कोल इंडिया की इकाई की पहल छत्तीसगढ़ की महिलाओं को बना रही है आत्मनिर्भर
कोल इंडिया की इकाई की पहल छत्तीसगढ़ की महिलाओं को बना रही है आत्मनिर्भर
(सिमरन अरोड़ा)
बिश्रामपुर (छत्तीसगढ़), एक मार्च (भाषा) पूजा साहू (30) आज इस बात को लेकर बहुत ज्यादा खुश हैं कि वह अपने पति के नाम से नहीं जानी जातीं। पूजा को लोग अब ‘बोटिंग वाली दीदी’ के नाम से जानते हैं। यह नई पहचान उन्हें मजबूती और पैसे की आजादी का एहसास कराती है, जबकि कुछ साल पहले ऐसा नहीं था।
साहू छत्तीसगढ़ राज्य के एक ‘इको-टूरिज्म’ पार्क में मोटर बोट चलाकर अपना गुजारा करती हैं, जिसे कोल इंडिया की इकाई साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) ने खनन के बाद एक छोड़ी हुई कोयला खदान से एक ‘एडवेंचर हब’ में बदल दिया है।
पार्क में 1,472 हेक्टेयर की जगह है जिसमें एक बड़ी पानी की जगह, एक तैरता हुआ रेस्तरां, बोटिंग और स्थानीय सहकारी समितियों द्वारा चलाई जाने वाली मछली पालन की जगह है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिल रहा है।
इस पार्क को एसईसीएल ने कोयला मंत्रालय के मार्गदर्शन में देश के खान को बंद करने की वैज्ञानिक रूपरेखा के तहत विकसित किया है। खान बंद करने की मंजूर योजना के मुताबिक, दोबारा इस्तेमाल किए गए खनन क्षेत्र को प्रणालीगत तरीके से टिकाऊ सामुदायिक संपत्ति में बदला जा रहा है।
केनापारा इको-टूरिज्म पार्क खनन के बाद इसे जीवनयापन केंद्र में बदलने का एक ऐसा ही उदाहरण है, जो केंद्र के ज़िम्मेदार और टिकाऊ खनन पर केंद्रित है।
एसईसीएल के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक हरीश दुहन ने कहा, ‘‘हमारा यह पार्क दिखाता है कि कैसे वैज्ञानिक तरीके से दोबारा इस्तेमाल किए गए खान क्षेत्र को हरित संपत्तियों में बदला जा सकता है, जो विविधता को बढ़ावा देते हैं, टिकाऊ जीवनयापन को संभव बनाते हैं, और अच्छे रोज़गार के मौके पैदा करते हैं, खासकर स्वयं सहायता समूहों के लिए।’’
साहू शिव शक्ति महिला ग्राम संगठन की 12 महिलाओं में से एक हैं। यह एक स्वयं सहायता समूह है जो छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले में केनापारा इको-टूरिज्म की बोटिंग सेवाओं का प्रबंधन करता है।
नाव पर सैर इस इको-टूरिज्म पार्क के मुख्य आकर्षण में से एक है।
साहू को वे दिन याद हैं जब वह दूसरों पर निर्भर थीं उनकी दुनिया छोटी थी। उन्हें वह सब करना पड़ता था, जिन्हें उन्होंने नहीं चुना था। लेकिन अब, उनकी दुनिया बदल गई है।
वह कहती हैं, ‘‘मुझे बहुत गर्व होता है जब मैं कहती हूं कि अब मेरी अपनी पहचान है।’’ लोग मुझे ‘बोटिंग वाली दीदी’ कहते हैं और यह आजादी जैसा लगता है।
साहू ने बताया कि वह अब हर दिन 200 रुपये कमाती हैं और अपनी किस्मत खुद बनाती हैं। ‘‘आज मेरे पास फोनपे पर पैसे हैं और मैं अपनी पसंद का खाना खा सकती हूं और अपनी पसंद के कपड़े खरीद सकती हूं।’’
गांव की महिलाओं के लिए साहू का एक संदेश है, ‘‘अपना घर छोड़ो और वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनो।’’
भाषा अजय अजय
अजय

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