझाव दिया, जो चीनी-आधारित फीडस्टॉक और अनाज दोनों का उपयोग करने में सक्षम हों। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र को कच्चे माल की टिकाऊ उपलब्धता सुनिश्चित करते हुए अनाज-आधारित एथनॉल को भी बढ़ावा देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र को वर्ष 2026-27 सत्र में तीन लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाने की ज़रूरत है। चीनी की आपूर्ति और कीमतों को बनाए रखना, ई-20 सम्मिश्रण के लिए पर्याप्त एथनॉल सुनिश्चित करना और डिस्टिलरीज में पहले से किए गए निवेश की आर्थिक लाभप्रदता की रक्षा करना।
टोपे ने डीडीजीएस (डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विद सॉल्यूबल्स), मक्के के तेल और कार्बन डाइऑक्साइड जैसे उप-उत्पादों से अधिक मूल्यवर्धन करने, साथ ही अपशिष्ट जल से बायोगैस या संपीडित बायोगैस बनाने का भी आह्वान किया। गन्ने के प्रसंस्करण के दौरान उबालने और चीनी निकालने के अलग-अलग चरणों में बी-हेवी और सी-हेवी मोलासेस (शीरा) क्रमशः बीच के और आखिरी उप-उत्पाद के तौर पर बनते हैं।
केंद्र सरकार के अनुसार, पेट्रोल में एथनॉल मिलाने का कार्यक्रम (ईबीपीपी) भारत की अहम ऊर्जा पहल में से एक है। इसका मकसद देश में बने नवीकरणीय ईंधन का ज्यादा इस्तेमाल करके ऊर्जा सुरक्षा को बेहतर बनाना, किसानों की मदद करना और पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को कम करना है।
सरकार का कहना है कि देश में बने एथनॉल को स्थिर और पहले से तय कीमतों पर खरीदने और उसे पेट्रोल में मिलाने से ग्राहकों को पेट्रोल के लिए प्रति लीटर कम कीमत चुकानी पड़ती है, क्योंकि ये कीमतें कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में होने वाली बढ़ोतरी से प्रभावित नहीं होतीं।
भाषा राजेश राजेश अजय
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