130th Constitutional Amendment Bill Update 2026 : PM-CM समेत मंत्रियों को लेकर बड़ा फैसला? 17 जुलाई को आ सकती है JPC रिपोर्ट, 30 दिन हिरासत वाला नियम फिर चर्चा में
130वें संविधान संशोधन विधेयक पर संयुक्त संसदीय समिति (JPC) 17 जुलाई को अपनी रिपोर्ट लोकसभा स्पीकर को सौंप सकती है। रिपोर्ट संसद के मानसून सत्र से पहले आने की संभावना है। विधेयक के कुछ प्रावधानों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मतभेद बने हुए हैं।
130th Constitutional Amendment Bill Update 2026 / Image Source : X
- 17 जुलाई को JPC रिपोर्ट आने की संभावना।
- 30 दिन हिरासत वाले प्रावधान पर चर्चा तेज।
- विधेयक को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने।
नई दिल्ली : 130th Constitutional Amendment Bill Update 2026 : विवादास्पद 130वें संविधान संशोधन विधेयक पर एक बड़ी अपडेट सामने आई है। इस विधेयक की समीक्षा कर रही 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (JPC) आगामी 17 जुलाई को लोकसभा स्पीकर को अपनी रिपोर्ट सौंप सकती है। इस बिल का मुख्य उद्देश्य आपराधिक मामलों में हिरासत में लिए जाने पर मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और यहां तक कि प्रधानमंत्री को भी पद से हटाना है। यह महत्वपूर्ण रिपोर्ट संसद के आगामी मानसून सत्र से ठीक पहले आएगी, जिसके 20 जुलाई से शुरू होने की संभावना है।
पिछले साल लाया गया था विधेयक
गृह मंत्री अमित शाह द्वारा पिछले साल अगस्त में पेश किए गए इस विधेयक की जांच के लिए बीजेपी सांसद अपराजिता सारंगी की अध्यक्षता में JPC का गठन किया गया था। Amit Shah Minister Removal Lawसूत्रों के अनुसार, समिति अपनी रिपोर्ट में इस सबसे विवादित प्रावधान को बरकरार रख सकती है, जिसके तहत यदि कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री गंभीर अपराधों के आरोप में लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रहता है, तो 31वें दिन वह ऑटोमेटिक ही पद से मुक्त हो जाएगा। हालांकि, राजनीतिक बदले की भावना से होने वाले दुरुपयोग को रोकने के लिए कानून में कुछ सुरक्षात्मक उपाय जोड़ने के सुझाव भी शामिल किए जा सकते हैं।
एस निरंजन रेड्डी भी पन्नेल
JPC Report On Minister Disqualification इस समिति में असदुद्दीन ओवैसी और सुप्रिया सुले जैसे प्रमुख विपक्षी नेता भी शामिल हैं, जो इस रिपोर्ट पर अपना असहमति पत्र दे सकते हैं। राज्यसभा सांसद के एस निरंजन रेड्डी भी इस पैनल का हिस्सा हैं। कांग्रेस सहित विपक्षी इंडिया गठबंधन के अधिकांश सदस्यों ने इस समिति का यह कहकर बहिष्कार किया था कि सत्ता पक्ष उनके सुझावों को दरकिनार कर इसे केवल एक ‘रबर स्टैम्प’ की तरह इस्तेमाल कर रहा है।
अलोकतांत्रिक और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ
विपक्ष का तर्क है कि यह विधेयक अलोकतांत्रिक और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है क्योंकि यह दोषसिद्धि से पहले केवल हिरासत के आधार पर कार्रवाई करता है। वहीं सत्ता पक्ष का मानना है कि 30 दिन का समय कम से कम तीन बार जमानत याचिका दायर करने के लिए पर्याप्त है।
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