मरवाही विधानसभा सीट के विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड, देखिए क्या कहता है जनता का मूड-मीटर

मरवाही विधानसभा सीट के विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड, देखिए क्या कहता है जनता का मूड-मीटर

मरवाही विधानसभा सीट के विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड, देखिए क्या कहता है जनता का मूड-मीटर
Modified Date: November 29, 2022 / 08:48 pm IST
Published Date: August 14, 2018 3:00 pm IST

बिलासपुर। विधायकजी के रिपोर्ट कार्ड में आज बारी है छत्तीसगढ़ की मरवाही विधानसभा सीट की। मरवाही विधानसभा जो मध्यप्रदेश के समय से काफी चर्चित सीट रही है, जिसे छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का चुनावी क्षेत्र होने का गौरव हासिल है आदिवासी के लिए आरक्षित इस विधानसभा क्षेत्र की एक और खासियत है कि ये दलबदलू नेताओं के लिए भी जाना जाता हैदरअसल यहां का हर विधायक ने एक न एक बार अपनी पार्टी जरूर बदली है या पार्टी छोड़कर चुनाव लड़ा है।

बिलासपुर जिले में आने वाला मरवाही विधानसभा क्षेत्र मध्यप्रदेश की सीमा से लगा हुआ हैघने जंगलों से घिरा ये इलाका करीब डेढ़ लाख हेक्टयेर में फैला हुआ है इसमें पेंड्रा, गौरेला और मरवाही तहसील का इलाका शामिल हैभालुओँ के लिए भी ये इलाका काफी मशहूर हैइस इलाके में दुर्लभ सफेद भालू भी मिलते हैं लेकिन अब यही भालू यहां की सबसे बड़ी समस्या बन चुके हैंजंगल में रहने वाले ग्रामीणों पर लगातार भालू के हमले की खबर आती हैजोगी सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए ऑपरेशन जामवंत चलाने की घोषणा की थी, लेकिन जोगी के जाते ही ये योजना भी गुम हो गईयही वजह है कि हर चुनाव में यहां दूसरे मुद्दों के साथ भालू भी एक बड़ा मुद्दा होता है।

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यदि मरवाही विधानसभा क्षेत्र के इतिहास की बात की जाए तो एक बड़ा दिलचस्प तथ्य निकलकर आता हैमरवाही दलबदलू विधायकों का क्षेत्र रहा हैइसकी शुरूआत बड़े आदिवासी नेता भंवर सिंह पोर्ते से ही हो जाती है, जिन्होंने 1972 ,1977 और 1980 के चुनाव जीत कर हैट्रिक लगाईलेकिन 1985 में पार्टी ने उनका टिकट काट दिया और कांग्रेस के दीनदयाल ने ये चुनाव जीताअपनी टिकट कटने से नाराज भंवर सिंह ने 1990 में बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीते भीलेकिन 1993 में एक बार फिर उनका टिकट कटा हालांकि ये चुनाव कांग्रेस के पहलवान सिंह मरावी ने जीताभंवर सिंह पोर्ते टिकट कटने की वजह से बीजेपी से भी रूठ गए और 1998 का चुनाव उन्होंने निर्दलीय लड़ा लेकिन वो बुरी तरह से हारे ये चुनाव बीजेपी के रामदयाल उइके ने जीतालेकिन राज्य बनने के बाद 2001 में एक हेरतअंगेज सियासी घटना के तहत रामदयाल उइके न केवल कांग्रेस में शामिल हो गए बल्कि इस्तीफा देकर ये सीट अजीत जोगी के लिए छोड़ दी

