Reported By: dhiraj dubay
,Korba Hanumant Katha News: कोरबा: छत्तीसगढ़ की ऊर्जा नगरी कोरबा में पांच दिवसीय श्री हनुमंत कथा के दौरान इस बार सबसे प्रमुख घटनाक्रम तब सामने आया, जब बेमेतरा जिले के कोदवा गांव निवासी अनवर खान ने स्वेच्छा से सनातन धर्म अपनाने की घोषणा की। कथा स्थल पर मंच से यह घटनाक्रम होते ही उपस्थित श्रद्धालुओं के बीच खासा उत्साह देखा गया और ‘जय श्री राम’ के नारों से पूरा पंडाल गूंज उठा। अनवर खान ने बताया कि बचपन से ही उनका झुकाव सनातन धर्म की ओर रहा है। वे स्कूल में एकमात्र मुस्लिम छात्र थे, लेकिन हिंदू रीति-रिवाज, पूजा-पाठ और परंपराओं से प्रभावित रहे। (Korba Hanumant Katha News) इसी कारण उन्होंने अपनी इच्छा से सनातन धर्म अपनाने का निर्णय लिया। कथा स्थल पर विधि-विधान के साथ उनका सनातन धर्म में प्रवेश कराया गया। इस दौरान अनवर खान का नाम बदलकर अर्जुन सिंह रखा गया, वहीं उनकी पत्नी हसीना का नाम प्रिया सिंह रखा गया। पूरे अनुष्ठान के दौरान धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन किया गया और मंच से इस परिवर्तन को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कराया गया।
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने मीडिया से चर्चा में बताया कि, उन्हें ऐसे 500 से अधिक लोगों की सूची प्राप्त हुई थी, जो सनातन धर्म में जुड़ना चाहते थे। हालांकि सुरक्षा और अन्य कारणों से कई लोग मंच पर नहीं आ सके, लेकिन उनका भी विधि-विधान से घर वापसी कराई गई। आयोजकों ने इस पूरे आयोजन की सफलता के लिए सभी श्रद्धालुओं और सहयोगकर्ताओं का आभार जताया। उन्होंने कहा कि यह एक बड़ा कार्य था, जो सभी के सामूहिक सहयोग से संभव हो सका। 108 निर्धन कन्याओं का विवाह, ब्लड डोनेशन और 500 से अधिक लोगो की घर वापसी आसान नहीं थी। (Korba Hanumant Katha News) इसी आयोजन के दौरान एक बेहद मार्मिक और भावुक दृश्य भी सामने आया, जिसने पूरे कथा पंडाल को भावनाओं से भर दिया। कोरबा जिले के पाली क्षेत्र अंतर्गत ग्राम मुनगाडीह निवासी वृद्ध शत्रुघ्न प्रसाद श्रीवास की अर्जी जब दिव्य दरबार में खुली, तो किसी ने भी नहीं सोचा था कि यह क्षण इतना संवेदनशील और प्रेरणादायक बन जाएगा। लाठी के सहारे धीरे-धीरे चलते हुए जब शत्रुघ्न श्रीवास मंच तक पहुंचे, तो उनकी सादगी और जीवन संघर्ष उनके चेहरे पर साफ झलक रहा था।
Korba Hanumant Katha News: धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने उनसे बातचीत शुरू की- उनकी शिक्षा, परिवार और जीवन की परिस्थितियों के बारे में पूछा। इसके बाद जब उनकी समस्या पूछी गई, तो बाबा ने पर्चे के माध्यम से जो बताया, वह पूरी तरह सटीक निकला। वृद्ध ने बताया कि उनके बेटे और बहू की अकाल मृत्यु हो चुकी है। उस कठिन समय में उन्होंने हार नहीं मानी, बल्कि अपने पांच छोटे-छोटे पोतों की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली। वर्षों तक उन्होंने मेहनत कर बच्चों का पालन-पोषण किया, उन्हें बड़ा किया, उनकी पढ़ाई कराई और फिर उनका विवाह भी कराया। लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर, जब उन्हें सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत थी, वही पोते उनसे दूरी बनाने लगे। वृद्ध ने दर्द भरे स्वर में बताया कि अब घर में उनकी कोई पूछ-परख नहीं होती। पोते नशे की आदत में पड़ चुके हैं और उनकी स्थिति दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है। यह सुनते ही पूरा पंडाल कुछ क्षणों के लिए शांत हो गया। हंसी-ठिठोली के बीच अचानक माहौल गंभीर हो गया और कई लोगों की आंखें नम हो गईं। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री भी इस पीड़ा को सुनकर भावुक नजर आए। (Korba Hanumant Katha News) बाबा ने उन्हें न केवल आध्यात्मिक उपाय बताए, बल्कि बागेश्वर धाम, छतरपुर आने का निमंत्रण भी दिया। जब वृद्ध ने यह कहा कि वे पैदल चलकर कथा स्थल तक पहुंचे हैं, तो यह सुनकर सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए। इसी क्षण धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने मानवता और संवेदनशीलता का परिचय देते हुए अपने पास रखे 50 हजार रुपये की एक गड्डी वृद्ध को दे दी। यह राशि एक भक्त द्वारा कैंसर अस्पताल के सहयोग के लिए दी गई थी, जिसे उन्होंने तत्काल वृद्ध की सहायता में समर्पित कर दिया।
इसके बाद उन्होंने मंच से उपस्थित लोगों, विशेषकर वीआईपी और समर्थ श्रद्धालुओं से अपील की कि वे भी इस वृद्ध की मदद के लिए आगे आएं। देखते ही देखते कई लोग खड़े हुए और सहायता राशि देने लगे। आयोजकों ने भी इसमें सक्रिय भूमिका निभाई। कार्यक्रम आयोजक अमरजीत सिंह ने अपने कार्यकर्ता शैलू को निर्देश दिया कि, वे वृद्ध को सुरक्षित उनके घर तक पहुंचाएं, ताकि न तो उन्हें रास्ते में कोई परेशानी हो और न ही दी गई राशि को लेकर कोई जोखिम हो। मंच पर ही दो पत्रकारों और समिति के एक सदस्य को बुलाकर पूरी राशि की गिनती कराई गई,(Korba Hanumant Katha News) जिससे पारदर्शिता बनी रहे। गिनती के बाद यह सामने आया कि कुल 1 लाख 6 हजार रुपये की राशि एकत्र हुई है। यह पूरी रकम सम्मानपूर्वक वृद्ध शत्रुघ्न श्रीवास को सौंप दी गई। इस सहायता से न केवल उनके जीवन यापन में सहारा मिलेगा, बल्कि अब वे बागेश्वर धाम, छतरपुर जाकर अपने आध्यात्मिक मार्गदर्शन को भी आगे बढ़ा सकेंगे। यह पूरा घटनाक्रम न केवल मानवीय संवेदना का उदाहरण बना, बल्कि यह भी दर्शाता है कि समाज में आज भी करुणा और सहयोग की भावना जीवित है। एक ओर जहां मंच पर धर्मांतरण का बड़ा निर्णय चर्चा का केंद्र बना, वहीं दूसरी ओर एक जरूरतमंद बुजुर्ग की सहायता ने इस आयोजन को और भी अधिक अर्थपूर्ण बना दिया।
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