आजादी से पहले गठित उर्वरक कंपनी एफएसीटी को जल्द मिल सकता है ‘मिनी रत्न’ का दर्जा
आजादी से पहले गठित उर्वरक कंपनी एफएसीटी को जल्द मिल सकता है ‘मिनी रत्न’ का दर्जा
(ब्रजेन्द्र नाथ सिंह)
कोच्चि (केरल), 11 मार्च (भाषा) आजादी से पहले गठित देश की प्रमुख उर्वरक आपूर्तिकर्ता कंपनी उर्वरक और रसायन त्रावणकोर (एफएसीटी) को जल्द ‘मिनी रत्न’ का दर्जा मिल सकता है। कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह जानकारी देते हुए कहा कि 66 साल पहले सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी (सीपीएसयू) बनी एफएसीटी को ‘मिनी रत्न’ का दर्जा मिलने में सिर्फ ‘प्रक्रियात्मक जरूरतें’ बाकी रह गई हैं।
उन्होंने कहा कि कंपनी ने ‘मिनी रत्न’ के लगभग सभी आवश्यक मानदंडों को पूरा कर लिया है और वह इस दर्जे को हासिल करने से ज्यादा दूर नहीं है।
वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कंपनी के वित्तीय पुनर्गठन (फाइनेंशियल रिस्ट्रक्चरिंग) का काम भी प्रगति पर है, जिसके पूरा होते ही से उसे यह दर्जा मिलने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा।
कंपनी के निदेशक (विपणन) अनुपम मिश्रा ने कहा कि अपनी यात्रा में कई उतार-चढ़ाव के बाद कंपनी अब मिनी रत्न का दर्जा पाने की हकदार है क्योंकि देश उर्वरक सहित हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और एफएसीटी के पास अपनी भूमिका निभाने के लिए सब कुछ है।
वह मध्यप्रदेश से केरल के दौरे पर आए पत्रकारों के एक समूह से बातचीत कर रहे थे, जिसका आयोजन पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) की भोपाल इकाई द्वारा किया गया था।
मिश्रा ने कहा, ‘‘कई साल तक कंपनी की स्थिति अच्छी नहीं थी। वर्ष 2018-19 के दौरान हमारा कारोबार लगभग 1,800 से 1,900 करोड़ रुपये था। आज हम 5,000 करोड़ रुपये से अधिक के कारोबार वाली कंपनी बन चुके हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘हमने कई वर्षों के बाद लगातार तीसरे साल सरकार को लाभांश दिया है। सात साल से हम मुनाफे में हैं और पांच साल से हमारा ‘नेटवर्थ’ सकारात्मक है।’’
साल 2020 से एफएसीटी में अपने पद पर कार्यरत मिश्रा ने कहा कि यही कारण है कि कंपनी ‘मिनी रत्न’ का दर्जा पाने की कोशिश कर रही है।
उन्होंने कहा, ‘‘हमने सभी मानदंडों को करीब-करीब पूरा कर लिया है। कुछ प्रक्रियात्मक चीजें हैं जो चल रही हैं। वित्तीय पुनर्गठन के बाद संभवतः यह दर्जा मिल जाएगा।’’
बाद में में ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘‘वित्तीय पुनर्गठन का काम प्रगति पर है, जिससे मिनी रत्न का दर्जा मिलने का मार्ग स्वत: ही प्रशस्त होगा।’’
उन्होंने कहा कि एक बार जब कंपनी को मिनी रत्न का दर्जा मिल जाता है तो उसे कार्यात्मक स्वायत्तता मिलेगी, जो कंपनी को और ऊंचाइयों पर ले जाने में मददगार होगी।
उन्होंने कहा, ‘‘कंपनी भी लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रही है और सरकार भी सभी चीजों में काफी सहयोग कर रही है।’’
भारत में केंद्र सरकार के तहत आने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (पीएसयू) को तीन श्रेणियों में बांटा गया है। इनमें मिनी रत्न, नवरत्न और महारत्न शामिल हैं।
किसी पीएसयू को ‘रत्न’ का दर्जा देने का मकसद इन कंपनियों को कामकाज की स्वतंत्रता और खुद से निर्णय लेने की शक्ति देना है।
इस दर्जे को हासिल करने वाली कंपनियां एक तय सीमा तक सरकार की अनुमति के बिना निवेश और नई परियोजनाओं जैसे कुछ मामलों पर फैसले ले सकती हैं।
सबसे छोटी कंपनियों को मिनी रत्न की श्रेणी में रखा गया है और इसमें आने वाली कंपनियों दो उप-श्रेणियों में बांटा गया है, जिनमें मिनी रत्न-एक और मिनी रत्न-दो शामिल हैं।
मिनीरत्न-एक में ऐसी कंपनियां आती हैं, जो लगातार तीन साल से मुनाफा कमा रही हैं और साथ ही तीन वर्षों में से कम से कम एक साल उनका कर-पूर्व मुनाफा 30 करोड़ रुपये या उससे ज्यादा एवं उनकी नेटवर्थ सकारात्मक बनी हुई है।
कंपनी के एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि एफएसीटी आजादी से पहले बनी थी और लोगों को उस पर बहुत भरोसा है।
उन्होंने बताया कि बंदरगाह और केरल की सबसे बड़ी व्यवसायिक नगरी कोच्चि में स्थित इस कंपनी ने 1947 में उत्पादन शुरू किया था और वर्ष 1960 में यह सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम बनी।
उन्होंने कहा कि वर्ष 1962 के अंत में भारत सरकार एफएसीटी की प्रमुख शेयरधारक बन गई।
अधिकारी ने बताया कि एक मामूली शुरुआत से एफएसीटी आज केरल की प्रमुख उर्वरक आपूर्तिकर्ता बनी है और सभी दक्षिण भारतीय राज्यों को उर्वरकों की आपूर्ति करती है।
भाषा ब्रजेन्द्र
अजय
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