1962 के युद्ध के नायक जसवंत सिंह रावत के उत्तराखंड स्थित घर को संग्रहालय में बदला जाएगा:बलूनी

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1962 के युद्ध के नायक जसवंत सिंह रावत के उत्तराखंड स्थित घर को संग्रहालय में बदला जाएगा:बलूनी

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  • Publish Date - September 28, 2026 / 07:42 PM IST,
    Updated On - September 28, 2026 / 07:42 PM IST

नयी दिल्ली, 28 सितंबर (भाषा) भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सांसद अनिल बलूनी ने सोमवार को कहा कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान अरुणाचल प्रदेश के नूरानांग में सीमा की रक्षा करते हुए अदम्य साहस दिखाने के साथ सर्वोच्च बलिदान देने वाले राइफलमैन जसवंत सिंह रावत के उत्तराखंड स्थित पैतृक घर को एक आधुनिक संग्रहालय के रूप में विकसित किया जाएगा।

उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘मैं 17 नवंबर को पौड़ी गढ़वाल के बड़यूं गांव स्थित बाबा जसवंत सिंह रावत के पैतृक घर में संग्रहालय निर्माण के लिए भूमि पूजन करूंगा।’’

बलूनी ने बताया कि उन्होंने शनिवार को उत्तराखंड के लैंसडाउन विधानसभा क्षेत्र में स्थित रावत के पैतृक गांव बड़यूं का दौरा किया और 1962 के भारत-चीन युद्ध के अमर शहीद को उनके जन्मस्थान पर श्रद्धांजलि अर्पित की।

उन्होंने ‘पवित्र मिट्टी’ को नमन किया और उनके पैतृक घर को ‘भव्य संग्रहालय और प्रेरणा स्थल’ के रूप में विकसित करने का संकल्प लिया।

बलूनी ने बताया कि दौरे के दौरान उन्होंने रावत के परिवार के सदस्यों से मुलाकात कर संग्रहालय के संबंध में चर्चा की। उन्होंने कहा, ‘‘उन्होंने न केवल इसके निर्माण के लिए सहमति दी, बल्कि इस पहल की सराहना भी की।’’

वर्ष 1962 में ‘नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी’ (अब अरुणाचल प्रदेश) के नूरानांग में युद्ध के दौरान रावत गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट की चौथी बटालियन में तैनात थे और उन्होंने दुश्मन का बेहद साहस और वीरता के साथ मुकाबला किया था।

बलूनी ने कहा, ‘‘प्रतिकूल परिस्थितियों में तीन दिनों तक अकेले मोर्चा संभालते हुए उन्होंने करीब 300 दुश्मन सैनिकों को मार गिराया और 17 नवंबर, 1962 को मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। उनके इस अदम्य साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।’’

उन्होंने कहा, ‘‘जसवंत गढ़ युद्ध स्मारक, जो तवांग से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, उसी पवित्र भूमि पर बना है जहां इस महान योद्धा ने सर्वोच्च बलिदान दिया था। मैं भूमि पूजन के लिए इस स्थल की मिट्टी लाऊंगा।’’

बलूनी ने कहा कि राइफलमैन रावत को 19 अगस्त, 1960 को महज 19 वर्ष की उम्र में चौथी गढ़वाल राइफल्स में भर्ती किया गया था। मातृभूमि की रक्षा करते हुए 17 नवंबर, 1962 को सर्वोच्च बलिदान देने के समय उनकी उम्र केवल 21 वर्ष थी।

उन्होंने कहा, ‘‘बाबा जसवंत सिंह जी का पैतृक गांव बड़यूं देशभक्ति का तीर्थ स्थल है। इसे देश के वीर शहीदों को समर्पित एक प्रमुख स्मारक के रूप में विकसित किया जाएगा, जिससे देश-विदेश से आने वाले लोग इस ‘नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (नेफा) के नायक’ की असाधारण वीरता को देख सकेंगे और उन्हें श्रद्धांजलि दे सकेंगे।’’

भाजपा सांसद ने कहा, ‘‘उनका बलिदान आने वाली पीढ़ियों को देश सेवा के लिए प्रेरित करता रहेगा।’’

भाषा संतोष नरेश

नरेश