पश्चिम एशिया संकट के समय लागू ऊर्जा-सुरक्षा उपायों की समीक्षा करेगी सरकार

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पश्चिम एशिया संकट के समय लागू ऊर्जा-सुरक्षा उपायों की समीक्षा करेगी सरकार

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  • Publish Date - June 18, 2026 / 07:46 PM IST,
    Updated On - June 18, 2026 / 07:46 PM IST

नयी दिल्ली, 18 जून (भाषा) पश्चिम एशिया में तनाव घटने और वैश्विक स्थिति के सामान्य होने के संकेतों के बीच सरकार ऊर्जा-सुरक्षा के लिए गए लागू आपातकालीन उपायों की समीक्षा कर उन्हें चरणबद्ध ढंग से वापस लेने पर विचार कर रही है। एक सरकारी अधिकारी ने बृहस्पतिवार को यह जानकारी दी।

वैश्विक तेल एवं गैस आपूर्ति शृंखला में संभावित बाधाओं की आशंका के बीच एलपीजी आपूर्ति की निगरानी बढ़ाने, घरेलू प्राकृतिक गैस आवंटन में नई प्राथमिकता तय करने और ईंधन की जमाखोरी रोकने जैसे एहतियाती कदम उठाए गए थे।

अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच 111 दिन तक चले संघर्ष को समाप्त करने के लिए हुए अंतरिम शांति समझौते के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों का आवागमन सामान्य होने की संभावना है। ऐसा होने से कच्चे तेल के भारत जैसे प्रमुख आयातक देशों को राहत मिल सकती है।

अधिकारी ने कहा, “हम लगातार बदलती स्थिति की समीक्षा करते रहे हैं। हमने जो उपाय किए हैं, उनकी भी समीक्षा की जाएगी और जैसे ही हमें भरोसा होगा कि वैश्विक स्थिति सामान्य हो गई है, उन्हें धीरे-धीरे शिथिल किया जाएगा।”

होर्मुज जलडमरूमध्य से वैश्विक तेल खपत का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है। यह सऊदी अरब, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) एवं कतर जैसे प्रमुख उत्पादकों का मुख्य निर्यात मार्ग है, जो भारत के प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता भी हैं।

फरवरी के अंत में संघर्ष शुरू होने के बाद इस मार्ग से कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई जिससे कच्चे तेल की कीमतों, बीमा प्रीमियम और माल भाड़ा दरों में तेज वृद्धि हुई।

हालात से निपटने के लिए सरकार ने एलपीजी (आपूर्ति एवं वितरण विनियमन) आदेश लागू कर जमाखोरी एवं काला बाजारी पर नियंत्रण के निर्देश दिए थे। साथ ही, रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने और सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियों को भंडार प्रबंधन मजबूत करने के निर्देश दिए गए थे।

सरकार ने घरेलू गैस आपूर्ति में भी प्राथमिकता तय करते हुए शहरी गैस वितरण, उर्वरक क्षेत्र और आवश्यक सेवाओं को वरीयता दी थी, जबकि कम महत्वपूर्ण औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिए आपूर्ति सीमित करने की तैयारी की गई थी।

अधिकारी ने कहा कि ये सभी कदम एहतियात के तौर पर उठाए गए थे ताकि रणनीतिक ईंधन भंडार सुरक्षित रखा जा सके और आवश्यक उपभोक्ताओं को निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।

इस बीच, कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें हाल के दिनों में गिरकर करीब 78 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई हैं। युद्ध के दौरान कच्चे तेल की कीमतें फरवरी के 70-72 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 119 डॉलर तक पहुंच गई थीं।

देश में पेट्रोल और डीजल के खुदरा दाम अब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर की तुलना में कम हैं। सरकार ने 27 मार्च को पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी। विधानसभा चुनावों के बाद पेट्रोल-डीजल के दाम करीब 7.50 रुपये प्रति लीटर बढ़ाए गए, जबकि सीएनजी और एलपीजी की कीमतों में भी वृद्धि की गई।

इसके बावजूद, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को अभी भी प्रतिदिन लगभग 550 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है।

भाषा प्रेम प्रेम अजय

अजय