नयी दिल्ली, पांच जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय सोमवार को गुजरात उच्च न्यायालय के उस फैसले की जांच करने पर सहमत हो गया, जिसमें कहा गया था कि राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) किसी लंबित याचिका को राज्य के बाहर किसी अन्य एनसीएलटी पीठ में स्थानांतरित नहीं कर सकता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की पीठ ने विभिन्न राज्यों में एनसीएलटी पीठों के बीच मामलों को स्थानांतरित करने की एनसीएलटी अध्यक्ष की शक्ति की जांच करने पर सहमति जताई है।
यह विवाद एनसीएलटी नियम, 2016 के नियम 16(डी) से उपजा है, जो एनसीएलटी अध्यक्ष को ”परिस्थितियां के हिसाब से किसी भी मामले को एक पीठ से दूसरी पीठ में स्थानांतरित करने” की अनुमति देता है।
गुजरात उच्च न्यायालय ने अपने हाल के आदेश में कहा था कि यह शक्ति पूरी तरह राज्य के भीतर है। उच्च न्यायालय का कहना था कि न्यायाधिकरण के अध्यक्ष केंद्र सरकार द्वारा स्थापित क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र को न तो बदल सकते हैं, न ही उसका विस्तार कर सकते हैं। इसका अर्थ है कि मामलों को एक राज्य से दूसरे राज्य में नहीं ले जाया जा सकता।
शीर्ष अदालत ने इस रुख पर ”प्रथम दृष्टया संदेह” जताया और एक काल्पनिक उदाहरण दिया कि यदि किसी स्थान पर केवल एक पीठ है और वहां के सदस्य को मामले से हटना पड़ता है, तो कार्यवाही को पूरी तरह ठप होने से बचाने के लिए राज्य की सीमाओं के बाहर स्थानांतरण ही एकमात्र रास्ता हो सकता है।
इससे पहले, अहमदाबाद की दो एनसीएलटी पीठों ने आर्सेलरमित्तल से संबंधित मामलों की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था, जिसके बाद दिल्ली स्थित एनसीएलटी अध्यक्ष ने एक प्रशासनिक आदेश पारित कर मामले को मुंबई स्थानांतरित कर दिया था। आर्सेलरमित्तल ने एनसीएलटी के हटने और स्थानांतरण के आदेशों को नियमों के विपरीत बताते हुए चुनौती दी।
भाषा पाण्डेय रमण
रमण