यूपीआई भुगतान पर शुल्क के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दायर

यूपीआई भुगतान पर शुल्क के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दायर

यूपीआई भुगतान पर शुल्क के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दायर
Modified Date: September 16, 2026 / 06:38 pm IST
Published Date: September 16, 2026 6:38 pm IST

नयी दिल्ली, 16 सितंबर (भाषा) केंद्र सरकार के 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर ‘मर्चेंट डिस्काउंट रेट’ (एमडीआर) लागू करने के फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई है। शीर्ष अदालत में दायर जनहित याचिका (पीआईएल) में कहा गया है कि यह शुल्क पर्याप्त कानूनी सुरक्षा उपायों, पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श के बिना लागू किया गया है।

सरकार ने 15 अक्टूबर से व्यापारियों को किए जाने वाले 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लागू किया है। इसके तहत 2,000 रुपये से अधिक के व्यक्ति-से-व्यापारी (पी2एम) यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लगाया जाएगा। हालांकि, 2,000 रुपये तक के यूपीआई लेनदेन पर कोई एमडीआर शुल्क नहीं लगेगा। यह शुल्क व्यापारियों को देना होगा।

अधिवक्ता अंजन दत्ता द्वारा दायर पीआईएल में केंद्र सरकार की 14 सितंबर की अधिसूचना और 15 सितंबर को घोषित एमडीआर व्यवस्था को चुनौती दी गई है। यह व्यवस्था 15 अक्टूबर से लागू होने वाली है।

याचिका के अनुसार, नयी व्यवस्था में 2,000 रुपये से अधिक के सामान्य पी2एम यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर का प्रावधान है। इसके साथ ही 75,000 रुपये या उससे अधिक के लेनदेन के लिए इसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये तय की गई है।

याचिका में भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की संशोधित धारा 10ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। इसमें कहा गया है कि यह प्रावधान कार्यपालिका को बिना स्पष्ट दिशानिर्देश के यह अधिकार देता है कि कौन सा इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यम शुल्क मुक्त रहेगा।

याचिका में शुल्क दरों, लेनदेन सीमा, अधिकतम सीमा और अलग-अलग क्षेत्रों के वर्गीकरण को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें कहा गया है कि ये प्रावधान एक प्रेस बयान के जरिये घोषित किए गए हैं और शुल्क तय करने वाला पूरा आदेश आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित नहीं किया गया है।

याचिका में दावा किया गया है कि यह व्यवस्था मनमानी और भेदभावपूर्ण है तथा इससे कम मार्जिन पर काम करने वाले व्यापारियों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसमें उपभोक्ताओं पर अप्रत्यक्ष बोझ और डिजिटल भुगतान से वंचित होने की आशंका भी जताई गई है।

याचिकाकर्ता ने न्यायालय से 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर लगाने वाली व्यवस्था को रद्द या स्थगित करने का अनुरोध किया है। वैकल्पिक रूप से, उसने पारदर्शी परामर्श, आंकड़ों के प्रकाशन, प्रभाव आकलन और सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों के लिए सुरक्षा उपायों के बाद इस व्यवस्था पर पुनर्विचार की अपील की गई है।

याचिका में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और केंद्र सरकार से स्वतंत्र समीक्षा कराने का भी आग्रह किया गया है।

भाषा यासिर अजय

अजय


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