जहाजों के लंबे समय तक बाधित होने से देश के प्रमुख क्षेत्रों पर पड़ेगा असर: जीटीआरआई

Ads

जहाजों के लंबे समय तक बाधित होने से देश के प्रमुख क्षेत्रों पर पड़ेगा असर: जीटीआरआई

  •  
  • Publish Date - March 5, 2026 / 08:28 PM IST,
    Updated On - March 5, 2026 / 08:28 PM IST

नयी दिल्ली, पांच मार्च (भाषा) शोध संस्थान जीटीआरआई ने कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से एक सप्ताह से अधिक समय तक जहाजों की आवाजाही बाधित होने से ऊर्जा बाजारों से लेकर उर्वरक आपूर्ति, औद्योगिक कच्चा माल, निर्माण सामग्री और हीरे जैसे निर्यात क्षेत्रों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य ईरान और ओमान के बीच स्थित एक संकरा जलमार्ग है जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। अपने सबसे संकरे बिंदु पर लगभग 55 किलोमीटर चौड़ा यह जलडमरूमध्य वैश्विक स्तर पर, विशेष रूप से ऊर्जा व्यापार के लिए, सबसे महत्वपूर्ण और अत्यधिक उपयोग किए जाने वाले समुद्री मार्गों में से एक माना जाता है।

विश्व के तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस निर्यात का एक बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है, जिससे यह वैश्विक पोत परिवहन और ऊर्जा आपूर्ति के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण गलियारा बन जाता है।

अमेरिका और इजरायल के ईरान पर संयुक्त हमले के बाद, इस्लामी राष्ट्र ने जलडमरूमध्य को बंद करने की घोषणा की है। ईरान कतर, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब सहित पश्चिम एशियाई देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भी निशाना बना रहा है।

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) ने कहा, ‘‘अगर होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों के आवागमन में रुकावट एक सप्ताह से अधिक समय तक जारी रहती है, तो इसका असर ऊर्जा बाजारों से लेकर उर्वरक आपूर्ति, विनिर्माण सामग्री, निर्माण सामग्री और हीरे जैसे निर्यात उद्योगों तक तेजी से फैल सकता है।’’

इस संघर्ष से भारत और पश्चिम एशिया के बीच माल की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका है।

भारत ने 2025 में पश्चिम एशिया से 98.7 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य का माल आयात किया था, जिससे यह क्षेत्र ऊर्जा, उर्वरक और औद्योगिक कच्चे माल का एक महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता बन गया है।

इस क्षेत्र में खाड़ी सहयोग परिषद के छह देश… बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात… के साथ-साथ ईरान, इराक, इजराइल, जॉर्डन, लेबनान, सीरिया और यमन शामिल हैं।

जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा, ‘‘सबसे तात्कालिक जोखिम पेट्रोलियम क्षेत्र में है। 2025 में, भारत ने पश्चिम एशिया से लगभग 70 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य का कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद आयात किया था। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा कच्चे तेल का था।’’

उन्होंने बताया कि 2025 में भारत ने इस क्षेत्र से 50.8 अरब डॉलर मूल्य का कच्चा तेल खरीदा, जो उसके कुल कच्चे तेल आयात का 48.7 प्रतिशत था। कच्चा तेल भारत की रिफाइनरियों को ईंधन प्रदान करता है, जो पेट्रोल, डीजल, विमानन ईंधन और पेट्रोरसायन कच्चे माल का उत्पादन करती हैं। इनका उपयोग अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में होता है।

श्रीवास्तव ने कहा, ‘‘भारत के पास लगभग 30 दिन का भंडार है। सामान आने में किसी भी प्रकार की लंबी रुकावट से ईंधन की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं, जिससे परिवहन और लॉजिस्टिक लागत में वृद्धि होगी और मुद्रास्फीति बढ़ेगी। किसानों पर भी इसका असर पड़ेगा, क्योंकि सिंचाई पंपों और ट्रैक्टर के लिए डीजल की कीमतें बढ़ जाएंगी।’’

उन्होंने कहा कि प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को भी इसी तरह के जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है।

जीटीआरआई के अनुसार, 2025 में भारत ने पश्चिम एशिया से 9.2 अरब डॉलर मूल्य की तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) आयात की, जो उसके कुल एलएनजी आयात का 68.4 प्रतिशत था।

एलएनजी का उपयोग उर्वरक संयंत्रों, गैस आधारित बिजली संयंत्रों और शहरी गैस वितरण नेटवर्क द्वारा किया जाता है, जो वाहनों के लिए कॉम्प्रेस्ड प्राकृतिक गैस (सीएनजी) और घरों के लिए पाइप द्वारा खाना पकाने की गैस की आपूर्ति करते हैं।

उन्होंने कहा कि इसी प्रकार, भारत ने 2025 में पश्चिम एशिया से 13.9 अरब डॉलर मूल्य की एलपीजी आयात की, जो उसके कुल एलपीजी आयात का 46.9 प्रतिशत था।

यह लाखों घरों के लिए खाना पकाने का प्राथमिक ईंधन बना हुआ है। लगभग दो सप्ताह की खपत के लिए पर्याप्त भंडार के कारण, किसी भी प्रकार की रुकावट से खाना पकाने के ईंधन की उपलब्धता पर तुरंत असर पड़ सकता है।

जीटीआरआई ने यह भी कहा गया है कि संघर्ष का असर उर्वरक आपूर्ति के माध्यम से भारत के कृषि क्षेत्र पर भी पड़ सकता है।

पिछले साल, भारत ने पश्चिम एशिया से 3.7 अरब डॉलर मूल्य के उर्वरक आयात किए। इसमें 2.2 अरब डॉलर के मिश्रित उर्वरक (एनपीके) शामिल थे, जो आयात का 31.1 प्रतिशत था। इसके अलावा 1.5 अरब डॉलर के नाइट्रोजन उर्वरक थे जो आयात का 30.3 प्रतिशत था।

उन्होंने कहा कि भारत का हीरा निर्यात उद्योग भी खाड़ी देशों की आपूर्ति पर निर्भर करता है।

वर्ष 2025 में, देश ने पश्चिम एशिया से 6.8 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के कच्चे हीरे आयात किए, जो आयात का 40.6 प्रतिशत थे।

इन पत्थरों को भारत के हीरा काटने और पॉलिश करने वाले केंद्रों, विशेष रूप से गुजरात के सूरत में प्रसंस्कृत किया जाता है, जो वैश्विक बाजारों में पॉलिश किए हुए हीरे की आपूर्ति करते हैं।

भाषा रमण अजय

अजय