पश्चिम बंगाल में भाजपा की हार, लेकिन कैलाश विजयवर्गीय सहित मध्यप्रदेश के नेताओं ने पांच राज्यों में मनवाया लोहा
पश्चिम बंगाल में भाजपा की हार, लेकिन कैलाश विजयवर्गीय सहित मध्यप्रदेश के नेताओं ने पांच राज्यों में मनवाया लोहा
भोपाल: पश्चिम बंगाल समेत देश के पांच राज्यों में हुए चुनावों ने मध्यप्रदेश के नेताओं का लोहा मनवाया है। भले ही बंगाल में बीजेपी सरकार न बना पाई हो पर मुख्य विपक्षी दल बनकर बीजेपी ने बंगाल में जमीन काफी मजबूत की है। इन चुनावों में मध्यप्रदेश के बड़े नेताओं कैलाश विजयवर्गीय, नरेंद्र सिंह तोमर, नरोत्तम मिश्रा जैसे नेताओ के कद को बढ़ाकर बड़े नेताओ की कतार में शुमार कर दिया है। जिन्होंने खुद को साबित किया है।
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पांच राज्यों के चुनाव ने मध्यप्रदेश के जिन नेताओं का कद बढ़ाया है, उनमें पहले नंबर पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हैं। जिन्होंने असम और पश्चिम बंगाल में जिन 7 सीटों पर प्रचार किया, उनमें से 6 पर बीजेपी का परचम लहराया है। शिवराज ने जिन 7 विधानसभा क्षेत्रों में सभाएं कीं हैं उनमें से बीजेपी ने 6 पर जीत दर्ज की है। पश्चिम बंगाल के प्रभारी रहे कैलाश विजयवर्गीय ने करीब सालभर से वहां डेरा डालकर माहौल बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आंकड़ों के लिहाज से यहां पर बीजेपी की सफलता को नजरअंदाज नहीं कर सकते, जिसने तीन से 78 सीटों तक का बड़ा सफर तय किया है।
असम में बीजेपी की सत्ता बरकरार रखने के लिए कैबिनेट मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की बड़ी भूमिका है। जिन्हें असम के प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई थी। भाजपा के प्रदेश संगठन महामंत्री सुहास भगत ने भी बराबरी से भूमिका अदा की। मध्यप्रदेश सरकार के गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा को 48 विधानसभा सीट का प्रभारी बनाया गया था। जिन्होंने दर्जन भर से ज्यादा रोड शो के अलावा छोटी-बड़ी करीब 50 रैलियां कीं। साथ ही करीब 10 हजार कार्यकर्ताओं को बीजेपी में शामिल कराया। नतीजों के बाद इन नेताओं के भविष्य का आकलन भी किया जा रहा है। वहीं कांग्रेस आरोप लगा रही है कि परिणामों से सबके सपने चकनाचूर हुए हैं।
केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल, तपन भौमिक, विश्वास सारंग और अरविंद भदौरिया भी प्रचार के दौरान बंगाल में सक्रिय रहे। हालांकि चर्चा सबसे ज्यादा शिवराज सिंह चौहान, कैलाश विजयवर्गीय, नरेंद्र सिंह तोमर और नरोत्तम मिश्रा 4 चेहरों को लेकर ही है। हालांकि सियासत में जीत-हार के मायने योग्यता नहीं, बल्कि प्रयास का विषय रहे हैं। क्योंकि सत्ता सौंपने का फैसला जनता जनार्दन के हाथ है, जो कई बिंदुओं पर परखते हुए निर्णय करती है।
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