Harish Rana SC Verdict Updates: पहली बार ‘इच्छामृत्यु’ की मिली मंजूरी, 31 साल के हरीश राणा को मिलेगी मौत, पिता ने इस वजह से लगाई थी गुहार

Harish Rana SC Verdict Updates: पहली बार 'इच्छामृत्यु' की मिली मंजूरी, 31 साल के हरीश राणा को मिलेगी मौत, पिता ने इस वजह से लगाई थी गुहार

Harish Rana SC Verdict Updates: पहली बार ‘इच्छामृत्यु’ की मिली मंजूरी, 31 साल के हरीश राणा को मिलेगी मौत, पिता ने इस वजह से लगाई थी गुहार

Harish Rana SC Verdict Updates/Image Source: ANI

Modified Date: March 11, 2026 / 12:13 pm IST
Published Date: March 11, 2026 11:58 am IST
HIGHLIGHTS
  • पिता की गुहार पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
  • लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति
  • 12 साल से कोमा में युवक को पैसिव यूथेनेशिया की मंजूरी

Harish Rana SC Verdict Updates: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में 12 साल से अधिक समय से कोमा में पड़े 31 वर्षीय युवक को पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी। अदालत ने उसके आर्टिफिशियल लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटाने की मंजूरी दी है। यह मामला गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा से जुड़ा है, जो पिछले 12 वर्षों से बिस्तर पर जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे हैं। उनके पिता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर बेटे को इच्छामृत्यु की अनुमति देने की गुहार लगाई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने दी इच्छामृत्यु की अनुमति (Harish Rana euthanasia case)

Harish Rana SC Verdict Updates: मामले की सुनवाई जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने की। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब किसी मरीज के ठीक होने की कोई संभावना नहीं होती और वह लंबे समय से असहनीय स्थिति में होता है, तो गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार भी महत्वपूर्ण हो जाता है। फैसला सुनाते हुए जस्टिस पारदीवाला ने दार्शनिक संदर्भ देते हुए कहा कि लेखक हेनरी डेविड थोरो के शब्दों में “ईश्वर किसी मनुष्य से यह नहीं पूछता कि वह जीवन को स्वीकार करता है या नहीं, जीवन उसे लेना ही पड़ता है।” वहीं विलियम शेक्सपीयर के प्रसिद्ध कथन “To be, or not to be” का जिक्र करते हुए अदालत ने जीवन और मृत्यु के अधिकार से जुड़े गहरे नैतिक और कानूनी प्रश्नों पर भी प्रकाश डाला।

12 साल से कोमा में युवक (Harish Rana Coma Case Supreme Court)

Harish Rana SC Verdict Updates: दरअसल, हरीश राणा को वर्ष 2013 में अपने घर की चौथी मंजिल से गिरने के बाद सिर में गंभीर चोट लग गई थी, जिसके बाद से वह कोमा में हैं। पिछले 12 वर्षों से उन्हें तरल आहार के सहारे जीवित रखा गया था। फैसला सुनाने से पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित दो मेडिकल बोर्डों ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि हरीश के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है। इसके बाद अदालत ने उन्हें पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने एम्स दिल्ली को निर्देश दिया है कि हरीश राणा को पैलिएटिव केयर में भर्ती किया जाए और एक तय प्रक्रिया के तहत उनका लाइफ सपोर्ट हटाया जाए, ताकि उनकी गरिमा बनी रहे।

गौरतलब है कि यह फैसला 2018 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक कॉमन कॉज फैसले के बाद पैसिव यूथेनेशिया के अधिकार के न्यायिक क्रियान्वयन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है। यह फैसला गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार को लेकर न्यायपालिका के दृष्टिकोण को भी स्पष्ट करता है।

क्या होती है इच्छामृत्यु (Euthanasia)?

इच्छामृत्यु वह प्रक्रिया है जिसमें किसी ऐसे मरीज का जीवन समाप्त करने की अनुमति दी जाती है, जो लंबे समय से असहनीय दर्द, गंभीर बीमारी या स्थायी कोमा की स्थिति में हो और जिसके ठीक होने की कोई उम्मीद न हो। कई मामलों में मरीज या उसके परिजन डॉक्टरों से इलाज बंद करने की अनुमति मांगते हैं ताकि उसे पीड़ा से मुक्ति मिल सके।

इच्छामृत्यु के प्रकार (Passive Euthanasia India)

इच्छामृत्यु मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है

1. एक्टिव इच्छामृत्यु (Active Euthanasia): इसमें मरीज को ऐसी दवा या इंजेक्शन दिया जाता है जिससे उसकी तुरंत मृत्यु हो जाए। अधिकांश देशों में इसे अभी भी अवैध माना जाता है।

2. पैसिव इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia): इसमें मरीज का इलाज बंद कर दिया जाता है या वेंटिलेटर और अन्य लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटा दिए जाते हैं। इसके बाद कुछ समय में मरीज की स्वाभाविक मृत्यु हो जाती है।

भारत में क्या कहता है कानून? (India Euthanasia Law News)

भारत में इच्छामृत्यु पूरी तरह से कानूनी नहीं है, लेकिन कुछ सख्त शर्तों के साथ पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दी गई है। वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक कॉमन कॉज फैसले में गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार को मान्यता देते हुए पैसिव इच्छामृत्यु को मंजूरी दी थी।

इसके तहत कुछ अहम शर्तें लागू होती हैं

  • मरीज के ठीक होने की संभावना न होने की पुष्टि मेडिकल बोर्ड करता है।
  • डॉक्टरों की एक विशेषज्ञ टीम की राय ली जाती है।
  • मरीज के परिवार की सहमति जरूरी होती है।

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सामान्यतः पूछे जाने वाले प्रश्नः

लेखक के बारे में

टिकेश वर्मा- जमीनी पत्रकारिता का भरोसेमंद चेहरा... टिकेश वर्मा यानी अनुभवी और समर्पित पत्रकार.. जिनके पास मीडिया इंडस्ट्री में 12 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव हैं। राजनीति, जनसरोकार और आम लोगों से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से सरकार से सवाल पूछता हूं। पेशेवर पत्रकारिता के अलावा फिल्में देखना, क्रिकेट खेलना और किताबें पढ़ना मुझे बेहद पसंद है। सादा जीवन, उच्च विचार के मानकों पर खरा उतरते हुए अब आपकी बात प्राथिकता के साथ रखेंगे.. क्योंकि सवाल आपका है।