2001 के बाद से ये विधानसभा जोगी की होकर रह गई। 2003, 2008 में अजीत जोगी लगातार यहां से विधायक रहे। 2013 में उन्होंने अपनी टिकट अपने बेटे अमित जोगी को दे दी, जिन्होंने 45 हजार के रिकार्ड मतों से जीत हासिल की, लेकिन अब अजीत और अमित जोगी दोनों जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ में हैं और इस बार अमित की जगह अजीत जोगी यहां से चुनाव लड़ेंगे। इसका राजनीतिक इतिहास बताता है कि यहां से भले ही दो बार भारतीय जनता पार्टी के विधायक बने हैं, लेकिन इसकी तासीर कांग्रेसी ही हैअमित जोगी का मानना है कि मरवाही कांग्रेस का नहीं जोगी का गढ़ है और अजीत जोगी यहां के कमिया नंबर वन हैं और अमित खुद कमिया नंबर टू। वह यह भी कहते हैं कि मरवाही के लिए वो नेता नहीं बेटा हैजाहिर है मरवाही में विधायकों की आस्था वक्त के हिसाब से बदलती रही हैहालांकि यहां की जनता ने जरूर अपनी आस्था नेताओं पर बनाए रखी है और उम्मीदवारों को यहां से बार बार मौके दिए हैं।

मुद्दों की बात की जाए तो मरवाही में पिछले तीन विधानसभा चुनाव से चुनावी मुद्दे नहीं बदले हैं। 2003 से पेंड्रा-मरवाही को अलग जिला बनाने की मांग हैआगामी सियासी महासमर में भी नेताओं को इस सवाल से सामना करना पड़ेगा। बिलासपुर से 150 किलोमीटर दूर मरवाही की पीड़ा ये है कि यहां का आदिवासी, विकास तो दूर अपने जिला मुख्यालय से भी इतनी दूर है कि वहां तक पहुंचने की हिम्मत नहीं जुटा पाता लिहाजा ना तो उन्हें सरकारी योजनाओं की जानकारी मिलती है और न ही उनका सही तरह से क्रियान्वयन होता है। नतीजतन ये पिछड़ा इलाका और पिछड़ता जा रहा है।

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यूं तो मरवाही विधानसभा क्षेत्र में कई सालों तक कांग्रेस और जोगी परिवार का दबदबा रहा है, लेकिन विकास की रफ्तार में ये इलाका काफी पिछड़ा नजर आता हैआज भी कई गांवों में बिजली नहीं पहुंची हैवहीं सड़क और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए यहां की जनता तरस रही है लेकिन यहां के सियासतदानों को हर बार चुनाव से पहले मरवाही के आदिवासियों की चिंता जरूर सताने लगती हैअब जब विधानसभा चुनाव नजदीक है तो यहां के नेताओं को याद आ रहा है कि मरवाही कितना बदहाल है खासतौर पर बीजेपी नेता अब इन मुद्दों को सियासी तूल देकर मौजूदा विधायक को घेरने के फिराक में है।

विकास और दूसरी बुनियादी मुद्दों के अलावा मरवाही को जिला बनाने की मांग भी आने वाले चुनाव में यहां बड़ा मुद्दा होगाजोगी का घर और गढ़ होने का खामियाजा मरवाही को भुगतना पड़ा है। यह तो खुद यहां के सिटिंग एमएलए अमित जोगी भी मानते हैं। उनका कहना है कि वे लगातार यहां के अस्पतालों में डाक्टरों की मांग करते रहे हैं, सड़कों को बेहतर करने के लिए, किसानों को मुआवजा दिलाने के लिए, मनरेगा की मजदूरी के लिए आंदोलन करते रहे हैं, लेकिन राज्य सरकार हमेशा मरवाही की गरीब जनता की उपेक्षा करती रही है। मरवाही में मौजूद जोगी समर्थक भी कहते हैं कि अमित जोगी ने सक्रियता से यहां के मुद्दों को उठाया है, लेकिन सरकार बीजेपी की होने के कारण मरवाही का विकास नहीं हुआ

कुल मिलाकर मरवाही विधानसभा क्षेत्र में कई ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें लेकर यहां की जनता आने वाले चुनाव में अपने जनप्रतिनिधियों से जवाब मांगेगीहालांकि सभी पार्टियों का दावा है कि मरवाही की जनता इस बार उन्हें ही जीताएगीजेसीसीजे के नेताओं का मानना है कि मरवाही के लोग अजीत जोगी के मुख्यमंत्री रहते यहां हुए विकास को नहीं भूले हैंवहीं कांग्रेस का कहना है कि बीजेपी और जोगी के यहां विकास नहीं करने का लाभ उन्हें मिलेगा, जबकि बीजेपी राज्य सरकार की उपलब्धियों को जनता के सामने रखकर उनका मन जीतने की कोशिश में जुट गई है।

