देखिए सामरी विधानसभा सीट के विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड और जनता का मूड-मीडर
देखिए सामरी विधानसभा सीट के विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड और जनता का मूड-मीडर
अंबिकापुर। विधायकजी का रिपोर्ट कार्ड में आज हम बात करेंगे सामरी विधानसभा क्षेत्र के विधायक की। सामरी विधानसभा क्षेत्र बलरामपुर जिले में आने वाली इस सीट पर चुनाव हमेशा से ही रोमांचक रहा है। वर्तमान में यहां कांग्रेस के डॉ प्रीतम राम विधायक हैं, जिन्होंने पिछली बार बीजेपी के इस मजबूत गढ़ में सेंध लगाई। लेकिन राज्य को करोड़ों का राजस्व देने वाली बाक्साइट की खदानों से घिरा ये विधानसभा क्षेत्र, खुद मुफलिसी में घिरा नजर आता है। जाहिर है यहां के लोगों की परेशानियां चुनाव में अपना असर जरूर दिखाएंगी।
झारखंड की सीमा से लगे बलरामपुर जिले में आने वाली सामरी विधानसभा यूं तो हरीभरी वादियों और अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के लिए जाना जाता है। लेकिन इस खूबसूरती के पीछे की हकीकत कुछ और है। जी हां! सरहदी इलाका होने की वजह से सामरी में नक्सली घटनाएं होना आम बात है। यही वजह है कि यहां विकास कार्यों की रफ्तार दूसरे इलाकों से काफी धीमी नजर आती है। हालांकि डॉ प्रीतम राम ऐसा नहीं मानते। उनका दावा है कि उन्होंने अपने क्षेत्र का बेहतर विकास किया है।
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कहने को तो सामरी विधानसभा क्षेत्र में बाक्साइट की खदानें हैं और ये खदानें से छत्तीसगढ़ में ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश को राजस्व देते हैं। लेकिन स्थानीय युवा ही यहां बेरोजगार घूम रहे हैं। वहीं शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का भी बुरा हाल है। बारिश के दिनों में यहां डायरिया का कहर आम बात है। जाहिर है विपक्ष इन मुद्दों को लेकर कांग्रेस विधायक को घेरने की फिराक में है। हालांकि प्रीतम राम का कहना है कि विपक्ष का नेता होने के कारण राज्य सरकार उनके साथ भेदभाव करती है।
सामरी में मनरेगा के काम में हो रही गड़बड़ी भी बड़ा चुनावी मुद्दा है, जो कांग्रेस विधायक के खिलाफ जा सकता है। कई गांवों में अब तक PMGSY की सड़कें नहीं बनीं है। अगर कहीं बनी भी है तो भ्रष्टाचार भी भेंट चढ़ चुकी है। बिजली कटौती को लेकर भी क्षेत्र की जनता में नाराजगी साफ देखी जा सकती है।
आगामी चुनाव में सामरी को जिला बनाने की मांग भी प्रमुख मुद्दा होगा। बलरामपुर जिला मुख्यालय से दूरी ज्यादा होने और तीन ब्लॉक की विधानसभा होने की वजह से सामरी को जिला बनाने की मांग उठने लगी है और ये मुद्दा इस विधानसभा चुनाव में नेताओं के लिए मुसीबत बन सकती है।
सामरी विधानसभा सरगुजा की पुरानी सीटों में से एक है। यहां की सियासत कई दशकों तक बीजेपी के कद्दावर नेता लरंग साय के आसपास ही घूमती रही है। लरंग साय ना सिर्फ लंबे समय तक विधायक रहे बल्कि सांसद के रूप में केंद्रीय मंत्री भी बने। लेकिन इस सीट से लरंग साय को भी हार का सामना करना पड़ा। वैसे 2008 में यहां वक्त दिलचस्प सियासी हालात बने जब कांग्रेस ने ये सीट एनसीपी के लिए छोड़ दी थी।
सदियों से इस एतिहासिक धरोहर को अपने दामन में समेटे रखने वाले सामरी विधानसभा क्षेत्र का सियासी इतिहास दिलचस्प रहा है। ये सीट छत्तीसगढ़ में बीजेपी के सबसे मजबूत गढ़ों में से एक रही है। आदिवासी वोट बैंक के दम पर सालों तक अपने आप को सत्ता के शिखर पर टिकाए रखने वाली कांग्रेस इस आदिवासी सीट पर केवल दो बार ही अपना परचम लहरा पाई है। जिसमें से 2013 का विधानसभा चुनाव भी शामिल है।
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वैसे सामरी में जनसंघ के जमाने से भगवा पूरी शान से लहराता रहा है। सबसे पहले 1967 में इस सीट पर जनसंघ का कब्जा हुआ और लरंग साय ने अपना पहला चुनाव जीता। 1972 में उन्होंने अपनी सफलता को बरकरार रखा। 1977 में उन्होंने लोकसभा का चुनाव जीता और सांसद हो गए और उनकी जगह यहां से जनता पार्टी से अमीन साय विधायक चुने गए। 1980 में लरंग साय ने फिर विधानसभा चुना लड़ा और विधायक चुने गए। लेकिन 1985 में कांग्रेस लरंग साय का जादू तोड़ने में कामयाब रही उसके प्रत्याशी महेश्वरराम ने यहां से चुनाव जीता। लेकिन 1990 में बीजेपी ने यहां फिर वापसी की अमीन साय यहां से चुनाव जीते। 1993 में भी बीजेपी ने यहां अपना कब्जा बरकरार रखा। इसके बाद 1998 में बीजेपी के सोहन लाल और 2003 में बीजेपी के ही सिद्धनाथ पैकरा ने यहां चुनाव जीता।
