भारत की अगले दशक में वैश्विक तेल मांग वृद्धि में होगी आधी हिस्सेदारीः रोसनेफ्ट सीईओ

भारत की अगले दशक में वैश्विक तेल मांग वृद्धि में होगी आधी हिस्सेदारीः रोसनेफ्ट सीईओ

भारत की अगले दशक में वैश्विक तेल मांग वृद्धि में होगी आधी हिस्सेदारीः रोसनेफ्ट सीईओ
Modified Date: June 6, 2026 / 09:19 pm IST
Published Date: June 6, 2026 9:19 pm IST

सेंट पीटर्सबर्ग, छह जून (भाषा) रूस की तेल कंपनी रोसनेफ्ट के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) इगोर सेचिन ने कहा है कि आने वाले एक दशक में वैश्विक तेल मांग में होने वाली वृद्धि का लगभग आधा हिस्सा भारत से आएगा।

रूस की सरकारी समाचार एजेंसी ‘तास’ की शनिवार को प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, सेचिन ने सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम को संबोधित करते हुए कहा कि वैश्विक तेल बाजार में भारत का विशेष स्थान है।

सेचिन ने कहा, ‘अगले 10 वर्षों में वैश्विक तेल मांग में होने वाली वृद्धि का लगभग आधा हिस्सा इसी देश (भारत) से आएगा।’

उन्होंने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के अनुमानों का हवाला देते हुए कहा कि साल 2035 तक भारत की तेल खपत लगभग 80 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच जाएगी, जो 44 प्रतिशत वृद्धि दर्शाती है। इसके उलट, इस अवधि के दौरान कुल वैश्विक मांग में केवल पांच प्रतिशत की बढ़ोतरी होने का अनुमान है।

रोसनेफ्ट के प्रमुख ने यह भी कहा कि अप्रैल 2022 से रूसी तेल की आपूर्ति ने भारत और चीन के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक लाभ पैदा किए हैं। सेचिन ने दावा किया कि इन लाभों का कुल संचयी मूल्य 40 अरब डॉलर से अधिक रहा है।

उन्होंने कहा कि भारत और चीन के साथ रूस की आर्थिक साझेदारी ने ऊर्जा की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद की है।

इसके साथ ही उन्होंने तर्क दिया कि रूस को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं से बाहर नहीं किया जा सकता है।

सेचिन ने चेतावनी दी कि होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते होने वाली आपूर्ति में किसी भी प्रकार की बाधा से उर्वरक और खाद्य पदार्थों की कीमतों में उछाल आ सकता है, और इस प्रभाव को लेकर सबसे संवेदनशील देशों में भारत भी शामिल है।

‘तास’ ने सेचिन के हवाले से कहा कि साल के पहले चार महीनों में उर्वरकों की कीमतों में लगभग 60 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। आपूर्ति में रुकावट और प्रभावित बाजारों में रणनीतिक भंडार की कमी ने वैश्विक खाद्य संकट के जोखिम को बढ़ा दिया है।

सेचिन ने कहा कि उर्वरक आपूर्ति में व्यवधान से उत्पन्न होने वाले खाद्य-मूल्य संकट के प्रति भारत के साथ अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देश सबसे अधिक संवेदनशील होंगे।

भाषा योगेश प्रेम

प्रेम


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