मुंबई, 29 मई (भाषा) पिछले कुछ वर्षों में आयात और निर्यात बिल भुगतान में रुपये का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया सभी व्यापारिक भागीदार देशों के लिए पारस्परिक रूप से लाभकारी रही है। भारतीय रिजर्व बैंक की शुक्रवार को जारी सालाना रिपोर्ट में यह कहा गया है।
पिछले कुछ वर्षों में आरबीआई ने चालू खाते और चुनिंदा पूंजी खाते के लेनदेन में रुपये के बढ़ते उपयोग के जरिए उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के रूप में मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार बिल भुगतान और निपटान मुद्रा के रूप में रुपये के बढ़ते चलन से विनिमय दर के जोखिम से सुरक्षा मिलने की उम्मीद है।
केंद्रीय बैंक के अनुसार, इससे परिवर्तनीय विदेशी मुद्राओं में महंगे विदेशी मुद्रा भंडार को बनाए रखने की जरूरत कम होगी और कई अन्य लाभ भी मिलेंगे।
रिपोर्ट के अनुसार, घरेलू मुद्रा का उपयोग द्विपक्षीय विनिमय दर बाजारों के विकास को भी सुगम बनाता है और विदेशी मुद्रा लेनदेन में लगने वाली लागत को कम करता है।
आरबीआई ने कहा कि जुलाई, 2022 के बाद से रुपये आधारित बिल भुगतान और निपटान में उल्लेखनीय तेजी आई है। अगस्त, 2022 से जुलाई, 2025 की अवधि में रुपये में आयात और निर्यात बिल भुगतान की संचयी वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) क्रमशः 20.9 प्रतिशत और 12.7 प्रतिशत रही।
इसके अलावा, 2025-26 में रुपये में व्यापार बिल भुगतान और निपटान के ताजा आंकड़ों के अनुसार, इससे पिछले वित्त वर्ष (2024-25) की समान अवधि की तुलना में निर्यात बिल में 6.5 प्रतिशत, आयात बिल में 9.5 प्रतिशत, निर्यात निपटान में 2.7 प्रतिशत और आयात निपटान में 41.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
मूल्य के लिहाज से 2025-26 में आयात के लिए रुपये में बिल भुगतान 2.85 लाख करोड़ रुपये रहा, जो 2024-25 में 2.60 लाख करोड़ रुपये और 2023-24 में 1.94 लाख करोड़ रुपये था।
आंकड़ों के अनुसार, निर्यात के मामले में पिछले वित्त वर्ष में रुपये में बिल भुगतान 3.27 लाख करोड़ रुपये रहा, जो 2024-25 में 3.07 लाख करोड़ रुपये और 2023-24 में 2.87 लाख करोड़ रुपये था।
वित्त वर्ष 2025-26 में आयात के लिए रुपये में निपटान 1.60 लाख करोड़ रुपये रहा, जबकि 2024-25 में यह 1.13 लाख करोड़ रुपये और उससे पिछले वर्ष 99,680 करोड़ रुपये था।
निर्यात के लिए रुपये में निपटान 2025-26 में 1.72 लाख करोड़ रुपये रहा, जो 2024-25 में 1.67 लाख करोड़ रुपये और 2023-24 में 1.75 लाख करोड़ रुपये था।
आरबीआई ने कहा कि रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया सभी व्यापारिक साझेदारों के लिए पारस्परिक रूप से लाभकारी रही है और पारस्परिकता के सिद्धांतों के आधार पर इससे कई अन्य उभरते बाजारों की मुद्राओं में व्यापार चालान को भी बढ़ावा मिला है।
पिछले वित्त वर्ष के दौरान व्यापार संबंधी अनिश्चितताओं, वैश्विक तनाव और शेयर बाजार से विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) की निकासी के बीच रुपये में गिरावट का रुख देखा गया।
भाषा योगेश रमण
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