नयी दिल्ली, 20 मार्च (भाषा) हवाई क्षेत्र में अचानक लगी पाबंदियों, विमान ईंधन की ऊंची कीमतों और भारी बीमा राशि के कारण विमानन कंपनियां पश्चिम एशिया में उड़ानें संचालित करने में बड़ी चुनौतियों का सामना कर रही हैं।
क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच विमान सेवाओं में पहले ही कटौती की गई है और अब परिचालन से जुड़ी उलझनें और बढ़ गई हैं। विमान कंपनियों के अधिकारियों और चालक दल के सदस्यों का कहना है कि स्थिति बहुत तेजी से बदल रही है और पश्चिम एशिया के लिए उड़ानें भरने में कई तरह के जोखिम बने हुए हैं।
विमानन नियामक डीजीसीए ने सुरक्षा जांच के आधार पर विमान कंपनियों को क्षेत्र के नौ हवाई क्षेत्रों से बचने और आपात स्थिति के लिए पुख्ता वैकल्पिक योजना तैयार रखने को कहा है।
डीजीसीए की सलाह के अनुसार, 28 मार्च तक बहरीन, ईरान, इराक, इजराइल, जॉर्डन, कुवैत, लेबनान, कतर और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के हवाई रास्तों का उपयोग न करने को कहा गया है।
नियामक ने कहा कि भारतीय विमान कंपनियां कुछ शर्तों के साथ ओमान और सऊदी अरब के हवाई रास्तों का उपयोग कर सकती हैं, लेकिन उन्हें 32,000 फीट से कम ऊंचाई पर उड़ान भरने की अनुमति नहीं होगी।
इन नौ हवाई क्षेत्रों के संबंध में डीजीसीए ने स्पष्ट किया है कि विमान कंपनियों को प्रभावित क्षेत्र में किसी भी ऊंचाई पर उड़ान भरने से परहेज करना चाहिए।
इसमें कहा गया है कि यदि कोई कंपनी उड़ान जारी रखती है, तो यह पूरी तरह उसकी जिम्मेदारी और सुरक्षा जोखिम के आकलन पर निर्भर होगा।
डीजीसीए ने कहा कि प्रभावित क्षेत्र के जिन हवाई अड्डों पर अन्य अंतरराष्ट्रीय कंपनियां उड़ानें भर रही हैं, वहां भारतीय कंपनियों को भी किसी भी स्थिति से निपटने के लिए मजबूत तैयारी रखनी चाहिए।
28 फरवरी को अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच संघर्ष शुरू होने के बाद से हवाई रास्तों पर कई तरह की पाबंदियां लगाई गई हैं।
चालक दल के एक सदस्य ने बताया कि कई बार पश्चिम एशिया जाने वाले विमानों को हमले की आशंका के चलते उतरने से पहले आसमान में काफी देर तक चक्कर काटने पड़ते हैं।
अधिकारियों के मुताबिक, युद्ध के कारण बीमा की रकम में भारी उछाल आया है। विमान के आकार के हिसाब से यह अतिरिक्त खर्च 30 लाख रुपये से लेकर एक करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।
एक अधिकारी ने बताया कि अब ‘युद्ध जोखिम शुल्क’ के रूप में छोटे विमान की एक फेरे की उड़ान पर 30-40 लाख रुपये और बड़े विमान पर 90 लाख से एक करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
इसके साथ ही, पश्चिम एशिया क्षेत्र में चलने वाले छोटे विमानों के उपयोग में भी काफी कमी आई है।
एक अन्य बड़ी चुनौती कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण विमान ईंधन की बढ़ती लागत है।
भारतीय विमान कंपनियों के कुल खर्च में ईंधन का हिस्सा लगभग 40 प्रतिशत होता है। इस बढ़ते बोझ की भरपाई के लिए कंपनियों ने ईंधन शुल्क और अतिरिक्त अधिभार वसूलना शुरू कर दिया है।
एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस ने हर घरेलू टिकट पर 399 रुपये का ईंधन शुल्क लगाया है, जबकि विदेशी उड़ानों के लिए भी दरें बढ़ा दी गई हैं।
इंडिगो 425 से 2,300 रुपये और अकासा एयर 199 से 1,300 रुपये तक का ईंधन शुल्क वसूल रही हैं। यह राशि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए अलग-अलग तय की गई है।
भाषा सुमित रमण
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