नयी दिल्ली, 16 अप्रैल (भाषा) भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) ने बृहस्पतिवार को अदाणी समूह की कंपनियों, एज्योर पावर और अन्य के खिलाफ एक सौर ऊर्जा निविदा में कथित तौर पर प्रतिस्पर्धा-रोधी आचरण से जुड़ी शिकायत खारिज कर दी।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि अदाणी एंटरप्राइजेज लिमिटेड, अदाणी ग्रीन एनर्जी फोर लिमिटेड, गौतम अदाणी, सागर अदाणी, एज्योर पावर इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (सेकी) एवं कई अन्य इकाइयों ने प्रतिस्पर्धा नियमों का उल्लंघन किया है।
सीसीआई ने अपने आदेश में कहा कि देश का बिजली उत्पादन बाजार कई बड़ी सार्वजनिक एवं निजी कंपनियों से मिलकर बना है और अदाणी समूह प्रथम दृष्टया इस बाजार में प्रभुत्वशाली नहीं लगता है।
आयोग ने आदेश में कहा, ‘‘भारत के बिजली उत्पादन बाजार में एनटीपीसी, पावर ग्रिड कॉरपोरेशन, टाटा पावर, टोरेंट पावर और रिलायंस पावर जैसी कई महत्वपूर्ण कंपनियां मौजूद हैं। ऐसे में प्रथम दृष्टया यह नहीं लगता है कि अदाणी समूह इस बाजार में प्रभुत्वशाली स्थिति में है।’’
प्रतिस्पर्धा आयोग ने कहा कि क्रॉस-सब्सिडी, प्रतिस्पर्धा को बाहर करने और बाजार में प्रवेश बाधाओं से जुड़े आरोपों के समर्थन में ठोस सबूत नहीं दिए गए।
शिकायत में ‘ग्रीन शू ऑप्शन’ (निविदा में तय मात्रा से अतिरिक्त क्षमता जोड़ने का विकल्प), शुल्क दरों में संशोधन और अन्य शर्तों को छोटी कंपनियों को बाहर करने वाला तरीका बताया गया था।
इसके साथ ही सीसीआई ने कहा कि सरकारी अधिकारियों को कथित तौर पर रिश्वत देकर सेकी को बिजली बिक्री समझौते करने में सक्षम बनाने और फिर अदाणी ग्रीन एनर्जी फोर को सेकी के साथ बिजली खरीद समझौते करने की अनुमति मिलने जैसे आरोप भी प्रतिस्पर्धा कानून की धारा चार के तहत ‘स्थिति के गलत इस्तेमाल’ की श्रेणी में नहीं आते हैं।
विशिष्ट शर्तों से जुड़े आरोपों पर आयोग ने कहा कि शिकायतकर्ता यह साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं दे सका कि निविदा दस्तावेज इस तरह तैयार किए गए थे जिससे केवल बड़ी कंपनियों को ही फायदा मिले।
आदेश के मुताबिक, किसी भी निविदा का ढांचा खरीदार की जरूरतों के हिसाब से बनाया जाता है।
इसी आधार पर आयोग ने कहा कि प्रतिस्पर्धा अधिनियम की धारा तीन (प्रतिस्पर्धा-रोधी समझौते) और धारा चार के उल्लंघन का कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता, इसलिए इसकी जांच करने की जरूरत नहीं है।
सीसीआई ने कहा कि इस मामले को प्रतिस्पर्धा अधिनियम की धारा 26(2) के तहत तुरंत प्रभाव से बंद किया जाता है।
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