2008 में सामरी में उस वक्त दिलचस्प सियासी समीकरण बने जब कांग्रेस ने एनसीपी से समझौता कर यहां से अपना उम्मीदवार चुनाव में नहीं उतारा। लेकिन ये सियासी समीकरण बीजेपी के पक्ष में गया। 2013 के विधानसभा चुनाव की बात की जाए तो बीजेपी की टिकट पर एक बार फिर सिद्धनाथ पैंकरा थे, लेकिन इस बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा और डॉक्टर की नौकरी छोड़कर कांग्रेस के प्रीतम राम ने एक बड़े अंतर से जीत हासिल की। इस चुनाव में कांग्रेस को जहां 82585 वोट मिले तो वहीं बीजेपी 50762 केवल वोट ही ले पाई। इसी जीत का अंतर 31823 वोटों का रहा।
1 लाख 91 हजार 347 मतदाता वाली सामरी विधानसभा भले ही आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित है, लेकिन यहां सामान्य मतदाता काफी अहम भूमिका निभाते हैं। सामरी विधानसभा के राजपुर ब्लॉक में अधिकतर सामान्य मतदाता हैं और यही विधायक के चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सामरी में सियासी गतिविधियां सरगर्म हो चली हैं और कांग्रेस के मुकाबले बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती दावेदारों की लंबी फेहरिस्त से निपटना है।
सामरी विधानसभा शुरू से ही बीजेपी के कब्जे में रही है। अभी तक सिर्फ दो बार ही यहां से बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है। इसमें 2013 के चुनाव भी शामिल हैं। इस चुनाव में सिद्धनाथ पैकरा को हराकर कांग्रेस के प्रीतम राम ने यहां से चुनाव जीता था। बीजेपी की हार ने आने वाले चुनाव में यहां से दावेदारों की संख्या बढ़ा दी है, लेकिन कांग्रेस से अभी भी प्रीतम राम ही सबसे बड़े उम्मीदवार के रूप में दिखायी देते हैं। वैसे बातें ये भी निकलकर सामने आ रही है कि जातिगत समीकरण के चलते कांग्रेस विधायक को सीट बदलने को भी कह सकती है।
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मरीजों की नब्ज चेक करते-करते कांग्रेस विधायक डॉ प्रीतम राम सामरी के सियासी नब्ज को टटोलने की कोशिश कर रहे हैं। जी हां! 2013 में मेडिकल ऑफिसर की नौकरी छोड़कर राजनीति के मैदान में उतरने वाले डॉ प्रीतम एक बार फिर चुनावी तैयारियों में जुट गए हैं। कांग्रेस की तरफ से वो स्वाभाविक दावेदार हैं, लेकिन सियासी गलियारो से ये बातें भी निकलकर सामने आ रही है कि इस बार पार्टी उन्हें उनके पारिवारिक सीट लुंड्रा से चुनाव मैदान में उतार सकती है। वैसे प्रीतम राम इस बात को सिरे से खारिज करते हैं।
कांग्रेस के मुकाबले सामरी में बीजेपी की टिकट के लिए ज्यादा घमासान है। दरअसल पिछली बार सिद्धनाथ पैकरा के चुनाव हारने के बाद दूसरे नेताओं को यहां से दावेदारी करने का मौका मिल गया है। लेकिन बीजेपी एसटी मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद भी सिद्धनाथ पैकरा सामरी में लगातार सक्रिय नजर आए और एक बार फिर टिकट के लिए ताल ठोंक रहे हैं।
सिद्धनाथ पैकरा के अलावा संभावित उम्मीदवारों की बात करें तो सबसे पहला नाम रामलखन पैकरा का है। रामलखन पैकरा सरगुजा में बीजेपी के जनक लरंग साय के रिश्तेदार हैं और सरगुजा बीजेपी के महामंत्री हैं। कयास लगाया जा रहा है कि बीजेपी संगठन में अच्छी पकड़ के कारण रामलखन पैकरा को इसका फायदा मिल सकता है।
कुल मिलाकर सामरी में बीजेपी और कांग्रेस के अलावा कोई और दूसरी राजनीतिक पार्टी यहां मुकाबले में नहीं है। लेकिन अनुसूचित जनजाति के लिए रिजर्व सामरी में चुनाव के नतीजे आदिवासी वोटरों के मूड पर निर्भर करते हैं। लिहाजा दोनों पार्टियों की कोशिश इन जातियों के उम्मीदवार को ही चुनाव मैदान में उतारने की रहेगी।
वेब डेस्क, IBC24

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