Vishnu ka Sushasan: समय की ज़रूरत और सामाजिक संवाद का सशक्त मंच बना रायपुर साहित्य उत्सव, साय सरकार के प्रयासों से शुरू हुआ नया अध्याय

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समय की ज़रूरत और सामाजिक संवाद का सशक्त मंच बना रायपुर साहित्य उत्सव, Raipur Literature Festival Third day

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  • Publish Date - January 26, 2026 / 12:00 AM IST,
    Updated On - January 26, 2026 / 12:16 AM IST

Raipur Literature Festival. Image Source- IBC24

रायपुरः मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में बीते दो वर्षों में छत्तीसगढ़ सरकार ने साहित्य और संस्कृति के संरक्षण को केवल औपचारिक दायित्व नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व के रूप में स्वीकार किया है। राज्य की बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक और आदिवासी पहचान को केंद्र में रखते हुए सरकार ने साहित्य को जनजीवन से जोड़ने के लिए कई ठोस पहलें की हैं। साय सरकार ने साहित्यिक गतिविधियों को संस्थागत आधार देने पर विशेष ध्यान दिया। इसकी बानगी के राजधानी रायपुर में आयोजित साहित्य उत्सव के रूप में दिखी।

छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी आदिवासी और लोक साहित्य परंपरा में निहित है। साय सरकार ने इसी को ध्यान में रखकर राजधानी रायपुर के पुरखौती मुक्तांगन में 23 से 25 जनवरी तक रायपुर साहित्य महोत्सव का आयोजित की। इन 3 दिनों के उत्सव में 42 सत्रों के जरिए साहित्य, संस्कृति और अलग-अलग मुद्दों विचार-विमर्श हुई। देश-प्रदेश के 120 ख्यातिप्राप्त लेखक, कवि, विचारक, बुद्धिजीवी और साहित्य प्रेमी इसमें शामिल हुए। तीन दिनों तक साहित्य प्रेमियों का जोश हाई रहा। उत्सव के तीसरे दिन भी परिसर में बड़ी संख्या में लोगों की उपस्थिति रही। विभिन्न आयु-वर्ग के नागरिकों, छात्रों, साहित्यकारों और शोधार्थियों ने उत्सव में पहुँचकर सक्रिय रूप से सहभागिता की। आखिरी दिन पत्रकारिता और साहित्य, ट्रैवल ब्लॉग: पर्यटन के प्रेरक, नाट्यशास्त्र और कला परंपरा, समाज और सिनेमा, संविधान और भारतीय मूल्य , शासन और साहित्यके अंतर्संबंधों पर बुद्धिजीवी वक्ताओं ने अपने विचार रखें।

साय सरकार ने बनाया जनभागीदारी वाला आयोजन

आज का समाज तेजी से सूचना आधारित और डिजिटल होता जा रहा है। सोशल मीडिया और त्वरित कंटेंट के युग में गहन विचार, संवाद और विमर्श के लिए जगह सीमित होती जा रही है। ऐसे में रायपुर साहित्य उत्सव ने लेखकों, कवियों, पत्रकारों, विचारकों और पाठकों को आमने-सामने संवाद का अवसर दिया। ह मंच साहित्य को केवल किताबों तक सीमित न रखकर समाज, राजनीति, पर्यावरण, आदिवासी संस्कृति, स्त्री विमर्श और समकालीन चुनौतियों से जोड़ने में सफल रहा। यही इसकी सबसे बड़ी प्रासंगिकता रही। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा इस साहित्य उत्सव को जिस स्तर पर समर्थन और संरचना दी गई, वह सराहनीय रही। सरकार ने इसे केवल औपचारिक कार्यक्रम न बनाकर जनभागीदारी वाला आयोजन बनाने का प्रयास किया। स्थानीय साहित्यकारों, युवा रचनाकारों और क्षेत्रीय भाषाओं को मंच देकर यह संदेश दिया गया कि साहित्य केवल बड़े नामों तक सीमित नहीं, बल्कि जमीन से जुड़ी आवाज़ों का भी प्रतिनिधित्व करता है। साय सरकार की यह पहल छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा सकती है।

दीर्घकालिक होगा रायपुर साहित्य उत्सव का प्रभाव

रायपुर साहित्य उत्सव का प्रभाव तात्कालिक नहीं बल्कि दीर्घकालिक होगा। ऐसे आयोजनों से युवाओं में पढ़ने-लिखने की रुचि बढ़ती है और वैचारिक परिपक्वता का विकास होता है। साहित्य जब समाज के मुद्दों से जुड़ता है, तो वह संवेदनशीलता, सहिष्णुता और संवाद की संस्कृति को मजबूत करता है। यह उत्सव न केवल पाठकों और लेखकों के बीच सेतु बना, बल्कि समाज को सोचने-समझने की नई दृष्टि भी देता है। आने वाले समय में इसके सकारात्मक प्रभाव शिक्षा, मीडिया और सांस्कृतिक गतिविधियों में स्पष्ट दिखाई दे सकते हैं। रायपुर साहित्य उत्सव का समापन भले ही हो गया हो, लेकिन इसके विचार और संवाद समाज में लंबे समय तक गूंजते रहेंगे। यह आयोजन छत्तीसगढ़ को साहित्यिक मानचित्र पर मजबूत पहचान देने के साथ-साथ समाज में विचारशीलता और सांस्कृतिक चेतना को सशक्त करने की दिशा में एक सार्थक पहल साबित हुआ है।

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