सरकार का ऊर्जा कीमतों, चालू खाता घाटे और भुगतान संतुलन पर खास ध्यानः सीईए

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सरकार का ऊर्जा कीमतों, चालू खाता घाटे और भुगतान संतुलन पर खास ध्यानः सीईए

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  • Publish Date - May 29, 2026 / 05:06 PM IST,
    Updated On - May 29, 2026 / 05:06 PM IST

मुंबई, 29 मई (भाषा) मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वी. अनंत नागेश्वरन ने शुक्रवार को कहा कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष की वजह से पैदा हुए वैश्विक ऊर्जा संकट के कारण भारत के लिए चालू खाता घाटे (सीएडी) और भुगतान संतुलन जैसे प्रमुख आर्थिक संकेतकों का प्रबंधन इस समय ज्यादा अहम हो गया है।

नागेश्वरन ने यहां एक कार्यक्रम में कहा कि इस संघर्ष का असर कच्चे तेल की आपूर्ति पर पड़ने से वैश्विक बाजार में ऊर्जा कीमतें बढ़ी हैं।

उन्होंने कहा, “ऊर्जा कीमतों में आए उछाल और उसके असर को देखते हुए चालू खाता घाटा और भुगतान संतुलन जैसे मुद्दों पर अभी अधिक ध्यान देना जरूरी हो गया है।”

चालू खाता घाटा का मतलब है कि देश जितना विदेशी मुद्रा कमा रहा है, उससे ज्यादा खर्च कर रहा है। वहीं, भुगतान संतुलन देश में आने वाले और बाहर जाने वाले कुल विदेशी धन का हिसाब होता है।

नागेश्वरन ने वित्तीय क्षेत्र पर टिप्पणी करते हुए कहा कि बाजार को वास्तविक अर्थव्यवस्था के साथ तालमेल बनाकर चलना चाहिए। उन्होंने इस तरफ भी ध्यान दिलाया कि जटिल वित्तीय उत्पादों (डेरिवेटिव) पर जरूरत से ज्यादा ध्यान देने की वजह से ही 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट पैदा हुआ था।

उन्होंने सूक्ष्म-वित्त कंपनियों के लिए सालाना तीन लाख रुपये की आय सीमा पर कहा कि ऐसे तय आंकड़ों की बजाय अनुपात आधारित व्यवस्था बेहतर हो सकती है। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था के आकार और लोगों की आय बढ़ने के साथ पुराने मानक प्रासंगिक नहीं रह जाते।

उन्होंने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था करीब एक लाख करोड़ डॉलर होने पर तय की गई आय सीमाएं अब लागू नहीं हो सकती हैं। अब अर्थव्यवस्था बढ़कर चार लाख करोड़ डॉलर से अधिक हो चुकी है और लोगों की औसत आय भी बढ़ी है।

सीईए ने प्राथमिकता क्षेत्र को ऋण (पीएसएल) दिए जाने संबंधी निर्देशों पर कहा कि इससे कृषि और छोटे कारोबार जैसे क्षेत्रों को ज्यादा कर्ज मिल रहा है, जिससे आर्थिक गतिविधियां बढ़ाने में मदद मिलती है।

पीएसएल भारतीय रिजर्व बैंक का एक नियम है, जिसके तहत बैंकों को अपने कुल कर्ज का एक निश्चित हिस्सा कृषि, छोटे कारोबार और अन्य जरूरी क्षेत्रों को देना होता है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि इन महत्वपूर्ण क्षेत्रों तक पर्याप्त कर्ज पहुंच सके।

भाषा प्रेम

प्रेम रमण

रमण