नयी दिल्ली, 11 मई (भाषा) कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय की सचिव देबाश्री मुखर्जी ने सोमवार को कहा कि सरकार कंपनियों को उनके कुल कार्यबल का अधिकतम 25 प्रतिशत तक प्रशिक्षु (अप्रेंटिस) रखने की अनुमति दे सकती है। हालांकि यह सुनिश्चित करने के लिए कुछ शर्तें लगाई जाएंगी कि उनका इस्तेमाल सस्ते श्रमबल के रूप में न हो।
भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के वार्षिक व्यापार शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार मूल्यांकन प्रणाली को मजबूत करने पर भी काम कर रही है ताकि प्रशिक्षु के रूप में काम करते समय युवाओं को वास्तव में आवश्यक कौशल प्राप्त करने में मदद मिले।
उन्होंने कहा कि कई बड़े उद्योगों ने सरकार से प्रशिक्षुओं की संख्या 2.5-15 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत तक करने की अनुमति मांगी है। वर्तमान में इस प्रणाली में करीब 30 लाख प्रशिक्षु शामिल हैं।
मुखर्जी ने कहा, ‘‘ हमने कहा है कि 25 प्रतिशत तक प्रशिक्षु रखने की अनुमति के लिए तीन शर्तें पूरी करनी होंगी। पहला कि आपको पिछले तीन वर्ष में यह साबित करना होगा कि आपने 15 प्रतिशत की सीमा को पार कर लिया है। दूसरा, आपको निर्धारित न्यूनतम दर से कम से कम 30 प्रतिशत अधिक भुगतान करना चाहिए। तीसरी बात यह है कि आपको अपने द्वारा लिए गए प्रशिक्षुओं में से कम से कम 35 प्रतिशत या उससे अधिक को रोजगार देना चाहिए ताकि उनका उपयोग केवल सस्ते श्रम के रूप में न किया जाए।’’
उन्होंने सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र में ‘अप्रेंटिस’ कार्यक्रमों को बढ़ावा देने की चुनौती का भी जिक्र किया और ‘क्लस्टरीकरण मॉडल’ अपनाने का सुझाव दिया।
उन्होंने कहा, “एमएसएमई क्षेत्र को इस तरह के कार्यक्रम से जोड़ने के लिए हम रणनीतियां तलाश रहे हैं। मेरा सुझाव है कि ‘क्लस्टर मॉडल’ अपनाया जाए, जहां एमएसएमई संघ सैद्धांतिक प्रशिक्षण और मूल्यांकन का कार्य करें जबकि उद्योग समूहों में व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा सके।’’
मुखर्जी ने साथ ही आगाह करते हुए कहा कि कई मामलों में प्रशिक्षुओं को सही प्रशिक्षण नहीं दिया जाता।
भाषा निहारिका अजय
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