मुंबई, 29 जुलाई (भाषा) भारत में गैर-कृषि क्षेत्र के करीब आठ से 12 प्रतिशत रोजगार पर जेनरेटिव कृत्रिम मेधा (जेनएआई) का असर पड़ने का जोखिम है। बुधवार को एक विदेशी ब्रोकरेज फर्म ने यह आकलन पेश किया।
गोल्डमैन सैक्स ने अपनी विशेष रिपोर्ट में कहा कि श्रम बाजार पर जेनएआई का असर असमान रहने का अनुमान है लेकिन मध्यम-अवधि में भारत के वृद्धि परिदृश्य के लिए यह सकारात्मक ही दिखाई देता है।
ब्रोकरेज फर्म ने कहा, ‘‘जेनरेटिव एआई भारत के गैर-कृषि कार्यबल द्वारा वर्तमान में किए जा रहे कार्यों में से लगभग 9-17 प्रतिशत तक कार्य कर सकता है। हमारा अनुमान है कि 8-12 प्रतिशत गैर-कृषि रोजगार की जगह एआई के लेने का जोखिम है जबकि 42-48 प्रतिशत रोजगार में यह प्रौद्योगिकी सहयोगी भूमिका निभाएगी।’’
रिपोर्ट में रोजमर्रा के दफ्तरी, पेशेवर और तकनीकी कार्यों में रोजगार घटने की आशंका जताई गई है। इसके उलट, हाथ से किए जाने वाले काम, कारीगर और मशीन संचालन से जुड़े कार्यों में रोजगार बढ़ सकता है, क्योंकि ऐसे कार्यों को पूरी तरह मशीनों से करा पाना मुश्किल है।
अगर क्षेत्रवार प्रभाव के नजरिये से देखें तो सूचना-प्रौद्योगिकी आधारित सेवाएं, डाक और दूरसंचार सेवाओं पर जेनरेटिव एआई के जगह लेने का जोखिम सबसे अधिक दिख रहा है। इसकी वजह यह है कि इन क्षेत्रों में एक जैसे दोहराए जाने वाले काम ज्यादा होते हैं।
वहीं, स्वास्थ्य, शिक्षा और वित्तीय सेवाओं में यह प्रौद्योगिकी काम को बेहतर बनाने में मददगार साबित हो सकती है। आने वाले वर्षों में इसके इस्तेमाल से देश की कार्य उत्पादकता में भी सुधार होने की संभावना है। विनिर्माण में अधिक मानवीय श्रम की हिस्सेदारी से इस पर सीधा असर कम पड़ने का अनुमान है।
गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि जेनएआई अपनाने से 10 साल की अवधि में सालाना श्रम उत्पादकता वृद्धि करीब 0.4 प्रतिशत अंक बढ़ सकती है। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि एआई कितने जटिल कार्यों को करने में सक्षम हो पाता है।
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प्रेम अजय
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