नयी दिल्ली, नौ मार्च (भाषा) पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा की कीमतों में आए उछाल से भारत को हर महीने सात-आठ अरब डॉलर का अतिरिक्त विदेशी मुद्रा नुकसान झेलना पड़ सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि इससे देश में मुद्रास्फीति और चालू खाता घाटा (कैड) बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, जहां कच्चे तेल की कीमतें 66 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर लगभग 120 डॉलर तक पहुंच गई हैं, वहीं तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की दरें भी दोगुनी से अधिक होकर 24-25 डॉलर प्रति ब्रिटिश थर्मल यूनिट हो गई हैं।
क्रिसिल रेटिंग्स के वरिष्ठ निदेशक अनुज सेठी ने कहा कि भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जिससे इसकी अर्थव्यवस्था वैश्विक तेल कीमतों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाती है।
देश हर दिन लगभग 50 लाख बैरल तेल की खपत करता है और अपनी आधी प्राकृतिक गैस की जरूरत भी आयात से ही पूरी करता है।
सेठी ने आगाह किया कि कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से भारत को हर महीने सात-आठ अरब डॉलर (120 डॉलर/बैरल) का अतिरिक्त विदेशी मुद्रा भुगतान करना पड़ सकता है, जिससे न केवल लॉजिस्टिक, विनिर्माण और खाद्य वस्तुओं की लागत में वृद्धि होगी बल्कि चालू खाता घाटा भी बढ़ेगा।
उन्होंने कहा कि तेल विपणन कंपनियां कुछ समय तक दबाव झेल सकती हैं, लेकिन स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो खुदरा कीमतों में बदलाव करना पड़ सकता है।
प्रमुख क्रेडिट रेटिंग एजेंसी इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने बताया कि कच्चे तेल की कीमतों में 10 डॉलर की हर बढ़ोतरी चालू खाता घाटा (कैड) बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 1.9-2.2 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कच्चे तेल की कीमतों का असर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) की तुलना में थोक मूल्य सूचकांक (डब्लयूपीआई) पर अधिक पड़ता है।
उनके अनुसार, तेल की कीमतों में 10 प्रतिशत की वृद्धि डब्ल्यूपीआई मुद्रास्फीति को 0.8 से एक प्रतिशत तक बढ़ा सकती है।
इक्विरस सिक्योरिटीज के शोध प्रमुख मौलिक पटेल ने कहा कि कच्चे तेल का बाजार अब वैश्विक जोखिम के दौर में प्रवेश कर चुका है।
उन्होंने कहा कि अगर तनाव बना रहा और होर्मुज जलडमरूमध्य से आपूर्ति बाधित हुई, तो कीमतें मौजूदा स्तर से भी काफी ऊपर जा सकती हैं।
अर्थ भरत इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के सचिन सावरीकर ने कहा कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं, विशेषकर भारत के लिए तेल की ऊंची कीमतें सबसे बड़ी व्यापक आर्थिक चिंता है। इससे न केवल राजकोषीय गणित बिगड़ सकता है, बल्कि रुपये की विनिमय दर पर भी दबाव आ सकता है, जिससे विदेशी निवेश प्रभावित होने की संभावना है।
भाषा सुमित रमण
रमण