एमडीआर शुल्क के विरोध में दो अक्टूबर को ‘नो यूपीआई डे’ मनाएंगे मोबाइल फोन खुदरा विक्रेता

एमडीआर शुल्क के विरोध में दो अक्टूबर को ‘नो यूपीआई डे’ मनाएंगे मोबाइल फोन खुदरा विक्रेता

एमडीआर शुल्क के विरोध में दो अक्टूबर को ‘नो यूपीआई डे’ मनाएंगे मोबाइल फोन खुदरा विक्रेता
Modified Date: September 27, 2026 / 02:46 pm IST
Published Date: September 27, 2026 2:46 pm IST

नयी दिल्ली, 27 सितंबर (भाषा) यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) शुल्क लगाने के विरोध में देश भर के मोबाइल फोन खुदरा विक्रेता दो अक्टूबर को ‘नो यूपीआई डे’ मनाने की योजना बना रहे हैं। उद्योग निकाय एआईएमआरए के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया कि इस दिन यूपीआई से लेनदेन नहीं किया जाएगा।

सरकार ने 15 अक्टूबर से व्यापारियों के लिए 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लागू किया है, जबकि दो व्यक्तियों के बीच (पी2पी) लेनदेन और छोटे भुगतान पर कोई शुल्क नहीं लगेगा।

ऑल इंडिया मोबाइल रिटेलर्स एसोसिएशन (एआईएमआरए) के उपाध्यक्ष और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के अध्यक्ष तरविंदर सिंह ने बयान में कहा, ‘‘एआईएमआरए ने यूपीआई लेनदेन पर लागू 0.4 प्रतिशत एमडीआर को लेकर मोबाइल खुदरा विक्रेताओं की चिंताओं को बताने के लिए दो अक्टूबर 2026 को ‘नो यूपीआई डे’ का आह्वान किया है।’’

उन्होंने बताया कि ‘गांधी जयंती’ के अवसर पर खुदरा विक्रेता सांकेतिक रूप से यूपीआई क्यूआर कोड को काले कपड़े से ढकेंगे और यूपीआई भुगतान स्वीकार करने से बचेंगे।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को एआईएमआरए द्वारा भेजे गए एक ज्ञापन के अनुसार, यूपीआई पर एमडीआर लगाने से प्रति माह यूपीआई के माध्यम से पांच लाख से 30 लाख रुपये का लेनदेन करने वाले छोटे खुदरा विक्रेता को सीधे तौर पर 2,000 से 12,000 रुपये का मासिक शुद्ध नुकसान होगा। इससे उनकी शुद्ध आय का एक बड़ा हिस्सा खत्म हो जाएगा।

मोबाइल खुदरा विक्रेताओं के निकाय का अनुमान है कि 0.4 प्रतिशत एमडीआर से देश भर के छोटे मोबाइल खुदरा विक्रेताओं पर प्रति माह लगभग 40 करोड़ रुपये और सालाना करीब 500 करोड़ रुपये का असहनीय बोझ पड़ेगा।

सिंह ने कहा, ‘‘अगर हम डिजिटल इंडिया चाहते हैं, तो यूपीआई पर एमडीआर शून्य ही रहना चाहिए। यह यूपीआई या डिजिटल इंडिया के खिलाफ कोई विरोध नहीं है। हमारी चिंता केवल डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले व्यापारियों पर डाले जा रहे अतिरिक्त वित्तीय बोझ को लेकर है। हमारी स्पष्ट मांग है कि यूपीआई को ‘शून्य एमडीआर’ ढांचे के तहत ही जारी रखा जाना चाहिए।”

भाषा पाण्डेय अजय

अजय


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