भारत में व्यक्तिगत दान का 45 प्रतिशत धार्मिक संस्थाओं, 42.8 प्रतिशत भिखारियों को : रिपोर्ट

भारत में व्यक्तिगत दान का 45 प्रतिशत धार्मिक संस्थाओं, 42.8 प्रतिशत भिखारियों को : रिपोर्ट

भारत में व्यक्तिगत दान का 45 प्रतिशत धार्मिक संस्थाओं, 42.8 प्रतिशत भिखारियों को :  रिपोर्ट
Modified Date: February 20, 2026 / 06:21 pm IST
Published Date: February 20, 2026 6:21 pm IST

नयी दिल्ली, 20 फरवरी (भाषा) भारत में व्यक्तिगत दान का 45 प्रतिशत से अधिक हिस्सा धार्मिक संगठनों को जबकि 42.8 फीसदी हिस्सा भिखारियों को प्राप्त होता है। ‘भारत दान कैसे देता है’ शीर्षक से जारी तीसरी रिपोर्ट में यह दावा किया गया है।

अशोका विश्वविद्यालय के ‘सेंटर फॉर सोशल इम्पैक्ट एंड फिलैंथ्रोपी’ (सीएसआईपी) ने यह रिपोर्ट तैयार की है, जो भारतभर में रोजमर्रा के घरेलू दान के पैमाने, चलन और कारणों का विश्लेषण करती है। रिपोर्ट यह रेखांकित करती है कि भारतीय विश्व के सबसे उदार लोगों में शामिल हैं।

देश के 20 राज्यों में 7,225 की संख्या में किए गए राष्ट्रीय स्तर के प्रतिनिधि सर्वेक्षणों और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) के आंकड़ों पर आधारित इस अध्ययन का उद्देश्य यह विस्तृत जानकारी प्रदान करना था कि आम भारतीय नकद, वस्तुगत सहायता और स्वयंसेवा के माध्यम से सामाजिक कार्यों में किस प्रकार योगदान देते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, भारत में प्रतिदिन किए जाने वाले घरेलू दान का वार्षिक आंकड़ा लगभग 540 अरब रुपये (54,000 करोड़ रुपये) है। यह निगमित सामाजिक दायित्व (सीएसआर) और संस्थागत परमार्थ दान समेत देश के व्यापक परोपकारी कार्यो में इसकी महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर अनदेखी की जाने वाली भूमिका को रेखांकित करता है।

रिपोर्ट के अनुसार, दैनिक दान का 45.9 प्रतिशत हिस्सा धार्मिक संगठनों और 41.8 प्रतिशत हिस्सा सीधे लोगों (जैसे भिखारी आदि) तक पहुंचता है, जबकि केवल 14.9 प्रतिशत हिस्सा गैर-धार्मिक संगठनों तक पहुंचता है।

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘यह वितरण एक चुनौती और एक अवसर दोनों प्रस्तुत करता है, जो दैनिक दानदाताओं को संगठित सामाजिक क्षेत्र की पहलों से जोड़ने वाले मार्गों को मजबूत करने की क्षमता को उजागर करता है।’’

रिपोर्ट जारी किये जाने के अवसर पर टिप्पणी करते हुए सीएसआईपी की निदेशक और प्रमुख जिन्नी उप्पल ने कहा, ‘भारत दान कैसे देता है 2025-26’ नामक रिपोर्ट उदारता के एक ऐसे रूप को उजागर करती है जो भारत में हमेशा से मौजूद रहा है लेकिन जिसे शायद ही कभी मापा गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक वस्तु के रूप में दिए गए दान का हिस्सा सबसे अधिक 46 प्रतिशत है, जो नकद दान (44 प्रतिशत) से थोड़ा अधिक है। वहीं, लगभग 30 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने स्वयंसेवा करने की बात कही, जो दान देने की सामाजिक और सामुदायिक प्रकृति को दर्शाती है।

सीखने के माध्यमों की बात करें तो, व्यक्तिगत रूप से संपर्क करना जुड़ाव का सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है, यानी 25 प्रतिशत। इसके बाद सोशल मीडिया का स्थान आता है, जो विभिन्न क्षेत्रों में लगभग 15 प्रतिशत है। यह दान संबंधी निर्णयों को प्रभावित करने में विश्वास, निकटता और सामाजिक विश्वसनीयता के निरंतर महत्व को रेखांकित करता है, भले ही डिजिटल पहुंच का प्रचलन बढ़ रहा हो।

रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि रोजमर्रा का दान सभी आय वर्गों में समान रूप से होता है, जो दर्शाता है कि भारतीय विश्व स्तर पर सबसे उदार लोगों में शुमार हैं। कम उपभोग स्तर (4,000-5,000 रुपये प्रति माह) पर भी लगभग आधे परिवार दान देने की बात कहते हैं। जैसे-जैसे आय बढ़ती है, भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि होती है, जो उच्च उपभोग वाले परिवारों में 70-80 प्रतिशत तक पहुंच जाती है।

भाषा संतोष माधव

माधव


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