नयी दिल्ली, 22 जून (भाषा) महंगाई का दबाव और परिवारों के खर्च करने योग्य नकदी में कमी जैसे जोखिम छोटी राशि का कर्ज देने वाले संस्थानों (माइक्रोफाइनेंस) के लिए ऋण वसूली को प्रभावित कर सकते हैं। क्रिसिल की एक रिपोर्ट में यह कहा गया है।
भले ही पश्चिम एशिया के संघर्ष ने सूक्ष्म वित्त(छोटी राशि के कर्ज देने वाले संस्थान) क्षेत्र को सीधे तौर पर प्रभावित न किया हो लेकिन महंगाई का दबाव या परिवारों के खर्च करने योग्य राशि में कमी जैसे कारणों से जोखिम बना हुआ है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ग्रामीण आय पर अल नीनो घटना के असर पर नजर रखने की जरूरत होगी।
इसमें कहा गया है कि कर्नाटक, तमिलनाडु और बिहार जैसे राज्यों ने बिना नियमन वाले छोटी राशि के कर्ज देने के तरीकों पर कड़ी निगरानी के लिए कानून बनाए हैं। इनमें उधारकर्ताओं की सुरक्षा के बेहतर नियम, वसूली के तौर-तरीकों पर पाबंदियां और सख्त अनुपालन दिशानिर्देश शामिल हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक में ‘कलेक्शन’ में थोड़ी कमी देखी गई। फरवरी, 2025 में राज्य के सूक्ष्म वित्त अध्यादेश के लागू होने के तुरंत बाद वसूली दक्षता में पांच से छह प्रतिशत की गिरावट आई।
दूसरी ओर तमिलनाडु और बिहार में संग्रह पर कोई खास असर नहीं पड़ा क्योंकि कर्जदाता कर्नाटक के अनुभव से सीखकर अपने कामकाज के तरीकों को उसी हिसाब से ढालने में सफल रहे।
रिपोर्ट के अनुसार, नए कर्ज देने पर सुरक्षा उपाय लागू होने के बाद माइक्रोफाइनेंस सिक्युरिटाइज्ड पूल के ‘कलेक्शन’ में तेजी से सुधार हुआ है।
माइक्रोफाइनेंस सिक्योरिटाइज्ड पूल का अर्थ छोटे ऋणों (माइक्रोफाइनेंस) के उस समूह या संग्रह से है, जिन्हें एक साथ मिलाकर एक वित्तीय साधन में बदल दिया जाता है और निवेशकों को बेच दिया जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार, इन सुरक्षा उपायों की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्होंने बहुत अधिक कर्ज लेने वाले उधारकर्ताओं के प्रति एमएफआई के कर्ज को सीमित किया है। साथ ही, सतर्क मूल्यांकन प्रक्रिया के साथ जिम्मेदारी से वसूली के तरीकों और कर्ज बांटने में सूझ-बूझ से पोर्टफोलियो के प्रदर्शन में सुधार हो रहा है।
भाषा रमण अजय
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