मरवाही के पिछले चार चुनाव में मुकाबला एक तरफा ही हुए हैं। यहां अजीत जोगी और अमित जोगी ने कांग्रेस की टिकट पर बड़े अंतर से चुनाव जीते हैं, लेकिन 2018 में मरवाही में मुकाबला त्रिकोणीय होने की पूरी संभावना है क्योंकि अजीत जोगी इस चुनाव में कांग्रेस से नहीं बल्कि जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ से लड़ेंगे, लिहाजा कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार भी मैदान में होंगे और चुनावी जंग त्रिकोणीय होगी।

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मरवाही, बिलासपुर जिले का ये इलाका देखने सुनने में  भले ही बिल्कुल सामान्य सा नजर आएलेकिन सियासत में इसकी पहचान बेहद अहम विधानसभा क्षेत्र के तौर पर होती है, क्योंकि कांग्रेस के बेहद कद्दावर नेता और राज्य के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी का चुनाव क्षेत्र रहा है और वो यहां से बड़े अंतर से तीन चुनाव जीत चुके हैंकहते हैं मरवाही में जोगी का जादू चलता है और बीजेपी इसी जादू को तोड़ने में अब तक नाकाम ही रही है। आगामी विधानसभा चुनाव में अजित जोगी का चुनाव लड़ना लगभग तय माना जा रहा हैलेकिन इस बार वो खुद अपनी पार्टी जेसीसीजे के टिकट पर चुनाव लड़ेंगेमरवाही के मौजूदा विधायक अमित जोगी भी इसकी पुष्टि कर चुके हैं।

वहीं दूसरी और बीजेपी की बात की जाए तो वो मरवाही से जोगी के प्रभाव को खत्म करने के इरादे से पूरी ताकत से चुनाव मैदान में हैंपार्टी से संभावित दावेदारों की बात की जाए तो पिछली प्रत्याशी और जिला पंचायत उपाध्यक्ष समीरा पैकरा एक बार फिर चुनावी तैयारियों में जुटी हुई हैं। इसके अलावा जिला पंचायत सदस्य शंकर कंवर भी टिकट की रेस में शामिल हैंशंकर ने डाक्टर भंवरसिंह पोर्ते की बेटी अर्चना पोर्ते से शादी की हैलिहाजा वे हर बार इस दोहरे लाभ का वास्ता देकर टिकट मांग रहे हैं। अर्चना पोर्ते स्वयं भी टिकिट की दावेदार हैं। कांग्रेस से बीजेपी में आए पूर्व विधायक पहलवान सिंह मरावी भी इस बार टिकिट मांग रहे हैं

वहीं दूसरी ओर जोगी परिवार के कांग्रेस छोड़ने के बाद मरवाही में कांग्रेस की मुश्किल बढ़ गई हैहालांकि पार्टी में कई नेता यहां से टिकट की दावेदारी कर रहे हैंलेकिन पार्टी हाईकमान यहां से तानाखार के मौजूदा विधायक और मरवाही के पूर्व विधायक रामदयाल उईके को यहां से चुनाव लड़ने के लिए मना रही हैलेकिन वो नहीं मान रहे हैसामने अजीत जोगी जैसे कद्दावर प्रत्याशी होने के बाद भी दोनों पार्टियों के नेता मान रहे हैं कि इस बार मरवाही बदलाव चाहता हैमरवाही के पिछले चार चुनाव एक तरफा ही हुए हैं। यहां अजीत जोगी और अमित जोगी ने कांग्रेस के टिकट पर बड़े अंतर से चुनाव जीते हैंलेकिन सवाल यही उठता है कि क्या आगामी चुनाव में भी जोगी परिवार नए बैनर के तहत वो वही करिश्माई जीत हासिल करेगी जो वह कांग्रेस में रहकर करता आया है।

वेब डेस्क, IBC24


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