नयी दिल्ली, नौ जनवरी (भाषा) भारत के लगभग 44 फीसदी शहर लंबे समय से वायु प्रदूषण की चपेट में हैं, जो इस बात का संकेत है कि यह समस्या अल्पकालिक घटनाओं के बजाय उत्सर्जन स्रोतों से लगातार जारी उत्सर्जन का नतीजा है। ऊर्जा एवं स्वच्छ वायु अनुसंधान केंद्र (सीआरईए) की हालिया विश्लेषण रिपोर्ट में इसकी जानकारी दी गयी है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि लंबे समय से वायु प्रदूषण का सामना कर रहे लगभग 44 फीसदी शहरों में से महज चार प्रतिशत राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के दायरे में आते हैं।
सीआरईए ने उपग्रह डेटा की मदद से भारत के 4,041 शहरों में पीएम 2.5 कणों के स्तर का आकलन किया।
रिपोर्ट के मुताबिक, “इन 4,041 शहरों में से कम से कम 1,787 में पीएम2.5 कणों का स्तर हाल के पांच वर्षों (2019, 2021, 2022, 2023 और 2024) में हर साल राष्ट्रीय वार्षिक मानक से अधिक दर्ज किया गया, जिनमें कोविड-19 से प्रभावित वर्ष 2020 शामिल नहीं है।
इसका मतलब है कि लगभग 44 फीसदी भारतीय शहर लंबे समय से वायु प्रदूषण का सामना कर रहे हैं, जो इस बात का संकेत है कि यह समस्या अल्पकालिक घटनाओं के बजाय उत्सर्जन स्रोतों से लगातार जारी उत्सर्जन का नतीजा है।”
रिपोर्ट में वर्ष 2025 में पीएम2.5 कणों के स्तर के आकलन के आधार पर बायर्नीहाट (असम), दिल्ली और गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) को भारत के तीन सर्वाधिक प्रदूषित शहर करार दिया गया, जहां वार्षिक सांद्रता क्रमशः 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर³, 96 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और 93 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज की गई।
रिपोर्ट के अनुसार, सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में नोएडा चौथे, गुरुग्राम पांचवें, ग्रेटर नोएडा छठे, भिवाड़ी सातवें, हाजीपुर आठवें, मुजफ्फरनगर नौवें और हापुड़ दसवें स्थान पर है।
रिपोर्ट में कहा गया है, “इसके बावजूद वायु प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए भारत की प्रमुख एनसीएपी योजना के दायरे में लंबे समय से इस समस्या से जूझ रहे महज चार फीसदी शहर आते हैं। एनसीएपी के अंतर्गत केवल 130 शहरों को शामिल किया गया है और इनमें से केवल 67 शहर ही उन 1,787 शहरों में शामिल हैं, जो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की ओर से निर्धारित राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों (एनएएक्यूएस) पर खरा उतरने में लगातार कई वर्षों से विफल साबित हो रहे हैं।”
रिपोर्ट में कहा गया है कि एनएएक्यूएस के मानकों का लगातार उल्लंघन करने वाले शहरों में सर्वाधिक 416 शहर उत्तर प्रदेश के हैं। इसमें कहा गया है कि राजस्थान के 158, गुजरात के 152, मध्यप्रदेश के 143, पंजाब के 136, बिहार के 136 और पश्चिम बंगाल के 124 शहर एनएएक्यूएस के मानकों पर खरा उतरने में विफल रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, एनसीएपी में शामिल 130 शहरों में से 28 में अभी भी व्यापक वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशन (सीएएएक्यूएमएस) मौजूद नहीं हैं, जबकि सीएएएक्यूएमएस से लैस 102 शहरों में से 100 शहरों में पीएम10 का स्तर 80 फीसदी या उससे अधिक दर्ज किया गया है।
इसमें कहा गया है, “पीएम10 उत्सर्जन पर लगाम लगाने के मोर्चे पर प्रगति मिली-जुली रही है। 23 शहरों ने पीएम10 के स्तर में कमी का संशोधित 40 फीसदी लक्ष्य हासिल कर लिया है, 28 शहरों में 21-40 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है, 26 शहरों में 1-20 प्रतिशत का मामूली सुधार हुआ है, जबकि 23 शहरों में कार्यक्रम की शुरुआत के बाद से पीएम10 के स्तर में वास्तव में वृद्धि हुई है।”
रिपोर्ट में कहा गया है, “पीएम10 कणों के मामले में दिल्ली शीर्ष पर है, जहां वार्षिक औसत स्तर 197 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया है, जो राष्ट्रीय मानक से तीन गुना है। गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा इस मामले में दूसरे और तीसरे पायदान पर हैं, जहां पीएम10 कणों का वार्षिक औसत स्तर क्रमश: 190 और 188 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा है।”
इसमें कहा गया है कि सबसे ज्यादा पीएम10 सांद्रता वाले शीर्ष 50 शहरों में राजस्थान के सर्वाधिक 18 शहर शामिल हैं, जिसके बाद उत्तर प्रदेश (10), मध्यप्रदेश (5), बिहार (4) और ओडिशा (4) का स्थान आता है।
सीआरईए के भारत विश्लेषक मनोज कुमार के मुताबिक, लक्षित और विज्ञान-आधारित सुधारों के जरिये देश में वायु गुणवत्ता प्रबंधन को मजबूत करना ही आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता हो सकता है।
उन्होंने कहा, “इसका मतलब यह है कि पीएम10 की तुलना में पीएम2.5 और इसकी पूर्ववर्ती गैसों (सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड) के स्तर में कमी लाने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, एनसीएपी के तहत मानकों पर खरे नहीं उतरने वाले शहरों की सूची को संशोधित किया जाना चाहिए, उद्योगों एवं बिजली संयंत्रों के लिए सख्त उत्सर्जन मानक निर्धारित किए जाने चाहिए, स्रोत विभाजन अध्ययनों के आधार पर धन आवंटित किया जाना चाहिए तथा क्षेत्रीय स्तर पर वायु प्रदूषण से निपटने के लिए वायुक्षेत्र-आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।”
रिपोर्ट में कहा गया है कि एनसीएपी की शुरुआत से लेकर अब तक इस कार्यक्रम और 15वें वित्त आयोग के अनुदान के तहत 13,415 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं, जिनमें से 9,929 करोड़ रुपये (74 फीसदी) का इस्तेमाल किया जा चुका है।
रिपोर्ट के अनुसार, सड़क पर धूल प्रबंधन पर सबसे ज्यादा 68 फीसदी राशि खर्च की गई है। इसमें कहा गया है कि परिवहन प्रबंधन पर 14 प्रतिशत, अपशिष्ट एवं जैव ईंधन के इस्तेमाल पर रोक लगाने पर 12 प्रतिशत, उद्योगों, घरेलू ईंधन उपयोग, जन जागरूकता अभियान संबंधी उपायों पर एक-एक प्रतिशत से कम और क्षमता निर्माण एवं निगरानी पर तीन प्रतिशत राशि खर्च की गई है।
भाषा पारुल रंजन
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