DR Charandas Mahat Letter: डॉ. चरणदास महंत ने राष्ट्रपति को लिखा खत.. इस अधिकार के खुलेआम उल्लंघन का लगाया आरोप, आखिर कौन हो रहा कानूनी हक से वंचित? जानें
DR Charandas Mahat Letter to President Murmu: चरणदास महंत ने राष्ट्रपति को पत्र लिख वन अधिकार अधिनियम उल्लंघन का आरोप लगाया, आदिवासियों के हक की मांग।
DR Charandas Mahat Letter to President Murmu || Image- DR CD Mahant Instagram
- चरणदास महंत ने राष्ट्रपति मुर्मू को शिकायत पत्र भेजा।
- 50 हजार से अधिक आदिवासी परिवारों के अधिकार प्रभावित होने का दावा।
- वन अधिकार अधिनियम लागू कराने की तत्काल मांग उठाई गई।
रायपुर: छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के दिग्गज नेता और नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर राज्य सरकार की शिकायत की है। (DR Charandas Mahat Letter to President Murmu) उन्होंने अपने पत्र के जरिये दवा किया है कि, राज्य में वन अधिकार अधिनियम का खुला उल्लंघन किया जा रहा है।
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डॉ महंत के मुताबिक़ राज्य के वन्य क्षेत्र में निवासरत 50 हजार से ज्यादा आदिवासी परिवारों को उनके कानूनी हक से वंचित किया जा रहा है। डॉ महंत ने राष्ट्रपति से राज्य में वन अधिकार अधिनियम की धारा 3(1)(घ) को तत्काल प्रभाव से लागू कराने की मांग की है।
पढ़ें क्या लिखा है नेता प्रतिपक्ष ने अपने खत में
डॉ चरणदास महंत ने लिखा है कि, “अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006” (जिसे आगे केवल वन अधिकार अधिनियम कहा जायेगा) है सम्पूर्ण दिसंबर 2007 से प्रभावशील है। (DR Charandas Mahat Letter to President Murmu) इस अधिनियम की धारा 3(1)(क) के अनुसार वन भूमि पर स्थित जलाशयों में मत्स्य और जलाशयों के अन्य उत्पाद के उपयोग या उस पर हकदारी के सामुदायिक अधिकार पात्र व्यक्तियों को दिये जाने चाहिए। परन्तु छत्तीसगढ़ राज्य में इस प्रावधान का क्रियान्वयन 18 वर्षों में भी नहीं किया जा सका है।”
“मछली नीति” में वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों की अनदेखी
डॉ महंत ने अपने पत्र में बताया है कि, “छत्तीसगढ़ राज्य में लगभग 1,58,000 हेक्टेयर जलक्षेत्र वन भूमि पर स्थित हैं। इन जलाशयों में मछली पालन तथा मत्स्याखेट करके 50,000 से अधिक अनुसूचित जनजाति और अन्य वन निवासी परिवार जीवन यापन करते हैं। छत्तीसगढ़ शासन की “मछली नीति” में वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों का ध्यान नहीं रखा गया है बल्कि उसके विपरीत प्रावधान हैं। जिसके कारण वन भूमि पर स्थित जलक्षेत्र वन अधिकार अधिनियम का उल्लंघन करते हुए पट्टे पर और 1000 हेक्टेयर से बड़े जलाशय निविदाएं आमंत्रित करके पट्टे दिये जाते हैं। बड़े जलाशयों में, अनुसूचित जनजाति और अन्य वन निवासी व्यक्ति ठेकेदारों के मजदूर तौर पर कार्य करते हैं। जबकि वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार वन भूमि पर स्थित जलक्षेत्रों का सामुदायिक अधिकार दिया जाना चाहिए।”
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उन्होंने पत्र में अनुरोध किया है कि, “वन अधिकार अधिनियम की धारा 3(1)(घ) को तत्काल प्रभाव से क्रियान्वित करवाने के लिये छत्तीसगढ़ के माननीय राज्यपाल महोदय एवं माननीय मुख्यमंत्री महोदय को निर्देशित करने की महान कृपा करेंगे।”


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