नयी दिल्ली, 11 मार्च (भाषा) फिच रेटिंग्स ने कहा है कि ईरान से जुड़ा तनाव लंबे समय तक बना रहता है और होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आवागमन बाधित रहता है या कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो भारत की सरकारी तेल विपणन कंपनियों और गैस कंपनी गेल इंडिया के नकदी प्रवाह पर दबाव बढ़ सकता है।
रेटिंग एजेंसी फिच ने एक रिपोर्ट में कहा कि अल्पावधि में इन कंपनियों के वित्तीय संकेतक कमजोर हो सकते हैं, लेकिन सरकारी समर्थन के कारण उनकी रेटिंग पर तत्काल कोई खतरा नहीं है।
रिपोर्ट के मुताबिक, फिच ने जिन तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) की रेटिंग की है, उनमें भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) के पास सबसे मजबूत बहीखाता है और वह लंबे समय तक आपूर्ति बाधित होने या कच्चे तेल की लागत बढ़ने की स्थिति को बेहतर तरीके से संभाल सकती है।
फिच के मुताबिक, इसके बाद इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) का स्थान आता है।
रेटिंग एजेंसी ने कहा कि सरकार संभवतः महंगाई नियंत्रण और राजकोषीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए ओएमसी कंपनियों की वित्तीय स्थिति को संभालने की कोशिश करेगी। ऐसा पहले भी कच्चे तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव के समय किया गया था।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत अपनी प्राकृतिक गैस की लगभग आधी जरूरत आयात से पूरी करता है और आयातित एलएनजी का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशिया से ही आता है। ऐसे में आपूर्ति में बाधा आने पर गेल इंडिया के गैस पारेषण एवं विपणन कारोबार पर असर पड़ सकता है।
फिच के मुताबिक, यदि पश्चिम एशिया से एलएनजी की आपूर्ति एक तिमाही तक बाधित रहती है तो अगले वित्त वर्ष में गेल का कर्ज एवं आय का अनुपात 1.8 गुना के अनुमान से बढ़कर करीब 2.5 गुना तक पहुंच सकता है। दो तिमाहियों तक व्यवधान रहने पर यह अनुपात लगभग तीन गुना तक जा सकता है।
रेटिंग एजेंसी ने कहा कि कंपनियां अल्पकालिक उतार-चढ़ाव से निपटने के लिए अपने बहीखाते का इस्तेमाल कर सकती हैं, लेकिन लंबे समय तक दबाव बना रहने पर नकदी प्रवाह और क्रेडिट स्थिति कमजोर पड़ सकती है।
रिपोर्ट कहती है कि निजी रिफाइनरी संचालक रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी कंपनियों पर इसका असर मिला-जुला हो सकता है। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से शुरुआत में उनके पहले के भंडार का लाभ और रिफाइनिंग मार्जिन बढ़ सकते हैं, लेकिन आपूर्ति बाधित होने पर कच्चे तेल की कमी और रिफाइनरी संचालन में कटौती का जोखिम भी बढ़ सकता है।
भाषा प्रेम
प्रेम रमण
रमण