सुज़लॉन ने विंड 2.0 के साथ मुख्य व्यवसाय पर ध्यान केंद्रित किया, सुज़लॉन 2.0 के साथ विस्तार की योजना

सुज़लॉन ने विंड 2.0 के साथ मुख्य व्यवसाय पर ध्यान केंद्रित किया, सुज़लॉन 2.0 के साथ विस्तार की योजना

सुज़लॉन ने विंड 2.0 के साथ मुख्य व्यवसाय पर ध्यान केंद्रित किया, सुज़लॉन 2.0 के साथ विस्तार की योजना
Modified Date: January 20, 2026 / 11:45 am IST
Published Date: January 20, 2026 11:45 am IST

(बरुण झा)

दावोस, 20 जनवरी (भाषा) भारत में पवन ऊर्जा के अग्रणी सुजलॉन एनर्जी के उपाध्यक्ष गिरीश तांती ने कहा कि भारत में जब पहली बार पवन चक्कियां लगाई गईं तो लोग उनका मजाक उड़ाते थे और कहते थे कि ये विशाल ‘पंखे’ बिजली उत्पन्न करने के बजाय उसे खा जाएंगे, लेकिन अब भारत निर्यात के माध्यम से वैश्विक पवन ऊर्जा मांग का 10 प्रतिशत पूरा करने में सक्षम है।

सुजलॉन ने अपने 30 वर्ष के अस्तित्व में एक लंबा सफर तय किया है। संस्थापक सदस्य के अनुसार अब कंपनी पवन ऊर्जा उत्पादन व्यवसाय के भीतर एवं उससे परे विस्तार के लिए अपनी विंड 2.0 और सुजलॉन 2.0 पहलों के साथ विकास के अपने अगले चरण के लिए तैयार है।

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विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) की वार्षिक बैठक से इतर तांती ने ‘पीटीआई-भाषा’ के साथ बातचीत में कहा कि कंपनी को इस बात पर गर्व है कि वह पवन ऊर्जा क्षेत्र में टिके रहने वाली केवल पांच वैश्विक कंपनियों में से एक है। अन्य चार कंपनियां अमेरिका की जीई और यूरोप की सीमेंस, वेस्टास तथा नॉर्डेक्स हैं।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सुजलॉन, ‘ग्लोबल साउथ’ की इकलौती कंपनी है।

तांती ने कहा कि यह 30 साल का सफर बेहद लाभकारी रहा है खासकर तब जब इसकी शुरुआत ऐसे समय से हुई थी जब पवन ऊर्जा को व्यवहार्य नहीं माना जाता था।

उन्होंने कहा कि भारत की करीब 50 प्रतिशत ऊर्जा आवश्यकता अब नवीकरणीय स्रोतों से पूरी होती है और देश 2070 तक 100 प्रतिशत कार्बन तटस्थ बनने के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर है।

सुजलॉन के शुरुआती दिनों को याद करते हुए तांती ने बताया कि लोग पूछते थे कि ये पवनचक्कियां क्यों लगाई जा रही हैं क्योंकि ये बहुत अधिक बिजली की खपत करती हैं।

उन्होंने कहा कि अब एक ‘टरबाइन’ करीब एक करोड़ इकाई प्रति वर्ष बिजली उत्पन्न कर सकती है जिसका मतलब है कि एक ‘टरबाइन’ पूरे गांव को बिजली देने के लिए पर्याप्त है।

तांती ने कहा कि मूल्य श्रृंखला में हमारे साथ 2,500 से अधिक सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यम (एमएसएमई) काम कर रहे हैं और भारत में अब निर्यात के माध्यम से वैश्विक पवन ऊर्जा की मांग का लगभग 10 प्रतिशत पूरा करने की क्षमता है।

समूह की विस्तार योजनाओं के बारे में उन्होंने कहा कि विंड 2.0 पवन ऊर्जा व्यवसाय के दृष्टिकोण को पुनर्परिभाषित कर रहा है जिसमें उत्पाद विकास को एक अलग विभाग के रूप में, ईपीसी (इंजीनियरिंग, खरीद एवं निर्माण) तथा सेवा व्यवसायों सहित विभिन्न तत्वों को जोड़ा जा रहा है।

उन्होंने कहा कि डिजिटल बदलाव, ग्राहकों को बेहतर सेवा प्रदान करना और कार्यस्थल पर सुरक्षा जैसे उपायों से इन लक्ष्यों को और भी बल मिलेगा।

तांती ने कहा कि सभी कंपनियां अब ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनने की ओर अग्रसर हैं और यह भारत के विकास के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि हमारी जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) वृद्धि दर को बनाए रखने के लिए है।

उन्होंने कहा कि 2047 तक जीडीपी को 10 गुना बढ़ाने का मतलब है कि ऊर्जा की मांग भी 10 गुना बढ़ जाएगी। हमारे मध्यम वर्ग का आकार भी काफी बढ़ जाएगा, जो उस अवधि में दोगुना होने की संभावना है जिससे ऊर्जा की मांग में और भी अधिक वृद्धि होगी।

तांती ने कहा कि चूंकि हम पहले से ही अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा आयात कर रहे हैं, इसलिए यह ऊर्जा सुरक्षा का खतरा उत्पन्न करता है।

उन्होंने कहा कि इससे विदेशी मुद्रा पर दबाव पड़ता है जबकि पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों में जलवायु और कार्बन उत्सर्जन की लागत भी शामिल होती है।

कृत्रिम मेधा (एआई) के बढ़ते उपयोग और डेटा केंद्रों द्वारा भारी मात्रा में बिजली की खपत के बारे में उन्होंने कहा कि भारत में योजनाबद्ध अधिकतर नए डेटा केंद्र पहले दिन से ही पर्यावरण के अनुकूल होंगे।

उन्होंने कहा कि सरल शब्दों में कहें तो, एक ही खोज के लिए चैटजीपीटी द्वारा खपत गूगल की तुलना में 10 गुना है लेकिन परिणाम भी अलग हैं।

भाषा निहारिका मनीषा

मनीषा


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