प.एशिया संघर्ष से बाजारों में अस्थिरता,एफएआसर जी-सेके में एफपीआई की हिस्सेदारी 4,634 करोड़ रुपये घटी

प.एशिया संघर्ष से बाजारों में अस्थिरता,एफएआसर जी-सेके में एफपीआई की हिस्सेदारी 4,634 करोड़ रुपये घटी

प.एशिया संघर्ष से बाजारों में अस्थिरता,एफएआसर जी-सेके में एफपीआई की हिस्सेदारी 4,634 करोड़ रुपये घटी
Modified Date: March 11, 2026 / 11:28 am IST
Published Date: March 11, 2026 11:28 am IST

मुंबई, 11 मार्च (भाषा) पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद से पूर्णतः सुलभ मार्ग (एफएआर) के तहत जारी सरकारी प्रतिभूतियों (जी-सेक) में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की हिस्सेदारी लगभग 4,634 करोड़ रुपये घट गई है। कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, रुपये की कमजोरी और बॉन्ड प्रतिफल बढ़ने के बीच विदेशी निवेशकों में सतर्कता बढ़ने को इसका कारण माना जा रहा है।

क्लियरिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के आंकड़ों के अनुसार, एफएआर प्रतिभूतियों में कुल विदेशी पोर्टफोलियो निवेश मंगलवार को लगभग 3.26 लाख करोड़ रुपये रहा, जो 27 फरवरी को संघर्ष शुरू होने से पहले लगभग 3.31 लाख करोड़ रुपये था।

क्लियरिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, भारत में सरकारी प्रतिभूतियों, विदेशी मुद्रा और मुद्रा बाजारों के लिए केंद्रीय प्रतिपक्ष के रूप में काम करती है।

वैश्विक बाजारों में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बाद यह बिकवाली देखने को मिली है। इस तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है और उभरते बाजारों की परिसंपत्तियों में अस्थिरता बढ़ी है।

ब्रेंट क्रूड की कीमतें 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के पार करीब 108 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई हैं, जिससे मुद्रास्फीति के दबाव एवं भारत के बाह्य संतुलन को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।

इसी दौरान रुपया भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले तेजी से कमजोर होकर 92 के स्तर से नीचे चला गया जबकि मानक 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड का प्रतिफल बढ़कर 6.7532 प्रतिशत हो गया।

बाजार विशेषज्ञों ने कहा कि तेल की ऊंची कीमतों एवं घरेलू मुद्रा में गिरावट के कारण विदेशी निवेशक भारतीय सरकारी ऋण के प्रति अधिक सतर्क हो गए हैं।

एरेटे कैपिटल (च्वाइस ग्रुप) के उपाध्यक्ष माताप्रसाद पांडे ने कहा, ‘‘ जनवरी और फरवरी में करीब 22,000 करोड़ रुपये की खरीद के बाद मार्च में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक शुद्ध विक्रेता बन गए हैं।’’

उन्होंने कहा कि अमेरिका, इजराइल और ईरान से जुड़े बढ़ते संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया है और डॉलर के मुकाबले रुपये के 92 के स्तर पर कमजोर होने से विदेशी निवेशकों की भारतीय सरकारी ऋण के प्रति सतर्कता बढ़ गई है।

हाल की निकासी इस वर्ष की शुरुआत में आए मजबूत निवेश प्रवाह के उलट हैं, जब भारत को वैश्विक बॉन्ड सूचकांकों में शामिल किए जाने की उम्मीद एवं अपेक्षाकृत स्थिर व्यापक आर्थिक परिस्थितियों ने विदेशी निवेशकों को स्थानीय सरकारी ऋण बाजार की ओर आकर्षित किया था।

भाषा निहारिका मनीषा

मनीषा


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