छत्तीसगढ़: अदालत ने 2004 के दुष्कर्म मामले में आरोपी की घटाकर उसे दुष्कर्म के प्रयास का दोषी ठहराया

छत्तीसगढ़: अदालत ने 2004 के दुष्कर्म मामले में आरोपी की घटाकर उसे दुष्कर्म के प्रयास का दोषी ठहराया

छत्तीसगढ़: अदालत ने 2004 के दुष्कर्म मामले में आरोपी की घटाकर उसे दुष्कर्म के प्रयास का दोषी ठहराया
Modified Date: February 19, 2026 / 12:53 am IST
Published Date: February 19, 2026 12:53 am IST

बिलासपुर, 18 फरवरी (भाषा) छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में 2004 के दुष्कर्म के एक मामले में अधीनस्थ अदालत द्वारा दी गई सात वर्ष की सजा को कम करते हुए आरोपी को दुष्कर्म के बजाय दुष्कर्म के प्रयास का दोषी ठहराया है।

उच्च न्यायालय ने आरोपी की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उसकी सजा घटाकर तीन वर्ष छह माह का कठोर कारावास करने का आदेश दिया है।

न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने एक अपील में यह निर्णय पारित किया।

याचिकाकर्ता वासुदेव गोंड ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, धमतरी (कैम्प-रायपुर) द्वारा छह अप्रैल 2005 को पारित उस निर्णय को चुनौती दी थी, जिसमें उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 376(1) के तहत दोषी ठहराते हुए सात वर्ष के कठोर कारावास और धारा 342 के तहत छह माह के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने 16 फरवरी के आदेश में कहा, ‘‘इस अदालत ने माना कि दुष्कर्म सिद्ध करने के लिए ‘पेनिट्रेशन’ का प्रमाण आवश्यक है, भले ही वह आंशिक ही क्यों न हो। प्रस्तुत मामले में उपलब्ध साक्ष्यों से पूर्ण बलात्कार सिद्ध नहीं होता, लेकिन आरोपी द्वारा बलात्कार का प्रयास किया जाना अवश्य सिद्ध होता है।’’

धमतरी जिले की निवासी पीड़िता 21 मई 2004 को जब घर पर अकेली थी तब आरोपी उसे बहाने से अपने घर ले गया और उससे कथित तौर पर दुष्कर्म किया। बाद में उसे कमरे में बंद कर उसके हाथ-पैर बांध दिए।

इस घटना के संबंध में थाना अर्जुनी में मामला दर्ज कराया गया।

मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन ने 19 गवाहों से सवाल जवाब किये। पीड़िता ने अपने बयान में आरोपी द्वारा जबरन यौन संबंध बनाने की बात कही, हालांकि जिरह में उसने ‘पेनिट्रेशन’ को लेकर विरोधाभासी बयान दिया।

उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद 21 जनवरी 2026 को फैसला सुरक्षित रख लिया था जिसे 16 फरवरी को सुनाया गया।

फैसले के अनुसार उच्च न्यायालय ने पूरे मामले में साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए पाया कि पीड़िता के बयान में ‘पेनिट्रेशन’ को लेकर स्पष्टता नहीं है।

न्यायालय ने माना कि उपलब्ध साक्ष्यों से दुष्कर्म सिद्ध नहीं होता, लेकिन आरोपी द्वारा दुष्कर्म का प्रयास किया जाना जरूर सिद्ध होता है।

उच्च न्यायालय ने गोंड को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(1) और 511 के तहत दोषी ठहराया, न कि केवल धारा 376 के तहत, और उसे तीन साल छह महीने के कठोर कारावास की सजा सुनाई। साथ ही, धारा 342 के तहत छह महीने की सजा भी बरकरार रखी गई। दोनों सजाएं एक साथ चलेंगी।

उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि आरोपी द्वारा पूर्व में काटी गई सजा का समायोजन किया जाएगा।

अदालत ने आरोपी की जमानत रद्द कर दी और उसे निर्देश दिया कि वह दो माह के भीतर अधीनस्थ अदालत में आत्मसमर्पण करे, वरना उसकी गिरफ्तारी के लिए कार्रवाई की जाएगी।

भाषा सं संजीव खारी

खारी


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